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दिल्ली

भारतीय जनता पार्टी की शनिवार को केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक

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भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक

कल कर सकती है 180 उम्मीदवारों के नाम का एलान

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शनिवार को 180 सीटों के लिए अपने प्रत्याशियों के नाम का एलान कर सकती है. शनिवार को पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक होगी. जिसके बाद उम्मीदवारों के नाम का एलान किया जाएगा.

बता दें कि 11 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग है और अभी तक बीजेपी ने एक भी उम्मीदवारों के नाम की घोषणा नहीं की है. जैसे-जैसे वोटिंग के दिन नजदीक आ रहे हैं कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ती जा रही है.

वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत कुछ दल अपने उम्मीदवारों के नाम का एलान कर चुके हैं. इसमें से कांग्रेस ने दो लिस्ट जारी की हैं जिसमें से यूपी के 27 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम का एलान हो चुका है.

सात मार्च को जारी अपनी पहली लिस्ट में कांग्रेस ने यूपी की 11 और गुजरात के 4 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित किए थे. वहीं 13 मार्च को जारी दूसरी लिस्ट में कांग्रेस ने यूपी की 16 और महाराष्ट्र की 5 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए थे.

देश भर में सात चरणों में वोटिंग होगी और वोटों की गिनती 23 मई को होगी. चुनाव आयोग के मुताबिक वोटिंग का पहला चरण 11 अप्रैल को दूसरा चरण 18 अप्रैल, तीसरा चरण 23 अप्रैल, चौथा चरण 29 अप्रैल को होगा.

वहीं पांचवां चरण 6 मई को जबकि छठा चरण 12 मई और सातवां चरण सातवां चरण का मतदान 19 मई को संपन्न होगा. निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए आयोग ने पूरी तरह से कमर कस लिया है. आयोग के सदस्य नेताओं के सोशल मीडया पर भी कड़ी नजर बनाए हुए हैं.

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जगनमोहन रेड्डी ने कांग्रेस पार्टी से मां-बहन के अपमान का लिया बदला

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  • नईदिल्ली 25 मई 2019
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बयार में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. 17वीं लोकसभा चुनाव में पार्टी को प्रचंड बहुमत हासिल हुआ है. मुख्‍य विरोधी दल कांग्रेस के पास विपक्ष में बैठने लायक सीटें भी नहीं आ पाईंं हैं. कई राज्‍य तो ऐसे हैं जहां कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला है. पार्टी का आंध्र प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही हाल है. यहां पर वाईएसआर की लहर में कांग्रेस बह गई है.
  • लोकसभा चुनाव 2019 में जगनमोहन रेड्डी की पार्टी ने राज्‍य की 25 सीटों में से 22 पर कब्‍जा जमा लिया है. जबकि तीन सीटों पर टीडीपी ने जीत दर्ज की है. विधानसभा चुनाव में भी रेड्डी की पार्टी को ही जनाधार मिला है. हालांकि वाईएसआर कांग्रेस की जीत के साथ ही जगन रेड्डी ने कांग्रेस पार्टी से मां-बहन के अपमान का बदला ले लिया है. 2019 के रिजल्‍ट के साथ ही रेड्डी की सौगंध भी पूरी हो गई है.
  • दरअसल, कांग्रेस के दिग्‍गज नेता और आंध्र प्रदेश के मुख्‍यमंत्री वाईएसआर की हेलिकॉप्‍टर दुर्घटना में मौत हो गई थी. उनकी मौत के साथ ही कांग्रेस पार्टी ने उनके परिवार से दूरी बना ली. इस बीच वर्ष 2010 के मध्‍य में जगनमोहन रेड्डी की मां विजयलक्ष्‍मी (विजयम्‍मा) अपनी बेटी शर्मिला रेड्डी के साथ सोनिया गांधी से मिलने के लिए 10 जनपद गईं.

