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ज्योतिष - वास्तु

बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा

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  • बसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा माना जाता है। यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन का सूचक है। इस अवसर पर प्रकृति के सौंदर्य में अनुपम छटा का दर्शन होता है। पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और बसंत में उनमें नयी कोपलें आने लगती हैं। माघ महीने की शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी होती है तथा इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है। 10 फरवरी, 2019 में मनाया जायेगा. बसन्त पंचमी के दिन भगवान श्रीविष्णु, श्री कृ्ष्ण-राधा व शिक्षा की देवी माता सरस्वती की पूजा पीले फूल, गुलाल, अर्ध्य, धूप, दीप, आदि द्वारा की जा जाती है.
  • पूजा में पीले व मीठे चावल व पीले हलुवे का श्रद्धा से भोग लगाकर पूजा करने की परम्परा है. माता सरस्वती बुद्धि व संगीत की देवी है. पंचमी के दिन को माता सरस्वती के जन्मोत्सव के रुप में भी मनाया जाता है. यह पर्व ऋतुओं के राजा का पर्व है. इन दिन से बसंत ऋतु से शुरु होकर, फाल्गुन माह की कृ्ष्ण पक्ष की पंचमी तक रहता है. यह पर्व कला व शिक्षा प्रेमियों के लिये विशेष महत्व रखता है.
  • एक किंवदन्ती के अनुसार इस दिन ब्रह्मा जी ने सृ्ष्टि की रचना की थी. यह त्यौहार उतर भारत में पूर्ण हर्ष- उल्लास से मनाया जाता है. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान श्री राम ने माता शबरी के झूठे बेर खाये थे. इस उपलक्ष्य में बसन्त पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है. बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्तों में शामिल किया जाता है. बसंत पंचमी के दिन शुभ कार्य जिसमें विवाह, भवन निर्माण, कूप निर्माण, फैक्ट्री आदि का शुभारम्भ, शिक्षा संस्थाओं का उद्धघाटन करने के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है.

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ज्योतिष - वास्तु

दिनांक 21/08/2019 का पंचांग एवं राशिफल

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  • रायपुर (etoi news) 20.08.2019
  • दिनांक 21.08.2019 का पंचाग
  • शुभ संवत 2076 शक 1941 ..
  • सूर्य दक्षिणायन का …भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष…. षष्ठी तिथि… रात्रि को 02 बजकर 39 मिनट तक … बुधवार… अश्विनी नक्षत्र.. रात्रि को 10 बजकर 02 मिनट तक … आज चन्द्रमा …मेष राशि में… आज का राहुकाल दोपहर को 12 बजकर 07 मिनट से 01 बजकर 42 मिनट तक होगा …

आज के राशियों का हाल तथा ग्रहों की चाल-

मेष राशि –

     मेष राशि वाले जातकों के….

आज संतान पक्ष की शुभ सूचना प्राप्ति…

दैनिक रूटिन के कार्य नहीं होंगे….

व्यवसायिक संबंधों में सुधार संभव….

गुरू से संबंधित दोषों की निवृत्ति के लिए निम्न उपाय करें तो लाभ होगा-

     ऊॅ बृं बृहस्पतयै नमः का एक माला जाप करें….

     पुरोहित को केला, नारियल का दान करें….

 

वृषभ राशि –

     वृषभ राशि वालें जातकों के…

आज लंबी यात्रा पर परिवार साथ….

जीवनसाथी के अचानक स्वास्थ्यगत कष्ट से तनाव….

किसी पुराने परिचित से मुलाकात संभव…

शुक्र के बुरे प्रभाव से उत्पन्न कष्ट की शांति के लिए –

     ऊॅ शुं शुक्राय नमः का जाप करें…

     दुर्गा जी के दर्शन करें…

     चावल, दूध, दही का दान करें…

 

मिथुन राशि –

     मिथुन राशि वाले जातकों के…

आज नये प्रोजेक्ट की प्राप्ति संभव….

दोस्तो के साथ नये ब्रांच की स्थापना….

आहार का असंयम से उदर विकार…के दोषों को दूर करने के लिए –

     ‘‘ऊॅ शं शनैश्चराय नमः’’ की एक माला जाप कर दिन की शुरूआत करें.

