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मोहन भागवत के आरक्षण मुद्दे पर किये ट्वीट से मचा बवाल ! जाने आरक्षण आखिर चीज क्या है ?

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मोहन भगवत ने ट्विटर पर जारी बयान में कहा कि समाज में सदभावना पूर्वक परस्पर बातचीत के आधार पर सब प्रश्नों के समाधान का महत्व बताते हुए आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर विचार व्यक्त करने का आह्वान किया 

 

आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के बयान के बाद विपक्ष दल तिलमिलाए हुए हैं. कांग्रेस ने आरएसएस और बीजेपी पर दलित-पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाया.

आरक्षण क्या है ?इस पर भी आइये एक नजर डालते हैं ?

जाति व्यवस्था नामक सामाजिक वर्गीकरण के एक रूप के सदियों से चले आ रहे अभ्यास के परिणामस्वरूप भारत अनेक अंतर्विवाही समूहों, या जातियों और उपजातियों में विभाजित है। आरक्षण नीति के समर्थकों का कहना है कि परंपरागत रूप से चली आ रही जाति व्यवस्था में निचली जातियों के लिए घोर उत्पीड़न और अलगाव है और शिक्षा समेत उनकी विभिन्न तरह की आजादी सीमित है। “मनु स्मृति” जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जाति एक “वर्णाश्रम धर्म” है, जिसका अर्थ हुआ “वर्ग या उपजीविका के अनुसार पदों का दिया जाना”. वर्णाश्रम (वर्ण + आश्रम) के “वर्ण” शब्द के समानार्थक शब्द ‘रंग’ से भ्रमित नहीं होना चाहिए। भारत में जाति प्रथा ने इस नियम का पालन किया।

1882 – हंटर आयोग की नियुक्ति हुई। महात्मा ज्योतिराव फुले ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग की।

1891- त्रावणकोर के सामंती रियासत में 1891 के आरंभ में सार्वजनिक सेवा में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी करके विदेशियों को भर्ती करने के खिलाफ प्रदर्शन के साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए मांग की गयी।

1901- महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण शुरू किया गया। सामंती बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में आरक्षण पहले से लागू थे।

1908- अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था, के लिए आरक्षण शुरू किया गया।

1909 – भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1919- मोंटागु-चेम्सफोर्ड सुधारों को शुरु किया गया।

1919 – भारत सरकार अधिनियम 1919 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1921 – मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।

1935 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया, जो पूना समझौता कहलाता है, जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए।

1935- भारत सरकार अधिनियम 1935 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1942 – बी आर अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की। उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की।

1946 – 1946 भारत में कैबिनेट मिशन अन्य कई सिफारिशों के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव दिया।

1947 में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की। डॉ॰ अम्बेडकर को संविधान भारतीय के लिए मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। भारतीय संविधान ने केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएं रखी गयी हैं।10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए हैं। (हर दस साल के बाद सांविधानिक संशोधन के जरिए इन्हें बढ़ा दिया जाता है).

1947-1950 – संविधान सभा में बहस.

26/01/1950- भारत का संविधान लागू हुआ।

1953 – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग को स्थापित किया गया। जहां तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का संबंध है रिपोर्ट को स्वीकार किया गया। अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी (OBC)) वर्ग के लिए की गयी सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया गया।

1956- काका कालेलकर की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचियों में संशोधन किया गया।

1976- अनुसूचियों में संशोधन किया गया।

1979 – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित किया गया।आयोग के पास उपजाति, जो अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी (OBC)) कहलाती है, का कोई सटीक आंकड़ा था और ओबीसी की 52% आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1930 की जनगणना के आंकड़े का इस्तेमाल करते हुएपिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया।

1980 – आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए 22% से 49.5% वृद्धि करने की सिफारिश की 2006 के अनुसार  पिछड़ी जातियों की सूची में जातियों की संख्या 2297 तक पहुंच गयी, जो मंडल आयोग द्वारा तैयार समुदाय सूची में 60% की वृद्धि है।

1990 मंडल आयोग की सिफारिशें विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया। छात्र संगठनों ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह की कोशिश की। कई छात्रों ने इसका अनुसरण किया।

1991- नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10% आरक्षण शुरू किया।

1992- इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को सही ठहराया. आरक्षण और न्यायपालिका अनुभाग भी देखें

1995- संसद ने 77वें सांविधानिक संशोधन द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरक्की के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए अनुच्छेद 16(4)(ए) डाला। बाद में आगे भी 85वें संशोधन द्वारा इसमें अनुवर्ती वरिष्ठता को शामिल किया गया था।