सोनिया गांधी ने किया अपमान

  • वाईएसआर और दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच काफी घनिष्‍ठ संबंध थे, जिससे विजयलक्ष्‍मी को उम्‍मीद थी कि सोनिया गांधी उनके साथ भी काफी गर्मजोशी से मिलेंगी, लेकिन कांग्रेस की तत्‍कालीन अध्‍यक्ष से मिलने के लिए जब उन्‍हें कुछ समय तक इंतजार करना पड़ा तो उनकी सारी उम्‍मीद चकनाचूर हो गई. जब सोनिया गांधी उनके पास आईं तो उनका व्‍यवहार सामान्‍य से हटकर कुछ सख्‍त सा लगा.
  • उस समय वाईएसआर की मौत के वियोग में कई लोगों ने आत्‍महत्‍याएं कर ली थींं और जगनमोहन रेड्डी आत्‍महत्‍याएं करने वाले लोगों के घर पहुंच रहे थे और उनके परिजनों से मिल रहे थे. रेड्डी ने इस यात्रा को ‘ओदारपू’ नाम दिया था. सोनिया गांधी ने विजयम्‍मा से मिलने के बाद रेड्डी को यह यात्रा रोकने के लिए कहा. सोनिया चाहती थीं कि जगनमोहन ये यात्रा तुरंत रोक दें. हालांकि विजयम्‍मा ने उन्‍हें समझाने की कोशिश की लेकिन सोनिया अपनी कुर्सी से उठी और यात्रा रोकने के लिए कहा.

रेड्डी ने बनाई नई पार्टी

  • मां और बहन के इस अपमान का बदला लेने के लिए जगहमोहन रेड्डी ने कसम खा ली. इसके बाद उन्‍होंने अपने परिजनों और करीबियों को यह संकेत दिया कि वे जल्‍द ही नई पार्टी का गठन करेंगे. उन्‍होंने कहा कि वे आंध्र प्रदेश से कांग्रेस का खत्‍म कर देंगे.
  • सितंबर 2009 में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में वाई एस राजशेखर रेड्डी की मृत्यु हो गई और कांग्रेस ने दिवंगत मुख्यमंत्री के उत्तराधिकारी के तौर पर के. रोसैया को चुना. जबकि जमीनी स्‍तर पर रोसैया का कोई जनाधार नहीं था. कांग्रेस हाईकमान ने जगनमोहन रेड्डी को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया था. उस समय पार्टी में बगावती सुर भी उठने लगे थे. विरोध ज्‍यादा बढ़ने पर कांग्रेस ने किरण कुमार रेड्डी को प्रदेश का सीएम बना दिया.

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सूरत के तक्षशिला कोचिंग में मरने वाले छात्र -छात्राओं का आंकड़ा 23 हो गया है। तीन की कूदने से मौत

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  • नईदिल्ली 25 मई 2019
  • सरथाणा जकातनाका के तक्षशिला आर्केड में लगी आग में मरने वालों का आंकड़ा 23 हो गया है। शनिवार को जख्मी दो और छात्रों की मौत हो गई, वहीं सात की हालत बेहद गंभीर है। इससे पहले शुक्रवार देर रात तक तीन छात्र और 15 छात्राओं समेत 21 की मौत हो गई थी। सभी की उम्र 15 से 22 साल के बीच थी। घटना के समय आर्ट्स कोचिंग में 60 बच्चे थे। 13 बच्चों ने दूसरी और तीसरी मंजिल से छलांग लगाई। इनमें से तीन की कूदने से मौत हुई। कोचिंग के संचालक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है।
    शॉर्ट सर्किट से लगी आग
  • चार मंजिला कॉम्प्लेक्स में शॉर्ट सर्किट से दोपहर बाद साढ़े तीन बजे आग लगी। कॉम्प्लेक्स में दूसरी और तीसरी मंजिल पर आर्ट क्लासेस चलती हैं। आग ग्राउंड फ्लोर से शुरू हुई। आग देखकर आर्ट क्लास के बच्चे ऊपर की ओर भागे और वहीं फंस गए। फायर ब्रिगेड के आने तक आग बेकाबू हो गई। इसलिए बच्चों ने जान बचाने के लिए चौथी मंजिल से कूदना शुरू कर दिया। नीचे जमा स्थानीय लोगों ने कूद रहे बच्चों को कैच करना शुरू किया, ताकि बच्चों के सिर पर सीधी चोट न आए। इस तरह लोगों ने 10 बच्चों को बचा लिया। जबकि, एक बच्चे को नहीं बचाया जा सका।

