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अस्पताल के स्टाफ की एक बड़ी लापरवाही MRI मशीन में बुजुर्ग को डालकर भूल गए

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सेक्टर-6 के सामान्य अस्पताल के स्टाफ की एक बड़ी लापरवाही का मामला सामने आया है. यहां चल रहे एमआरआई (MRI) एंड सिटी स्कैन सेंटर में 61 साल के बुजुर्ग राममेहर को एमआरआई मशीन में डालकर वहां के टेक्नीशियन भूल गए. इस बीच मरीज की सांसें टूटने पर उन्‍होंने काफी हाथ-पांव मारे, लेकिन बेल्ट बंधी होने के कारण वह हिल भी नहीं सके. लेकिन, बुजुर्ग ने हिम्मत नहीं हारी और लगातार जोर लगाते रहे. इस बीच बेल्ट टूट गई और वह मशीन से बाहर निकलने में कामयाब रहे.

पीड़ित ने एमआरआई और सिटी स्कैन सेंटर के कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं और उनकी शिकायत हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज से की है. पीड़ित ने डीजी (हेल्थ) डॉ. सूरजभान कंबोज सेक्टर-5 स्थित थाने में भी इसकी शिकायत दी है. पीड़ित ने अपनी शिकायत में लिखा है कि अगर वह 30 सेकंड और बाहर नहीं आते तो उनकी मौत हो जाती.

सेंटर इचांर्ज ने कही यह बात

इस मामले में जब एमआरआई सेंटर के इंचार्ज से बात की तो उसने बताया कि इसमें टेक्नीशियन की कोई गलती नहीं है. उनका कहना था कि टेक्नीशियन ने ही पेशेंट को बाहर निकाला. बकौल सेंटर इंचार्च, मरीज का 20 मिनट का स्कैन था और टेक्नीशियन को आखिरी 3 मिनट का सीक्वेंस लेना था. अंत में सिर्फ दो मिनट रह गए थे. मरीज को घबराहत हुई और वह हिलने लग गए थे.

टेक्नीशियन ने किया था हिलने से मना

सिटी स्‍कैन सेंटर के इंचार्ज ने बताया कि टेक्नीशियन ने बुजुर्ग को हिलने-डुलने से मना किया था. इसके साथ ही टेक्नीशियन दूसरे सिस्टम में नोट्स चढ़ा रहा था, जब 1 मिनट रह गया था तो टेक्नीशियन ने देखा मरीज खुद ही आधा बाहर आ गया. इसके बाद टेक्नीशियन ने ही मरीज को बाहर निकाला.

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डेनमार्क में प्रेमियों को क्यों दिखाने पड़ रहे हैं ? रोमांस के सबूत

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ऐसे प्रेमी-प्रेमिकाएं जिनका रिश्ता 6 महीने से पुराना है, वे डेनमार्क में रह रहे अपने साथी से मिलने जा सकते हैं, बशर्तें वे सीमा पर तैनात पुलिस को अपने प्यार का कोई सबूत जैसे तस्वीर या लव लेटर दिखा सकें.

कोरोना वायरस के दौरान दुनिया के तमाम देश लॉकडाउन में हैं. कहीं- कहीं लॉकडाउन में ढील दी जा रही है लेकिन कुछ शर्तों के साथ. कुछ ऐसा ही स्कैंडिनेवियाई देश डेनमार्क  में दिख रहा है. यहां हाल ही में उन लोगों को पड़ोसी देशों से एंट्री मिल पा रही है, जो अपनी मंगेतर या जीवनसाथी से मिलने के लिए आना चाहते हैं. प्रेमियों को भी इसकी छूट है, अगर उनका रिश्ता कोरोना से पहले शुरू हो चुका हो और उनके पास प्यार का कोई सबूत हो.

शुरू हुई नई रवायत

डेनमार्क में इसी 25 मई से नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और आइसलैंड के ऐसे जोड़ों को मिलने की छूट मिलने लगी है अगर उनके पास आने का वैध मकसद हो. इस वैध मकसद में एक मकसद अपने प्रेमी या प्रेमिका या मंगेतर से मिलना भी एक है. लेकिन इसकी 2 शर्तें हैं- पहली, रिश्ता कम से कम 6 महीने पुराना जरूर हो और दूसरी शर्त ये है कि एंट्री बॉर्डर पर शख्स को अपने प्यार का कोई पक्का सबूत देना होगा. सबूत के तौर पर साथ ही कोई तस्वीर, कोई लव लेटर हो सकता है. ये भी बताना होगा कि मिलने वाले लगातार कोरोना से पहले आपस में लगातार मिलते-जुलते रहे हैं.