1998- केंद्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समुदायों की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण का आंकड़ा 32% है . जनगणना के आंकड़ों के साथ समझौ्तावादी पक्षपातपूर्ण राजनीति के कारण अन्य पिछड़े वर्ग की सटीक संख्या को लेकर भारत में काफी बहस चलती रहती है। आमतौर पर इसे आकार में बड़े होने का अनुमान लगाया गया है, लेकिन यह या तो मंडल आयोग द्वारा या और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा दिए गए आंकड़े से कम है।. मंडल आयोग ने आंकड़े में जोड़-तोड़ करने की आलोचना की है। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने संकेत दिया कि बहुत सारे क्षेत्रों में ओबीसी (OBC) की स्थिति की तुलना अगड़ी जाति से की जा सकती है।

12 अगस्त 2005- उच्चतम न्यायालय ने पी. ए. इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में 12 अगस्त 2005 को 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए घोषित किया कि राज्य पेशेवर कॉलेजों समेत सहायता प्राप्त कॉलेजों में अपनी आरक्षण नीति को अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक पर नहीं थोप सकता हैं।

2005- निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया। इसने अगस्त 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को प्रभावी रूप से उलट दिया।

2006- सर्वोच्च न्यायालय के सांविधानिक पीठ में एम. नागराज और अन्य बनाम यूनियन बैंक और अन्य के मामले में सांविधानिक वैधता की धारा 16(4) (ए), 16(4) (बी) और धारा 335 के प्रावधान को सही ठहराया गया।

2006- से केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण शुरू हुआ। कुल आरक्षण 49.5% तक चला गया। हाल के विकास भी देखें.

2007- केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी (OBC) आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगन दे दिया।

2008-भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल 2008 को सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27% ओबीसी (OBC) कोटा शुरू करने के लिए सरकारी कदम को सही ठहराया. न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपनी पूर्व स्थिति को दोहराते हुए कहा कि “मलाईदार परत” को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। क्या आरक्षण के निजी संस्थानों आरक्षण की गुंजाइश बनायी जा सकती है, सर्वोच्च न्यायालय इस सवाल का जवाब देने में यह कहते हुए कतरा गया कि निजी संस्थानों में आरक्षण कानून बनने पर ही इस मुद्दे पर निर्णय तभी लिया जा सकता है। समर्थन करने वालों की ओर से इस निर्णय पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आयीं और तीन-चौथाई ने इसका विरोध किया।

मलाईदार परत को पहचानने के लिए विभिन्न मानदंडों की सिफारिश की गयी, जो इस प्रकार हैं:

साल में 250,000 रुपये से ऊपर की आय वाले परिवार को मलाईदार परत में शामिल किया जाना चाहिए और उसे आरक्षण कोटे से बाहर रखा गया। इसके अलावा, डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, अभिनेता, सलाहकारों, मीडिया पेशेवरों, लेखकों, नौकरशाहों, कर्नल और समकक्ष रैंक या उससे ऊंचे पदों पर आसीन रक्षा विभाग के अधिकारियों, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों, सभी केंद्र और राज्य सरकारों के ए और बी वर्ग के अधिकारियों के बच्चों को भी इससे बाहर रखा गया। अदालत ने सांसदों और विधायकों के बच्चों को भी कोटे से बाहर रखने का अनुरोध किया है।

भारतीय न्यायपालिका ने आरक्षण को जारी रखने के लिए कुछ निर्णय दिए हैं और इसे सही ढंग से लागू करने के लिए के कुछ निर्णय सुनाया है। आरक्षण संबंधी अदालत के अनेक निर्णयों को बाद में भारतीय संसद द्वारा संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से बदलाव लाया गया है। भारतीय न्यायपालिका के कुछ फैसलों का राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा उल्लंघन भी किया गया है।शैक्षिक संस्थानों और नौकरियों में सीटें विभिन्न मापदंड के आधार पर आरक्षित होती हैं। विशिष्ट समूह के सदस्यों के लिए सभी संभावित पदों को एक अनुपात में रखते हुए कोटा पद्धति को स्थापित किया जाता है। जो निर्दिष्ट समुदाय के तहत नहीं आते हैं, वे केवल शेष पदों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जबकि निर्दिष्ट समुदाय के सदस्य सभी संबंधित पदों (आरक्षित और सार्वजनिक) के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

आरक्षण के प्रकार :