ऊपरी मंजिल तक नहीं पहुंच पाईं दमकल की सीढ़ियां

  • स्थानीय लोगों का आरोप है कि दमकल की गाड़ियां आग लगने के आधे घंटे बाद मौके पर पहुंचीं। लेकिन, उस वक्त उनके पास जरूरी उपकरण नहीं थे, जिनके जरिए आग में फंसे बच्चों को बाहर निकाला जा सके। वीडियो में दिखाई दे रहा है कि जिस वक्त बच्चे इमारत से छलांग लगा रहे थे, उस वक्त दमकल सामने खड़ी थीं। लेकिन, उनकी सीढ़ियां ऊपरी मंजिल तक नहीं पहुंच पाईं।

सीएम ने हादसे की रिपोर्ट मांगी

  • गुजरात के सीएम मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने हादसे पर दुख जाहिर किया। उन्होंने बच्चों के परिवारों के लिए मुआवजे का ऐलान किया और कहा कि एक दिन के भीतर हादसे की जांच रिपोर्ट पेश की जाए। रुपाणी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से बात की है। नड्डा ने एम्स ट्रामा सेंटर के निदेश को हर मदद के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। दिल्ली एम्स में भी डॉक्टरों की एक टीम को अलर्ट रखा गया है।

कॉम्प्लेक्स की चौथी मंजिल अवैध रूप से बनी

  • प्रशासन के अनुसार, तक्षशिला नाम का यह कॉम्प्लेक्स कागजों में तीन मंजिला है। इसमें जिम, फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट, नर्सिंग होम समेत कई शॉपिंग सेंटर्स हैं। इसकी चौथी मंजिल अवैध है। ऐसी रिपोर्ट्स के बाद गुजरात के सीएम विजय रूपाणी ने जांच के आदेश दिए हैं। हालांकि, देर रात तक लापरवाही के लिए किसी को आरोपी नहीं ठहराया गया था। आग साढ़े तीन बजे लगी थी। 10 मिनट बाद फायर ब्रिगेड पहुंच गई थी, लेकिन पानी भरने उन्हें दोबारा 20 किमी दूर भेजा गया।

गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज

  • सरथाणा पुलिस ने तीन के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज हुआ है। आरोपियों में हरसुल वेकरिया उर्फ एचके, जिग्नेश सवजी पाघडाल और भार्गव बूूटाणी शामिल हैं। पुलिस की प्राथमिक जांच में पता चला है कि हरसुल और जिग्नेश ने बिल्डर से पूरी मंजिल खरीदी थी। उसके बाद अवैध निर्माण करवाया था। जबकि, भार्गव बूटाणी ड्राइंग क्लासेस का संचालक है। धारा 304 और 308 के तहत मामला दर्ज हुआ है।

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ममता बनर्जी के गढ़ में बीजेपी के मजबूत प्रदर्शन के कारण क्या ?

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  • नईदिल्ली 25 मई 2019
  • लोकसभा चुनाव 2019 में भारी जीत दर्ज कर बीजेपी ने 2014 के अपने प्रदर्शन को भी पीछे छोड़ दिया है. हिंदी पट्टी में उसे भारी जीत तो मिली ही है, उसे पश्चिम बंगाल में भी अच्छी सफलता मिली है. जब अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे बंगाल में 23 सीट जीतेंगे तो बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने घोषणा की थी कि उनकी पार्टी सभी 42 सीटों पर जीत दर्ज करेगी. उन्होंने एग्ज़िट पोल के उस नतीजे को खुलेआम ठुकरा दिया था जिसने इस बात की भविष्यवाणी की थी कि बीजेपी को काफ़ी सीटें मिल सकती हैं.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी का उदय