     उड़द या तिल दान करें,

 

कर्क राशि –

     कर्क राशि वाले सभी जातकों के…..

आज आपके बौद्धिक क्षमता तथा कार्यकुषलता की प्रषंसा…

नये अवसर की प्राप्ति या उच्च षिक्षा हेतु चयन….

कमर दर्द के कारण कष्ट …से संबंधित कष्टों से बचाव के लिए –

     ऊॅ बुं बुधाय नमः का एक माला जाप कर गणपति की आराधना करें

     दूबी गणपति में चढ़ाकर मनन करें,

     एक मुठ्ठी मूंग का दान करें।

 

सिंह राशि –

     सिंह राशि वाले सभी जातकों के……

आज किसी राजनैतिक सर्पोट से लाभ…

दोस्तो के साथ मनोरंजन तथा भ्रमण….

सामुहिक स्थल पर विवाद संभव….

आज विवादों से बचने के लिए के निम्न उपाय करने चाहिए –

     ऊॅ रां राहवे नमः का एक माला जाप कर दिन की शुरूआत करें..

     सूक्ष्म जीवों को आहार दें..

 

कन्या राशि –

     कन्या राशि वाले सभी जातकों के…

आज आपके हुनर के कारण यश की प्राप्ति…

कार्यक्षेत्र में बदलाव संभव…

लाभ तथा उत्साह को बनायें रखने के लिए निम्न उपाय आजमायें-

     ऊॅ कें केतवें नमः का जाप कर दिन की शुरूआत करें…

     सूक्ष्म जीवों की सेवा करें…

    

तुला राशि –

     तुला राशि वाले सभी जातकों के….

आज अधीनस्थो के अवकाश में रहने से कार्य में रूकावट हो सकती है…

समयसीमा के कार्यो में बाधा…

धन से संबंधित हानि संभव.

अतः सूर्य कृत दोषों की निवृत्ति के लिए –

     ऊॅ धृणि सूर्याय नमः का पाठ करें…..

     गुड़.. गेहू…का दान करें..

 

वृश्चिक राशि –

     वृश्चिक राशि वालें सभी जातकों के….

आज के नए कामों में सहयोग से स्थिति बेहतर होगी….

अपनो से विवाद की समाप्ति….

अध्ययन संबंधी यात्रा…..

शांति के लिए चंद्रमा के निम्न उपाय करें –

     उॅ नमः शिवाय का जाप करें…

     दूध, चावल का दान करें…

    

धनु राशि –

     धनु राशि वाले सभी जातकों के…

आज सभी काम में अच्छी शुरूआत…

किसी व्यक्ति से सहयोग जिससे आपके रुके काम के पुरे होने की सम्भावना ….

सूर्य के शुभ प्रभाव में वृद्धि एवं कष्टों की निवृत्ति के लिए –

     ऊॅ सों सोमाय नमः का एक माला जाप करें……

खीर बनाकर कम से कम एक कन्या को खिलायें….

 

मकर राशि –

     मकर राशि वाले सभी जातकों के….

आज सभी का सहयोग मिलेगा….

खेल में नाम एवं धन की प्राप्ति…

पूरे दिन उत्साह कायम रखने तथा तंदुरूस्त रहने के लिए निम्न उपाय आजमायें –

     ऊॅ अं अंगारकाय नमः का जाप करें…

     मसूर की दाल, गुड दान करें..

 

कुंभ राशि –

     कुंभ राशि वाले जातकों के…

आज घरेलू सामग्री पर खर्च…

 पारिवारिक शुभकाम में सहभागिता….

 माता के स्वास्थ्य संबंधी तनाव…

 गुरू के लिए –

     ऊॅ गुरूवे नमः का जाप करें…

     पीली वस्तुओं का दान करें…

     गुरूजनों का आर्शीवाद लें..