  • जातिगत आधार
  • प्रबंधन कोटा
  • लिंग आधारित
  • धर्म आधारित
  • अधिवासियों के राज्य
  • पूर्वस्नातक महाविद्यालय
  • स्वतंत्रता सेनानियों के बेटे/बेटियों/पोते/पोतियों के लिए।
  • शारीरिक रूप से विकलांग.
  • खेल हस्तियों.
  • शैक्षिक संस्थानों में अनिवासी भारतीयों (एनआरआई (NRI)) के लिए छोटे पैमाने पर सीटें आरक्षित होती हैं। उन्हें अधिक शुल्क और विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है (नोट: 2003 में एनआरआई आरक्षण आईआईटी से हटा लिया गया था).
  • विभिन्न संगठनों द्वारा उम्मीदवार प्रायोजित होते हैं।
  • जो सशस्त्र बलों में काम कर चुके हैं (सेवानिवृत सैनिक कोटा), उनके लिए।
  • कार्रवाई में मारे गए सशस्त्र बलों के कर्मियों के आश्रितों के लिए।
  • स्वदेश लौट आनेवालों के लिए।
  • जो अंतर-जातीय विवाह से पैदा हुए हैं।
  • सरकारी उपक्रमों/सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के विशेष स्कूलों (जैसे सेना स्कूलों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के स्कूलों आदि) में उनके कर्मचारियों के बच्चों के लिए आरक्षण.
  • पूजा स्थलों (जैसे तिरूपति (बालाजी) मंदिर, तिरुथानी मुरुगन (बालाजी) मंदिर) में भुगतान मार्ग आरक्षण है।
  • वरिष्ठ नागरिकों/पीएच (PH) के लिए सार्व‍जनिक बस परिवहन में सीट आरक्षण.

आरक्षण के समर्थन में तर्क :

  • आरक्षण भारत में एक राजनीतिक आवश्यकता है क्योंकि मतदान की विशाल जनसंख्या का प्रभावशाली वर्ग आरक्षण को स्वयं के लिए लाभप्रद के रूप में देखता है। सभी सरकारें आरक्षण को बनाए रखने और/या बढाने का समर्थन करती हैं। आरक्षण कानूनी और बाध्यकारी हैं। गुर्जर आंदोलनों (राजस्थान, 2007-2008) ने दिखाया कि भारत में शांति स्थापना के लिए आरक्षण का बढ़ता जाना आवश्यक है।
  • हालांकि आरक्षण योजनाएं शिक्षा की गुणवत्ता को कम करती हैं लेकिन फिर भी अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, ब्राजील आदि अनेक देशों में सकारात्मक कार्रवाई योजनाएं काम कर रही हैं। हार्वर्ड विश्वविद्याल में हुए शोध के अनुसार सकारात्मक कार्रवाई योजनाएं सुविधाहीन लोगों के लिए लाभप्रद साबित हुई हैं। अध्ययनों के अनुसार गोरों की तुलना में कम परीक्षण अंक और ग्रेड लेकर विशिष्ट संस्थानों में प्रवेश करने वाले कालों ने स्नातक के बाद उल्लेखनीय सफलता हासिल की। अपने गोरे सहपाठियों की तुलना में उन्होंने समान श्रेणी में उन्नत डिग्री अर्जित की हैं। यहां तक कि वे एक ही संस्थाओं से कानून, व्यापार और औषधि में व्यावसायिक डिग्री प्राप्त करने में गोरों की तुलना में जरा अधिक होनहार रहे हैं। वे नागरिक और सामुदायिक गतिविधियों में अपने गोरे सहपाठियों से अधिक सक्रिय हुए हैं।
  • हालांकि आरक्षण योजनाओं से शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है लेकिन विकास करने में और विश्व के प्रमुख उद्योगों में शीर्ष पदों आसीन होने में, अगर सबको नहीं भी तो कमजोर और/या कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के अनेक लोगों को सकारात्मक कार्रवाई से मदद मिली है। (तमिलनाडु पर अनुभाग देखें) शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण एकमात्र समाधान नहीं है, यह सिर्फ कई समाधानों में से एक है। आरक्षण कम प्रतिनिधित्व जाति समूहों का अब तक का प्रतिनिधित्व बढ़ाने वाला एक साधन है और इस तरह परिसर में विविधता में वृद्धि करता है।
  • हालांकि आरक्षण योजनाएं शिक्षा की गुणवत्ता को कमजोर करती हैं, लेकिन फिर भी हाशिये में पड़े और वंचितों को सामाजिक न्याय प्रदान करने के हमारे कर्तव्य और उनके मानवीय अधिकार के लिए उनकी आवश्यकता है। आरक्षण वास्तव में हाशिये पर पड़े लोगों को सफल जीवन जीने में मदद करेगा, इस तरह भारत में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी व्यापक स्तर पर जाति-आधारित भेदभाव को ख़त्म करेगा। (लगभग 60% भारतीय आबादी गांवों में रहती है)
  • आरक्षण-विरोधियों ने प्रतिभा पलायन और आरक्षण के बीच भारी घाल-मेल कर दिया है। प्रतिभा पलायन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार बड़ी तेजी से अधिक अमीर बनने की “इच्छा” है। अगर हम मान भी लें कि आरक्षण उस कारण का एक अंश हो सकता है, तो लोगों को यह समझना चाहिए कि पलायन एक ऐसी अवधारणा है, जो राष्ट्रवाद के बिना अर्थहीन है और जो अपने आपमें मानव जाति से अलगाववाद है। अगर लोग आरक्षण के बारे में शिकायत करते हुए देश छोड़ देते हैं, तो उनमें पर्याप्त राष्ट्रवाद नहीं है और उन पर प्रतिभा पलायन लागू नहीं होता है।
  • आरक्षण-विरोधियों के बीच प्रतिभावादिता (meritrocracy) और योग्यता की चिंता है। लेकिन प्रतिभावादिता समानता के बिना अर्थहीन है। पहले सभी लोगों को समान स्तर पर लाया जाना चाहिए, योग्यता की परवाह किए बिना, चाहे एक हिस्से को ऊपर उठाया जाय या अन्य हिस्से को पदावनत किया जाय. उसके बाद, हम योग्यता के बारे में बात कर सकते हैं। आरक्षण या “प्रतिभावादिता” की कमी से अगड़ों को कभी भी पीछे जाते नहीं पाया गया। आरक्षण ने केवल “अगड़ों के और अधिक अमीर बनने और पिछड़ों के और अधिक गरीब होते जाने” की प्रक्रिया को धीमा किया है। चीन में, लोग जन्म से ही बराबर होते हैं। जापान में, हर कोई बहुत अधित योग्य है, तो एक योग्य व्यक्ति अपने काम को तेजी से निपटाता है और श्रमिक काम के लिए आता है जिसके लिए उन्हें अधिक भुगतान किया जाता है। इसलिए अगड़ों को कम से कम इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि वे जीवन भर सफेदपोश नागरिक हुआ करते हैं।