  • बीजेपी बंगाल में 18 संसदीय सीटों पर जीत दर्ज कर चुकी है और एक सामान्य सा प्रश्न है कि बंगाल में बीजेपी के इस मज़बूत प्रदर्शन के क्या कारण हैं जबकि बंगाल को धर्मनिरपेक्षता का गढ़ कहा जाता रहा है. निश्चित रूप से, बीजेपी के इस उत्थान के कई कारण और कारक हैं. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 291 सीटों वाली विधानसभा में मात्र तीन सीटें मिली थी. इसके पहले 2014 के संसदीय चुनाव में बीजेपी को मात्र दो सीटों पर जीत मिली थी. चुनावों में इस ख़राब प्रदर्शन ने बीजेपी को अपनी संगठनात्मक संरचना को ठीक करने को प्रेरित किया ताकि वह 17वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर सके. राहुल सिन्हा और पूर्व पर्यवेक्षक सिद्धार्थ नाथ सिंह के नेतृत्व में राज्य में भाजपा बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई थी और इसी वजह से पार्टी में संरचनात्मक परिवर्तन की ज़रूरत स्वीकार कर ली गई और इसी का परिणाम है कि आज राज्य में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर 40.25% हो गया है.

दल-बदल

  • बीजेपी को तृणमूल कांग्रेस से बीजेपी में आने वाले नेताओं से काफ़ी मदद मिली. टीएमसी के पूर्व उपाध्यक्ष मुकुल रॉय ममता बनर्जी से अनबन होने के कारण 2017 में बीजेपी में शामिल हुए. यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि बीजेपी में उनकी मौजूदगी ने बीजेपी को बंगाल के मतदाताओं को ध्यान में रखकर रणनीति बनाने में मदद की. जॉन बरला और निशीथ प्रमाणिक जो क्रमशः अलिपुरद्वार और कूचबिहार से चुनाव जीते हैं, वे भी टीएमसी से आए हुए हैं. तृणमूल और अन्य राजनीतिक दलों के असंतुष्टों को जगह देने में बीजेपी ने कोई कोताही नहीं बरती.
  • वाम मोर्चा और कांग्रेस पहले तो सीटों की साझेदारी पर राज़ी हो गए थे पर अंततः बात बनी नहीं और यह बीजेपी के लिए सोने पर सुहागा साबित हुआ. उसने बंगाल के राजनीतिक मैदान में विपक्ष के ख़ाली जगह को भरने के मौक़े को हाथ से नहीं जाने दिया. इस चुनाव में टीएमसी को 43.28% वोट मिला है और वाम दल को कोई जीत नहीं मिली है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वाम समीकरण ने बीजेपी को अप्रत्यक्ष रूप से मदद की है.
    वोट ट्रांसफ़र
  • यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ममता पर अल्पसंख्यकों का वोट पाने के लिए उनके तुष्टीकरण का आरोप लगाया जाता रहा है. ममता बनर्जी ने अपने बयानों से बीजेपी की हिंदुत्ववादी विचारधारा की आलोचना की और इस बात का सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि भारी संख्या में हिन्दुओं ने ममता की इस आलोचना से नाराज़ होकर बीजेपी को वोट दिया है. दूसरी ओर, अल्पसंख्यकों के वोट ममता बनर्जी को मिले हैं और उनको ज़्यादा सीट मिलने की यह एक वजह है.
  • तथ्य यह है कि पार्टी को 2018 के पंचायत चुनावों में 18% वोट मिले थे जबकि 33% पंचायतों में टीएमसी को बिना किसी विरोध के विजय मिली थी. पार्टी को इससे नई गति मिली और अधिकांश चुनाव अभियानों में मोदी-शाह ने ममता बनर्जी पर पंचायत चुनाव की तरह ही इस चुनाव में भी हिंसा को अपनी जीत का हथियार बनाने का आरोप लगाया.