 

मीन राशि –

     मीनराशि वालों सभी जातकों के…

नवीन वस्त्र की प्राप्ति…

आज भाईयों एवं सहयोगियों से विवाद…

आकस्मिक धन हानि की संभावना…बचने के लिए शांति के लिए –

     ऊॅ शुं शुक्राय नमः का जाप करें…

     चावल, दूध, दही का दान करें…

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ज्योतिष - वास्तु

सन्तान सुख की कामना का प्रमुख व्रत – हलषष्ठी व्रत 

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    हल षष्ठी का पूजा विधान

इस व्रत को दोपहर के पश्चात देव मन्दिर अथवा घर में पूजा की समस्त सामग्री एकत्रित करके शाली या किसी मिटटी के बर्तन में सरोवर बनाकर उसमें यानी भर कर कमल के फूलो से सजायें। उसके पश्चात गाय के गोबर से भूमि लीपकर चौक निर्माण करें तत्पश्चात कलश स्थापित कर गणेश और हलषष्ठी देवी की मूर्ति या चित्र पीढ़े पर रखे तथा पूर्व की और मुख करके पूजा प्रारम्भ करें ।

कुश-अथवा पान द्वारा शरीर पर जल छिड़कें निम्न मंत्र पढ़े –

सुमिर देव सब रघुबर सीता। जासे तन-मन होय पुनीता।।

इसके बाद धरती माता की पूजा कर निम्न मंत्र पढे-

जय धरती माता सुखदाता । कल्याणी सुर-नर को माता ।।

उपरोक्त मंत्र द्वारा स्नान करा कर पुष्प सिन्दूर आदि से पूजा करके यह मंत्र पढें-

कलश पूजन मंत्र

सुरगण सकल करहिं शुभ बासा । होय पूर्ण जन-जन को आशा ।।

 

पश्चात् इस मंत्र द्वारा गणेश जी को स्नान कराकर फल फुलादि नैवेद्य अर्पित का पूजन करें ..

 

गणेश पुजा मंत्र

गण नायक जय गणपति देवा । करहु नाथ स्वीकृत मम सेवा ।।

इसके पश्चात हलषष्ठी देवी को स्नान करा कर फल, फुल, दूब, अक्षत, धूप

दीप, नैवद्य, ताम्बुल आदि अर्पण कर श्रद्धा भक्ति पूर्वक पुजा करें ।

 

हल षष्ठी पूजन प्रारम्भ

 

ध्यान का मंत्र

 

जय जग जननी प्रगति स्वरूपा। माँ हलषष्टी रूप अनूपा।

आवाहन मंत्र

करि अनुकम्पा आवहु माई। हलंषष्टी भी तुमहिं मनाई।।

 

आसन मंत्र

आसन सुन्दर मातु बनावा। हलषष्ठों पूजन मन भावा।।

 

अर्ध्व प्रदान करने का मंत्र

अर्पित अर्ध्य करहु शुभ माता। हलषष्ठी माँ जग विख्याता।

पाँव धोने का मंत्र

धोबहु चरण कमल हरषाई। हलषष्ठी माँ होहु सहाई।।

आचमन कराने का मंत्र

करहु आचमन मंगल करामी। तुम्हरी महिमा जाय न बरनी।।

स्नान कराने का मंत्र

सुर सरि चीर करहु स्नाना। धारण करहु वस्त्र शुभ नाना।।

सिन्दूर लगाने का मंत्र

भाल शुभ सिन्दूर सुहाई। हलषष्ठी माता सुखदाई।।

कुंकुम अथवा गुलाल लगाने का मंत्र

लाल गुलाल परम सुखदाई। हलषष्ठी भी भाल सुहाई।।

फूल चढाने का मंत्र

भाँति भाति के सुमन सुहावना हलषष्ठी माता मन भावना।

 