आरक्षण के विरोध  में तर्क  :

  • जाति आधारित आरक्षण संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक विचार के एक कारक के रूप में समाज में जाति की भावना को कमजोर करने के बजाय उसे बनाये रखता है। आरक्षण संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति का एक साधन है।
  • कोटा आवंटन भेदभाव का एक रूप है, जो कि समानता के अधिकार के विपरीत है।
  • आरक्षण ने चुनावों को जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ बदला लेने के गर्त में डाल दिया है और इसने भारतीय समाज को विखंडित कर रखा है। चुनाव जीतने में अपने लिए लाभप्रद देखते हुए समूहों को आरक्षण देना और दंगे की धमकी देना भ्रष्टाचार है और यह राजनीतिक संकल्प की कमी है। यह आरक्षण के पक्ष में कोई तर्क नहीं है।
  • आरक्षण की नीति एक व्यापक सामाजिक या राजनीतिक परीक्षण का विषय कभी नहीं रही। अन्य समूहों को आरक्षण देने से पहले, पूरी नीति की ठीक से जांच करने की जरूरत है और लगभग 60 वर्षों में इसके लाभ का अनुमान लगाया जाना जरूरी है।
  • शहरी संस्थानों में आरक्षण नहीं, बल्कि भारत का 60% जो कि ग्रामीण है उसे स्कूलों, स्वास्थ्य सेवा और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है।
  • “अगड़ी जातियों” के गरीब लोगों को पिछड़ी जाति के अमीर लोगों से अधिक कोई भी सामाजिक या आर्थिक सुविधा प्राप्त नहीं है। वास्तव में परंपरागत रूप से ब्राह्मण गरीब हुआ करते हैं।
  • आरक्षण के विचार का समर्थन करते समय अनेक लोग मंडल आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हैं। आयोग मंडल के अनुसार, भारतीयों की 52% आबादी ओबीसी श्रेणी की है, जबकि राष्ट्रीय सर्वेक्षण नमूना 1999-2000 के अनुसार, यह आंकड़ा सिर्फ 36% है (मुस्लिम ओबीसी को हटाकर 32%).
  • सरकार की इस नीति के कारण पहले से ही प्रतिभा पलायन में वृद्धि हुई है और आगे यह और अधिक बढ़ सकती है। पूर्व स्नातक और स्नातक उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयों का रुख करेंगे।
  • अमेरिकी शोध पर आधारित आरक्षण-समर्थक तर्क प्रासंगिक नहीं हैं क्योंकि अमेरिकी सकारात्मक कार्रवाई में कोटा या आरक्षण शामिल नहीं है। सुनिश्चित कोटा या आरक्षण संयुक्त राज्य अमेरिका में अवैध हैं। वास्तव में, यहां तक कि कुछ उम्मीदवारों का पक्ष लेने वाली अंक प्रणाली को भी असंवैधानिक करार दिया गया था।इसके अलावा, सकारात्मक कार्रवाई कैलिफोर्निया, वाशिंगटन, मिशिगन, नेब्रास्का और कनेक्टिकट में अनिवार्य रूप से प्रतिबंधित है. “सकारात्मक कार्रवाई” शब्दों का उपयोग भारतीय व्यवस्था को छिपाने के लिए किया जाता है जबकि दोनों व्यवस्थाओं के बीच बड़ा फर्क है।
  • आधुनिक भारतीय शहरों में व्यापारों के सबसे अधिक अवसर उन लोगों के पास हैं जो ऊंची जातियों के नहीं हैं। किसी शहर में उच्च जाति का होने का कोई फायदा नहीं है।
  • आरक्षण वैसे खत्म नहीं होना चाहिए सिर्फ आर्थिक स्थिति देखकर आरक्षण देना चाहिए जाति के आधार पर नहीं