  • इन सबके बीच मीडिया की भूमिका को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. मीडिया द्वारा बीजेपी की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आने की बात कहने से चुनाव-बाद पार्टी की छवि बेहतर हुई है. एग्ज़िट पोल में जो भविष्यवाणी की गई थी उसमें यह बताया गया था कि टक्कर बीजेपी और अन्य पार्टियों में है. दिल्ली की ओर कूच करने में क्षेत्रीय दलों को या तो बिलकुल ही नहीं या फिर बहुत ही कम महत्व दिया गया. भारत जैसे संघीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हितों के बीच अंतर काफ़ी स्पष्ट हो जाता है.
  • इसके बाद बात उठती है हिंदुत्व की भावना की. राजनीतिक विश्लेषक शिबज़ी प्रतिम बसु के मुताबिक़, न केवल नरेंद्र मोदी या अमित शाह, पार्टी की प्रदेश इकाई राज्य के हिंदू वोटरों में हिंदुत्व की भावना भरने में सफल रही है. पार्टी की अंदरूनी कलह और खेमेबाज़ी को परे रखने और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मज़बूत बनाने में हिंदुत्व की भावना ने चमत्कारिक भूमिका निभाई है. यहां तक कि राज्य में बीजेपी के चुनाव अभियान के दौरान नेताओं ने हिंदुत्व की प्रत्यक्ष चर्चा से बचते हुए एनआरसी और घुसपैठियों की समस्या के संदर्भ में इसकी चर्चा की. इस तरह जिस बीजेपी को 2014 के संसदीय चुनावों में 17%, 2016 के विधानसभा चुनावों में 10% वोट मिला था उसको 2019 के संसदीय चुनावों में 40% वोट प्राप्त होना किसी दुर्लभ उपलब्धि से कम नहीं है. सरल फॉर्मूला यह है कि वाम दलों के हिंदू समर्थक और ममता के टीएमसी से नाराज़ लोगों ने बीजेपी को वोट दिया है.
  • एक वरिष्ठ पत्रकार देबाशीश भट्टाचार्य के अनुसार, हुगली, आरामबाग, बोनगांव जैसी सीटों पर जहां दूसरी पार्टियों की मौजूदगी के बावजूद टीएमसी काफ़ी मज़बूत हुआ करती थी, वोटों की अदला-बदली ने अपनी भूमिका बख़ूबी निभाई है. टीएमसी को राज्य में कुल मिलाकर 6-7% वोटों की हानि हुई है और यह वोट बीजेपी को गया है.
  • इस क्षति के बावजूद यह स्पष्ट है कि वाम दलों से जुड़े 8-9% अल्पसंख्यक वोट टीएमसी को मिला है क्योंकि वे सत्ताधारी पार्टी के साथ जुड़कर ख़ुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं. जैसा कि इस समय कहा जा रहा है कि “बामेर वोट रामे” (वाम का वोट बीजेपी को) भारी संख्या में वामपंथी हिंदुओं ने बीजेपी को वोट दिया है और बीजेपी को मिले कुल वाम मतों का यह 15% है. इस तरह, सरल शब्दों में कहें तो वाम धड़ों में मौजूद हिंदू समर्थकों ने बीजेपी को वोट दिया है जबकि अल्पसंख्यकों ने ममता बनर्जी की टीएमसी को वोट दिया है.
  • उधर, वाम धड़ों में मौजूद अल्पसंख्यक वोट भी टीएमसी को उस समय से मिलते रहे हैं जबसे राज्य में वाम मोर्चा ढलान पर है और इस तरह टीएमसी का वोट शेयर बढ़कर 40% से 43.28% हो गया है.
  • यद्यपि अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी पर यह स्पष्ट है कि अल्पसंख्यक और धार्मिक कारकों की वजह से बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में बदलाव आया है, लेकिन इतना तो तय है कि 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में लड़ाई निश्चित रूप से बीजेपी बनाम टीएमसी के बीच ही होगी.

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