महुवे का मंत्र

मधु समान मधु सुमन चढ़ाऊ। हलषष्ठी माँ तुमहिं मनाऊ।।

धूप देने का मंत्र

मन मोहक सुगन्ध युवत धूपा। हलषष्ठी माँ दिव्य स्वरूपा।।

दीप जलने का मंत्र

नाशक तिमिर प्रकाश प्रकाशक । हलषष्ठी कीरति सुख कारक।

नैवेध चढाने का मंत्र

हलषष्ठी माँ तुमहिं मनाऊ। भवित भाव सहित भोग लगांऊ।।

आचमन कराने का मंत्र

सुर सरि जल पवन सुख दाता। कसे करहु आचमन माता।।

पान खुपारी चढाने का मंत्र

हलषष्ठी माँ परम पियारी। काहुं समर्पित पान-सुपारी।।

नारियल चढाने का -मंत्र

कदली फल शुचि सुभग सुहावन । करहु भेटे स्वीकृत अति पावन ।।

पोता का मंत्र

पोता सुख का स्त्रोत सुहावना देहु शतायु सुवन सुख श्रदवन ।।

प्रार्थना करने का मंत्र

जगदम्बा अम्बा तुम्ही हो हलषष्टी मात, महा मूढ़ मति मच मैं नहिं पूजा विधि ज्ञात्।।

दुखी देवकी ने तुम्हें पूजा प्रेम समेत उपजे कान्हा कोख ते सुख उपजावन हेत ।।

हित चित सेनित द्रोपती ने पूज्यो मन लाय, हलषष्टी माँ करि कृपा कीन्हे कष्ट नाशाया।

तत्पश्चात नदी के तट पर वरुण देव की पुजा करे

पूजा मंत्र

जलाधिपति जीवन जल दाता। वरूणदेव सुख शांति प्रदाता।।

प्रार्थना करने का मंत्र

जन जन के प्रभु हरहु कलेशा। देहु शांति संतोष हमेशा ।।

तुम्हरी ध्यान धरन मन लाई। दीन जानि प्रभु होहु सहाई।।

 

इस प्रकार श्रद्धा भक्ति पूर्वक बन्धु बांधवों सहित पूजा करके खनन करके बनाये तालाब में जल भरें और कथा सुने-

 

हल षष्ठी की कथा

एक बार द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण एक स्थान पर विराजमान थे। तब धर्मराज बोले हे भगवन्! इम जगत में पूण्य प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण करने वाला कौन सा व्रत उत्तम है। तब भगवान श्रीकृष्ण बोले कि हे राजन हलषष्ठी के समान उत्तम कोई दूसरा व्रत नही है। यूधिष्ठिर बीले कि हे महाराज यह व्रत कब और किस प्रकार प्रकट हुआ। श्री कृष्ण जी बोले कि हे राजन मथुरापुरी में एक राजा कंस थे। सुर नर सभी उसके आधीन थे। राजा कंस की बहन का नाम देवकी था । वह विवाह के योग्य हुई तब कंस ने उसका विवाह वसुदेव के साथ कर दिया । जब वह विदा होकर ससुराल जा रही थी तभी आकाशवाणी हुईं कि हे हंस जिस देवकी को तू प्रेम से विदा कर रहा है इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवें बालक द्वारा तेरी मृत्यु होगी। यह सुनकर कंस ने क्रोध में भरकर देवकी और वसुदेव को बन्दी बना लिया और जेलखाने में डाल दिया। समय बीतने के साथ देवकी के पुत्र पैदा होते गये कंस एक एक करके सभी को मारता जाता। इस प्रकार जब देवकी के छ: पुत्र मारे गये तब एक दिन देवयोग से महामुनि नारद देवकी से मिलने जेल खाने पहुँचे उसे दुखी देखकर कारण पूछा। देवकी ने रोते हुये सारा हाल बताया । तब श्री नारदजी ने कहा बेटी! दु:खी मत होओ, तुम श्रद्धा भक्ति पूर्वक हलषष्ठी माता का व्रत करो, जिससे तुम्हारे सारे दूर हो जायेगें। तब देवकी ने माता की महिमा पूछी। नारद जी बीले- देवकी! तुमसे एक पुरातन कथा कहता हूँ ध्यान पूर्वक सुनो-