समस्या का समाधान खोजने के लिए नीति में परिवर्तन के सुझाव निम्नलिखित हैं।

सच्चर समिति के सुझाव

  • सच्चर समिति जिसने भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन का अध्ययन किया है, ने असली पिछड़े और जरूरतमंद लोगों की पहचान के लिए निम्नलिखित योजना की सिफारिश की है।
योग्यता के आधार पर अंक: 60
घरेलू आय पर आधारित (जाति पर ध्यान दिए बिना) अंक : 13
जिला (ग्रामीण/शहरी और क्षेत्र) जहां व्यक्ति ने अध्ययन किया, पर आधारित अंक : 13
पारिवारिक व्यवसाय और जाति के आधार पर अंक : 14
कुल अंक : 100

सच्चर समिति ने बताया कि शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग हिंदुओं की उपस्थिति उनकी आबादी के लगभग बराबर/आसपास है। भारतीय मानव संसाधन मंत्री ने भारतीय मुसलमानों पर सच्चर समिति की सिफारिशों के अध्ययन के लिए तुरंत एक समिति नियुक्त कर दी, लेकिन किसी भी अन्य सुझाव पर टिप्पणी नहीं की। इस नुस्खे में जो विसंगति पायी गयी है वो यह कि प्रथम श्रेणी के प्रवेश/नियुक्ति से इंकार की स्थिति भी पैदा हो सकती है, जो कि स्पष्ट रूप से स्वाभाविक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

अन्य सुझाव

समस्या का समाधान खोजने के लिए नीति में परिवर्तन के सुझाव भी  हैं।

सच्चर समिति ने बताया कि शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग हिंदुओं की उपस्थिति उनकी आबादी के लगभग बराबर/आसपास है। भारतीय मानव संसाधन मंत्री ने भारतीय मुसलमानों पर सच्चर समिति की सिफारिशों के अध्ययन के लिए तुरंत एक समिति नियुक्त कर दी, लेकिन किसी भी अन्य सुझाव पर टिप्पणी नहीं की। इस नुस्खे में जो विसंगति पायी गयी है वो यह कि प्रथम श्रेणी के प्रवेश/नियुक्ति से इंकार की स्थिति भी पैदा हो सकती है, जो कि स्पष्ट रूप से स्वाभाविक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
कुल मिलाकर आरक्षण इस देश का ऐसा राजनैतिक मुद्दा है जिस पर सैकड़ों सालों से बवाल होता आया है ,यह भी सच है कि पूरी दुनिया में भारत के तरह आरक्षण की व्यवस्था नहीं है,दूसरा सच यह भी है कि इस लाभार्थी इसे बनाये रखना चाहेंगे और विरोधी इसे देश में वर्ग भेद पैदा करने वाले मानते हैं,,,,अब सरकार इस मुद्दे से कैसा निपटती है ये देखना महत्वपूर्ण होगा ,,,,,,

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है,,,,,जिगर मुरादाबादी

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देश इन दिनों : …..सबब मुंसिफ की बेरहमी का ,गुजारिश जान बक्शी की !