छह महीने पुराना हो प्यार

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक डेनमार्क के डेली ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन DR को दिए एक इंटरव्यू में डिप्टी पुलिस अधिकारी एलेन डेगलर ने कहा कि हालांकि रिश्ते में होना या सबूत दिखाना जैसी बातें काफी निजी हैं लेकिन पार्टनर को एंट्री मिलेगी या नहीं, ये बात पुलिस अफसर पर निर्भर करती है. बाद में डेनिश सरकार ने कहा कि प्रेमियों को अपने पार्टनर और अपनी फोटो दिखाने की भी जरूरत नहीं, अगर वे लिखित में कह सकें कि वे फलां से रिश्ते में हैं. और रिश्ता 6 महीने से ज्यादा वक्त से चला आ रहा है.

ऑनलाइन प्यार पर पहरा

लॉकडाउन में उन प्रेमिकों के लिए नरमी की कोई गुंजाइश नहीं, जो ऑनलाइन प्यार में रहते रहे हों. नियम के तहत ऐसे जोड़ों को एंट्री नहीं मिल रही है जिनका प्यार सिर्फ इंटरनेट या फोन या खतों पर निर्भर रहा हो. डेनमार्क की सरकार का कहना है कि फिलहाल ऑनलाइन रिलेशनशिप के लिए बॉर्डर नहीं खोला जा सकता. यानी जो लोग फोन पर बात करते हुए प्यार में आए हों या फिर फोन पर ही बात करते रहे हों, वे अगर अभी के माहौल में मिलना भी चाहें तो मुमकिन नहीं.

विरोध में आए लोग

हालांकि बेहद आधुनिक माने जाते रहे इस स्कैंडिनेवियाई देश के नए एंट्री नियमों की आलोचना हो रही है. खासकर कानून के जानकार इसपर आपत्ति जता रहे हैं. उनका मानना है कि ये प्राइवेसी के अधिकार में दखल है. सोशल लिबरल पार्टी के क्रिश्चियन हेगर्ड का मानना है कि ऐसे किसी देश के बारे में अब तक नहीं सुना गया जो प्रेमी जोड़ों के इंटिमेट मैसेज या तस्वीरें देखकर प्रवेश की इजाजत दे. आखिरकार कपल्स को एक-दूसरे के मिलने की छूट तो मिल रही है लेकिन इसके लिए प्राइवेसी की उल्लंघन नहीं होना चाहिए.

इनके लिए भी एंट्री में छूट

इसी सोमवार यानी 25 मई से लॉकडाउन में छूट को लेकर ये नया नियम लागू हुआ. इसके तहत कपल्स के अलावा दादा-दादी, नानी-नाना भी अपने बच्चों के बच्चों से मिलने आ सकते हैं. इसमें उन्हें भी छूट मिलेगी जो डेनमार्क के कॉलेज में पढ़ते हों या फिर डेनमार्क में उनकी किसी बीमारी का इलाज चल रहा हो. वैसे सैलानी, जिनका डेनमार्क में हॉलीडे होम हो, वे भी अब कागज दिखाकर यहां आ सकते हैं. हालांकि ऐसे सैलानियों को एंट्री नहीं मिलेगी, जो होटल, रिजॉर्ट या किराए के घर में छुट्टियां बिताने के लिए डेनमार्क आना चाहते हों.

माना जा रहा है कि इसी हफ्ते के आखिर तक डेनमार्क में लॉकडाउन और दूसरे देशों की एंट्री को लेकर एक नई गाइडलाइन आ सकती है.

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देश-दुनिया

यहाँ मिले 50 से अधिक मरे हुए चमगादड़, देखिए कोरोना के कारण मौत पर क्या बोले वन अधिकारी

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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक हैरतअंगेज खबर सामने आई है, दरअसल गोरखपुर के बेलघाट में 52 चमगादड़ मरे हुए मिले हैं। डिविजनल फारेस्ट अफसर अवनीश कुमार ने बताया कि बेलघाट में जो 52 चमगादड़ मृत पाए गए हैं, उनमे से तीन चमगादड़ों की बॉडी पोस्टमार्टम के लिए IVRI बरैली भेजी जाएगी। अवनीश ने बताया कि अभी इन चमगादड़ों की मौत को कोरोनावायरस महामारी से जोड़ना अभी ठीक नहीं है, इनकी मौत का कारण कीटनाशक दवाईयां या अन्य कुछ हो सकती है।

उन्होंने कहा कि हमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आने का इंतजार करना चाहिए, क्योंकि उसके बाद ही कुछ इनकी मौत का कारण स्पष्ट हो पाएगा। कोरोना वायरस चीन के वुहान शहर से निकला है, और ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति चमगादड़ों से ही हुई है।

भारत में अब तक कोरोनावायरस संक्रमित लोगों का आंकड़ा डेढ़ लाख के करीब पहुंच चुका है। देशभर में कोरोनावायरस संक्रमित लोगों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है, सिर्फ गोरखपुर की बात करें तो आज 6 नए मामले सामने आए हैं, जबकि एक व्यक्ति ने कोरोना के कारण दम तोड़ दिया।

 