बहुत समय पूर्व चन्दव्रत नामक एक प्रतापी राजा थे जिनके एक ही पुत्र था। राजा ने नगर के समीप एक तालाब खुदवाया था परन्तु उसमें जल नहीं रहता था। कितना भी जल भरा जाय तुरन्त सूख जाता था, जलहीन तालाब को देख नगरवासी राजा को कोसते थे। जिससे राजा सदैव दु:खी रहते थे और कहते थे कि मेरा धन-धर्म दोनो नष्ट हो गया। एक दिन स्वप्न में वरूण देव ने राजा से कहा हे राजा! यदि तुम अपने पुत्र की मुझे बलि दोगे तो तालाब जल से भर जायेगा। प्रात: राजा ने स्वप्न को बात दरबार में बतायी और कहा कि मैं अपने इकलौते पुत्र का बलिदान नहीं कर सकता चाहे तलब में जल रहे अथवा न रहे। राजा की यह बात सुनकर राजकूमार बोला कि मैं स्वयं अपनी बलि दे दूंगा क्योकि मेरे बलिदान से पिता का सुयश बढेगा तथा माता को सुख मिलेगा। यह कहकर राजकुमार तलब की तलहटी में जाकर बैठ गया और उसके प्रभाव से तालाब तत्काल जल से भर गया उसमें कमल के पुष्प खिल गये तथा सभी जीव-जन्तु बोलने लगे। राजा यह समाचार सुनकर दुखी होकर वन को चले गये। वन में पॉच स्त्रियाँ हलषष्ठी माता की पूजा कर रही थी। राजा द्वारा विधि पूछने पर स्त्रियों ने माता की महिमा का वर्णन कर दिया जिसको सुनकर राजा वापस लौट आये और रानी से कहा कि तुम भी हलषष्ठी माता का व्रत तथा पूजा करो । राजा की बात सुनकर रानी उसी दिन-से व्रत रखकर पुजा करने लगी। जिसके प्रभाव से कुछ समय बाद राजकूमार तालाब से बाहर आ गया। राजा यह देख कर पसन्द हुए और राजकुमार क्रो महल में ले आये तब से रानी प्रतिवर्ष हलषष्ठी माता का व्रत करने लगी।

// महती कथा समाप्त //

हल षष्ठी माता की आरती –

जय हलषष्टी माई, जय जय हलषष्ठी माई ।

सुत सम्पति की राता महिमा जग छाईं । ।जय ।।

मानवती ने मन से पूजा हरजाई ।

व्रत प्रभाव दोनों सुत जीवित पाई ।।ज़य ।।

दीन देवकी ने मन चित्त से पूजा।

हुए कोश से कान्हा नहि व्रत अस दूजाप्नजया।

पूजि उत्तरा द्रोपदी ने शुभ फल पायो ।

हलषष्ठी माता को यश जग में गायों ।।ज़य ।।

भवित भाव से ग्वालिन माँ को ध्यायो ।

मातु कृपा से पांचो सुत जीवित गायों ।।ज़य ।।

दासी दीन वणिक ने माँ क्रो व्रत कीन्हो ।।

जो जन माँ को व्रत करी पूजे सिर नावें ।

देवी प्रसाद जगत में सुख सम्पत्ति पावे।।

 

दक्षिणा देकर आशीर्वाद लेवें तथा निग्न विसर्जन मन्त्र पढे-

 

जग जननी जग दम्बिका कीन्ही कृपा ललाम।

सेवक विनती करत है माँ जावहु निज धाम ।।

नटवर ग्राम समीप द्विज देती प्रसाद जाम ।

हलषष्ठी माँ की वन्या लिखी सुधिर सिया राम ।।

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कृष्ण जन्माष्टमी मनाएं 24 अगस्त 2019 को

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सप्तमी 23 अगस्त को प्रातः 08 :09 मिनट तक 

अष्टमी 24 अगस्त को प्रातः 08 :32 तक 

परन्तु रोहिणी नक्षत्र 24 को रात्रि 04 :16 तक इसलिए कृष्णा जन्माष्टमी व्रत  24 अगस्त 2019 को रखें 