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सबब मुंसिफ की बेरहमी का ,गुजारिश जान बक्शी की

देश के ताज़ा हालात और ट्रेफिक जुर्मानें के कानून के अमल में हो रहे दरिंदगी से परेशान एक सम्पादकीय

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए,,,,,,

दुष्यंत कुमार की यह कविता हिन्दुस्तान के अवाम की बेबसी की कविता है ,,,,,,,,मसला निजाम की बेरुखी,बेदर्दी या बेरहमी का है या फिर मेरी बेबसी का ,,,,,समझ सको तो समझ लेना,,,, ,,,,वैसे हर वक्त के निजाम तुम्हारी तरह ही होते रहे होंगे ,,,मग़र मुझे शिकायत अपने साहेब खास से है,,,,,,आखिर ऐसा क्या है ? कि निजाम  जिनके लिए कानून बनाती है वे ही नाखुश होते हैं,आइये नजर डालते हैं मेरी शिकायतों के पुलिंदे पर :

  • सरकार का स्वच्छता मिशन,,,, सारे देश की सड़कें गुटखा और पान की पीक से रंगी,सरकार सफाई पर गंभीर, पर गंदगी के व्यापार से ऐतराज नहीं,
  • 75 फीसद घरों में पीने का साफ पानी तक नहीं है,पर पूरा देश पूरा ओ डी एफ हो गया,
  • 25 प्रतिशत गांवों के शौचालयविहीन परिवारों ने शौचालय बनाए ही नहीं, बावजूद इसके पूरा गांव ओडीएफ हो गया।
  • नोटबंदी और जीएसटी, देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लागू किया,मग़र अर्थव्यवस्था एक गहरी मंदी की ओर पहुँच गयी,
  • साल में दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया परंतु पिछले एक साल में ही  1.1 करोड़ लोगों ने रोजगार गंवा दिया
  • बेरोजगारी की दर 6.1फीसद हो गई,
  • देश में 11 करोड़ लोग पहले से ही बेरोजगार हैं,
  • बीएसएनएल जैसी सरकारी कंपनियों के पास 1.54 लाख कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए पैसे नहीं हैं,
  • 12 राष्ट्रीयकृत बैंकों का बकाया कर्ज 10 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच गया है,
  • 1999 के बाद पहली बार इतनी वैश्‍व‍िक निवेशक तेजी से बाजार से बाहर हुए,
  • सरकार ने  जिनके लिए ट्रेफिक का कानून बनाया ,उन्हें ही सरकारी भेड़ियों ने झिंझोड़ डाला,
  • सर की सलामती को हेलमेट जरुरी है,पर नशे पर सरकार ए आला खामोश हैं,जबकि देश का असल कातिल नशा है,
  • सरकार ने नारा दिया ‘क्या जान से ज्यादा जुर्माना’ महत्वपूर्ण है ? भेड़ियों ने साबित कर दिया हाँ ‘जान से ज्यादा जुर्माना’ महत्वपूर्ण है,
  • कश्मीर से  धारा 370 हटा दी तीन प्रदेश बना दिए मगर पूरी घाटी आज भी अशांत है, आखिर सब के पीछे कारण क्या है ?
  • बेसबब बेरोजगार अपनी बेरोजगारी से हार क़र फिर लौट चुके अपने गॉंव ,पर निजाम अब तक न जाने किस दुनिया में खोये हुए हैं ?
  • देश पेट की भूख और बेरोजगारी से परेशान है,बाजार की लगातार बुरी खबरों से लोग सहमें हैं और साहेब कि एन आर सी और मंदिर में व्यस्त हैं,

आइये दुष्यंत कुमार की इस कविता को पूरा पढ़ें शायद बात कुछ समझ आये

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए,

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो कमीज़ तो पाओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

वो मुतमुइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

साहिबे सरकार को चाहिए कि वो एक बार छत्तीसगढ़ आएं और उस सुकून को देखें कि कैसे बुरे वक्त में हम सूखी रोटी भी खाकर खुश रह लेते हैं ? कुछ समझ में आये तो पुरे देश को सुकून से जीने दें ये आपकी रोज रोज की तुनक, हमारी जिंदगी को बे मजा क़र देती है, गुजारिश है आपसे सुकून की जिंदगी नहीं तो, मौत तो सुकून की दे दीजिये………

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

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मोदी का गांधीवाद ?

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मोदी का गांधीवाद ? 

आइये जाने मोदी का गाँधीवाद  ?