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देश-दुनिया

स्वीडन के इतिहास में छिपा है लॉकडाउन न करने का राज, जानें पूरी कहानी

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यूरोपीय देश स्वीडन अपने शानदार ह्यूमन इंडेक्स की वजह से दुनियाभर में पहचाना जाता है. इस देश को दुनिया के सबसे शांतिप्रिय और प्रगतिशील देशों की लिस्ट में जगह मिली हुई है. कोरोना वायरस से दुनिया के अन्य देशों की तरह स्वीडन भी जूझ रहा है. लेकिन इस महामारी की रोकथाम के लिए उठाए गए कदमों को लेकर स्वीडन की चर्चा एक बार फिर पूरी दुनिया में हो रही है. दिलचस्प रूप से स्वीडन ने कोरोना वायरस को रोकने के लिए अपने यहां कोई लॉकडाउन नहीं किया और न ही हेल्थ इमरजेंसी घोषित की. स्वीडन द्वारा अपनाए गए इन तरीकों की कई जगह आलोचनाएं भी हुईं.

अब बीते सप्ताह आई एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वीडन में कोरोना डेथ रेट दुनिया में सबसे ज्यादा है. लेकिन इसके बावजूद भी स्वीडन की सरकार लॉकडाउन या कोई सख्त कदम उठाने को तैयार नहीं है. ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में प्रकाशित एक लेख में स्वीडन द्वारा लॉकडाउन न किए जाने के फैसले की पड़ताल की है. इस लेख के मुताबिक स्वीडन के इस बड़े फैसले के पीछे उसका 100 सालों का इतिहास काम कर रहा है.

इस लेख में कहा गया है कि स्वीडन ने कोरोना वायरस को किसी नेशनल इमरजेंसी के तौर पर देखने के बजाए एक सीरियस पब्लिक हेल्थ प्रॉब्लम के तौर पर देखा है. दुनिया के अन्य देश कोरोना को भले ही एक अदृश्य दुश्मन मान रहे हों लेकिन स्वीडन ऐसा नहीं मानता. सरकार का मानना है कि इस महामारी से लड़ने के लिए बेहद सख्त कानून की बजाए लोगों में जागरुकता पैदा करना ज्यादा जरूरी है. किसी हेल्थ क्राइसिस के दौर में सिविल लिबर्टी को खत्म कर देने के फैसले को ज्यादा बुरा माना गया. हालांकि ये भी सच है कि इसी दौरान आस-पास के अन्य नॉर्डिक देश जैसे डेनमार्क और नॉर्वे ने लॉकडाउन किया. लेकिन स्वीडन ने इन सभी देशों के फैसलों से खुद को अलग रखा.

द गार्जियन के लेख में कहा गया है कि सख्त उपाय न करने के पीछे स्वीडन का बीते सौ सालों का इतिहास भी जिम्मेदार हो सकता है. दरअसल देश में बीते सौ सालों के दौरान कोई भी नेशनल इमरजेंसी या त्रासदी नहीं आई है. 1909 में देश में हुई बड़ी हड़ताल के बाद अब तक कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन या संघर्ष देश में नहीं हुआ है. जबकि इस दौरान यूरोप के अन्य देशों ने कई युद्धों में हिस्सा लिया या फिर उनके यहां बड़े सामाजिक आंदोलन हुए. जैसे ब्रिटेन में खदान मजदूरों की हड़ताल या फिर स्पेन और फिनलैंड में हुए गृह युद्ध जैसे हालातों से स्वीडन बिल्कुल नावाकिफ है. स्वीडिश लोगों के बारे में आस-पास के देशों में धारणा है कि ये लोग कॉन्फ्लिक्ट से बेहद दूरी बनाकर रखते हैं.

इसके अलावा 1810 के बाद से स्वीडन किसी भी देश के साथ सशस्त्र संघर्ष में नहीं उलझा है. लेकिन उसके पड़ोसी देश नॉर्वे और डेनमार्क पर जर्मनी ने द्वितीय विश्व युद्द के दौरान हमला कर दिया था. वहीं फिनलैंड पर सोवियत ने हमला कर दिया था. लेकिन स्वीडन द्वितीय विश्व युद्ध से भी बचकर निकल गया.

शायद यही वजह है कि जब कोरोना वायरस से दुनियाभर के देश हैरान-परेशान थे तब भी स्वीडन ने कठोर कदमों से परहेज रखा. वहां की सरकार ने सिविल लिबर्टी को कोरोना वायरस से भी ऊपर तरजीह दी है. और शायद यही वजह है कि स्वीडन का हेल्थ डिपार्टमेंट हर्ड इम्यूनिटी जैसे कॉन्सेप्ट की बात करता दिखता है जिसे दुनिया के अन्य देश खतरनाक मान रहे हैं. लेकिन स्वीडिश हेल्थ एक्पर्ट्स का मानना है कि सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में पब्लिक को बताना ज्यादा जरूरी है, बजाए कि पैनिक सिचुएशन क्रिएट करने के. सरकार को भरोसा है कि वो कोरोना वायरस से भी जंग जीत जाएगी. लेकिन इसके लिए वो कोई सख्त कदम नहीं उठाने जा रहे हैं.

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