धर्म शास्त्र का जन्माष्टमी के लिए क्या मत है ? और वास्तव में यह पर्व किस दिन मनाना चाहिए ? निर्णय सिंधु के अनुसार – 1. कृष्णाष्टमी दो प्रकार की होती हैं – जन्माष्टमी और जयंती। व्रत कृष्णाष्टमी को करना चाहिए। 2. दिन व रात्रि के समय यदि रोहिणी नक्षत्र जरा भी न हो तो चंद्रोदय के समय रात के समय की अष्टमी को जन्माष्टमी मनाना चाहिए। केवल अष्टमी को ही व्रत करना चाहिए। 3. यदि भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो वह जयंती कहलाती है। रोहिणी नक्षत्र का योग रात और दिन दोनों में हो तो श्रेष्ठ, केवल अर्द्धरात्रि में हो तो मध्यम और केवल दिन में हो तो अधम माना जाता है। 4. यदि अष्टमी और रोहिणी का योग पूर्ण अहोरात्रि में न भी हो तथा थोड़ा सा समय भी अहोरात्रि का हो तो उसी दिन जन्माष्टमी का व्रत करना चाहिए। 5. अर्धरात्रि के समय ही रोहिणी योग में जयंती होती है। किसी और तरह से नहीं होती। 6. पहले और अगले दिन यदि रोहिणी नक्षत्र का योग हो जाये तो जन्माष्टमी भी जयंती के बीच में आ जाती है तब जन्माष्टमी का व्रत अलग से नहीं करना होता। 7. आधी रात के समय यदि अष्टमी हो जाये तो उसमें श्री कृष्ण का पूजन करने से तीन जन्म के पाप दूर होते हैं। पहले दिन अर्धरात्रि में योग न हो तो अगले दिन उसकी स्तुति के निमित्त है। 8. इस व्रत में आधी रात का वेध ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि वही समय मुख्य कहा गया है। माधवीय में लिखा है कि अष्टमी और शिवरात्री आधी रात से पहले घड़ी भर भी हो तो लेना चाहिए। भविष्यपुराण में लिखा है कि कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र में श्री कृष्ण का पूजन करने से तीन जन्म के पाप दूर होते हैं। वशिष्ठ संहिता में लिखा है कि आधी रात को रोहिणीयुक्त अष्टमी ही मुख्य समय है क्योंकि स्वयं भगवान उसमें प्रगट हुए थे। 9. अष्टमी दो प्रकार की होती है। 1. रोहिणी रहित 2. रोहिणी युक्त रोहिणी रहित अष्टमी चार प्रकार की होती है – 1. पहले दिन जो आधी रात में हो 2. अगले दिन आधी रात में हो 3. दोनों दिन आधी रात में हो 4. दोनों दिन आधी रात में न हो इन चारों में से पहली दोनों में कर्मकाल व्यापिनी लेनी चाहिए क्योंकि भृगु ने लिखा है कि जन्माष्टमी, रोहिणी तथा शिवरात्रि पूर्व तिथि से विद्धा (प्रारंभ) ही लेनी चाहिए। अगली दोनों में अगली तिथि ही लेनी चाहिए, क्योंकि उसमें प्रातःकाल संकल्प काल व्यापिनी होती है। रोहिणी युक्त अष्टमी भी चार प्रकार की होती है- 1. पहले दिन आधी रात में रोहिणी से युक्त हो 2. अगले दिन आधी रात में रोहिणी से युक्त हो 3. दोनों दिन आधी रात में रोहिणी से युक्त हो 4. दोनों दिन आधी रात में रोहिणी से युक्त न हो पद्मपुराण व गरूड़ पुराण के अनुसार सप्तमी रोहिणी युक्त विद्धा जन्माष्टमी में ही व्रत करना चाहिए। वह्निपुराण के अनुसार सप्तमीयुक्त अष्टमी को यदि आधी रात में रोहिणी हो तो वह अष्टमी तब तक पवित्र है जब तक सूर्य चंद्रमा हैं। अतः पहले व दूसरे पक्ष में पहले व दूसरे दिन मनानी चाहिए। अर्थात अष्टमी के आधार पर पर्व मनाना चाहिए। तीसरे पक्ष में अगले दिन लेनी चाहिए। चैथे पक्ष में अष्टमी तीन प्रकार की होती है। 1. पहले दिन से आधी रात में अष्टमी और अगले दिन रोहिणी नक्षत्र 2. अगले दिन अष्टमी और पहले दिन रोहिणी नक्षत्र 3. दोनों दिन अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र लेकिन आधी रात में नहीं। प्रथम पक्ष में अगले दिन जयंती योग होने के कारण अष्टमी अगले दिन ही मनानी चाहिए। द्वितीय व तृतीय पक्ष दोनों में भी दूसरे दिन अष्टमी व्रत करना चाहिए।

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