भारतीय जनता पार्टी और आर एस एस के इतिहास पर गौर करें तो पाते हैं कि उसकी विचार धरा को स्थापित करने में वीरसावरकर  और दीन दयाल उपाध्याय सर्व प्रमुख रहे हैं  ,,,,,

सावरकर ने भारत के एक सार के रूप में एक सामूहिक “हिंदू” पहचान बनाने के लिए हिंदुत्व का शब्द गढ़ा ,,,,भाजपा लगातार इसी मार्ग पर चल भी रही है,मगर भारत में गैर हिन्दू भी बडी मात्रा में हैं, ऐसे में इस लाइन पर चलकर मोदी जी थोड़े असहज भी हो सकते हैं,हालाँकि मोदी जी की छवि तीसरे पंक्ति के हिंदुत्व वादी बड़े नेता की रही है,यानि वीर सावरकर (पहले वीर सावरकर फिर आडवाणी जी और उनके बिरसा के रूप में मोदी हुए ,इसकी अगली पंक्ति में योगी आदित्य नाथ हुए) के वे सीधे उत्तराधिकारी हैं ,,,,,

इसी तरह मोदी जी को दीनदयाल का एकात्मवादी राजनीतिक दर्शन भी विरासत में मिला जिस पर वे और पूरी भाजपा चलती आयी है,,,दीनदयाल  उपाध्याय जनसंघ के पितृ पुरुष हैं,,,, जिन्होनें भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद नामक विचारधारा दी।वे एक समावेशित विचारधारा के समर्थक थे,जो एक मजबूत व सशक्त भारत चाहते थे,उनका विचार था कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है।“ भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा .”मोदी ने इस लाइन पर भी चलकर लगातार पहले  गुजरात में फिर देश में नारा दिया “सबका साथ सबका विकास” ये एक समावेशी विकास की कोशिश थी हालाँकि 2014 की  इसी राजनैतिक नारे से शुरुआत हुई फिर राजनीति में गाय,गोबर, गौरक्षक, नोट बंदी और आधे अधूरे तैयारी से शुरू किये जी एस टी के मारे रास्ता राजनीति अपना रास्ता भटक गयी,फिर आखिर में मोदी सावरकर के मूल “राष्ट्रवाद और कट्टर हिंदुत्व” की ओर लौटे,जीत भी हासिल की,पर मोदी को मालूम हैं कि वीर सावरकर और दीन दयाल उपाध्याय का प्रभाव भारत में तो था मग़र उन्हें भारत को विश्व गौरव और खुद को वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करना है तो कुछ बड़ा करना होगा ये बड़ा नाम पटेल और गाँधी हो सकते हैं ,,, उन्होंने देश के उन नामों का बिरसा बनने की कोशिश जारी रखी जिन्हें देश के अंदर और बाहर बहुत सम्मान प्राप्त है, इनमें सरदार पटेल और फिर महात्मा गाँधी थे ,हालाँकि कभी कभी भाजपा नेता गाँधी नेहरू विरासत को कोस भी लेते हैं,मगर मोदी जी ने यह नहीं किया ,,,पिछले चुनाव के दौरान ही उन्होंने गांधी जी के 150 जन्म दिवस को बड़े वैश्विक मंच पर जोर शोर से मनाने की घोषणा की,,, और दूसरी तरफ पटेल की शानदार विशाल मूर्ति गुजरात में स्थापित की ,बहुतायत में राजनेता इसे मोदी जी की राजनीतिक बुद्धिमत्ता मान सकते हैं, मगर ये इसमें वृहद  दूरदर्शिता भी है,,,,,

महात्मा गांधी का राजनीतिक दर्शन,तब से लेकर अब तक बड़ा सामयिक रहा परिणामतः मोदी जी को शांति और अहिंसा के मार्ग पर ही चलना सहज होगा ,,,मतलब साफ है कि आने वाले दिनों में मोदी महात्मा गांधी केउत्तराधिकारी  के रूप में स्थापित होना चाहेंगे, जिसकी दो वजह है, पहली देश के अंदर महात्मा गांधी सर्व स्वीकार्य हैं, दूसरा देश के बाहर पूरी दुनिया में सत्य अहिंसा के पुजारी के रूप में महात्मा गांधी एक वैश्विक राजनीतिक और सामाजिक दार्शनिक के रूप में एक सदी से ज्यादा स्थापित हैं, ऐसे में मोदी के लिए गांधीजी सचमुच एक राजनैतिक आदर्श के रूप में साबित हो सकते हैं, इसके मायने बहुत साफ हैं कि आने वाले दिनों में मोदी के अंदर उसी तरह के  परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं असल में यही है,,,, मोदी का गांधीवाद है ,,,,,उल्लेखनीय है कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा के साथ उन्होंने अपने आप को भी लौह पुरुष के रूप में स्थापित कर दिया है, बालाकोट से लेकर, अनुच्छेद 370 पर दिलेरी से कार्यवाही कर मोदी जी ने उसी चरित्र का अनुगमन किया ,अब मोदी 2 अक्टूबर से साल भर तक चलने वाले गाँधी जी की 150 वीं जयंती मना रहें हैं, ये भी बड़ी दूर दर्शिता होगी,इस रूप में वे दुनिया भर में गाँधी के प्रति कृतग्यता और अपना विनयी व्यक्तित्व बना सकेंगे, ध्यान रहे इसी दूर दृष्टी के कारण मोदी जी आज पुरे भारत के सबसे बड़े नेता के रूप में खुद को स्थापित करने में सफल और भाजपा को सत्ता दिलाने में कामयाब रहे ,,,,,वंदे मातरम

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हरतालिका तीज कब है ? एक या दो सितंबर को ?

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हरतालिका तीज का व्रत कब करें, इसे लेकर उलझन है। दरअसल 1 सितंबर को सुबह में द्वितीय तिथि की भी मौजूदगी के कारण उलझन की स्थिति बन गई है।जन्माष्टमी के बाद अब हरतालिका तीज का व्रत कब करें, इसे लेकर उलझन की स्थिति बन गई है। बिहार सहित झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में किये जाने वाला यह व्रत हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। यह व्रत मुख्यतौर पर शादीशुदा महिलाएं करती हैं और अपने पति के लिए लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
महिलाएं इस दिन नये वस्त्र पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और श्रृंगार आदि कर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हालांकि, इस बार यानी साल 2019 में इसे मनाने की तिथि को लेकर उलझन जैसी स्थिति पैदा हो गई है। हरतालिका तीज-2019 व्रत की तारीख इस बार 1 सितंबर है या फिर 2 सितंबर, इसे लेकर जानकारों और आम लोगों में मतभेद है।

हरतालिका तीज कब है, एक या दो सितंबर?

हरतालिका तीज को लेकर उलझन दरअसल 1 सितंबर को सुबह में द्वितीय तिथि की भी मौजूदगी के कारण शुरू हुई है। चित्रा पक्षीय पंचांग के अनुसार द्वितीय तिथि 1 सितंबर को सुबह 8.27 बजे तक है। इसके बाद तृतीय तिथि शुरू हो रही है और यह अगले दिन यानी 2 सितंबर को सुबह 8.58 में खत्म होगी। ऐसे में इसे 1 सितंबर को मनाया जाना चाहिए। वहीं, ग्रहलाघवी पद्धति से निर्मित पंचांग के अनुसार हरतालिका तीज 2 सितंबर को मनाया जाना चाहिए।
कुछ पंडित 1 सितंबर को तीज के लिए शुभ मान रहे हैं क्योंकि अगर 2 सितंबर को तीज की पूजा की जाएगी, तब चतुर्थी तिथि होगी। कुछ जानकारों का यह भी मत है कि तीज का व्रत 2 सितंबर को ही किया जाए लेकिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा सुबह-सुबह की कर ली जाए। ऐसी उलझन में बेहतर है कि आप भी अपने पुरोहित से इस बारे में स्थिति स्पष्ट कर लें। वैसे अगर आप 1 सितंबर को हरतालीका तीज कर रही हैं तो इसके लिए पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6.05 बजे से रात 8.23 बजे तक का होगा।
गौरतलब है कि हरतालिका तीज व्रत के दौरान महिलाएं करीब 24 घंटे और कई मुहूर्त और तिथि के मुताबिक उससे भी ज्यादा वक्त के लिए निर्जला रहती हैं। यही नहीं, किसी भी प्रकार का अन्न भी ग्रहण नहीं करती हैं। मान्यताओं के मुताबिक माता पार्वती ने सबसे पहले हरतालिका तीज का व्रत किया था। इसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शंकर पति के रूप में प्राप्त हुए।

1 सितम्बर रविवार को ही क्यों है?

1 सितंबर रविवार को सुबह 8.27 बजे से तृतीया तिथि शुरू हो जाएगी और 2 सितंबर सोमवार को ब्रह्ममुहूर्त में 4.57 बजे खत्म होगा।

अर्थात

2 तारीख को सूर्योदय से लगभग 1 घण्टा पहले ही तृतीया तिथि समाप्त होकर चतुर्थी लग जायेगा।

1 तारीख को तृतीया तिथि के साथ हस्त नक्षत्र भी है। हस्त नक्षत्र की तीजा शुभ मानी जाती है।

इसलिये हरतालिका तीजा का व्रत 1 तारीख को ही रखना है

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