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ज्योतिष - वास्तु

दिनांक 10/07/2019 का पंचांग एवं राशिफल

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  • रायपुर (etoi news) 10.07.2019
  • दिनांक 10.07.2019 का पंचाग शुभ संवत 2076 शक 1941 ..सूर्य उत्तरायणयन का …आषाढ़ शुक्ल पक्ष…. अष्टमी तिथि… दिन में 03 बजकर 31 मिनट तक उपरांत दशमी तिथि… बुधवार… चित्रा नक्षत्र.. रात्रि को 07 बजकर 55 मिनट तक … आज चन्द्रमा …तुला राशि में… आज का राहुकाल दोपहर को 12 बजकर 09 मिनट से 01 बजकर 49 मिनट तक होगा …

महा अष्टमी व्रत से पायें शारीरिक कष्ट से राहत-

गुप्त नवरात्र मनाने और इनकी साधना का विधान देवी भागवत व अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। श्रृंगी ऋषि ने गुप्त नवरात्रों के महत्व बतलाते हुए कहा है कि जिस प्रकार वासंतिक नवरात्र में भगवान विष्णु की पूजा और शारदीय नवरात्र में देवी शक्ति की नौ देवियों की पूजा की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं। यदि कोई इन महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना करें, तो जीवन धन-धान्य, राज्य सत्ता और ऐश्वर्य से भर जाता है।

 गुप्त नवरात्र अष्टमी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पूजा का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद माँ अष्टभुजी दुर्गा की पूजा करने के लिए आसन पर बैठें और हाथ में चावल लेकर भगवती दुर्गा का ध्यान करें। ध्यान करके माँ दुर्गा के चरणों में चावल समर्पित करें। आसन के लिए फूल चढ़ाएँ। यदि मिट्टी से निर्मित दुर्गा प्रतिमा का पूजन करना हो तो पूजन पात्र का प्रयोग करना चाहिए। इसके बाद माँ दुर्गा की मूर्ति को दूध से स्नान कराएँ और पुनरू शुद्ध जल से स्नान कराएँ। इसके बाद क्रमश: दही, शुद्ध घी, शहद व शक्कर से दुर्गा प्रतिमा को स्नान करवाएँ और हर बार शुद्ध जल से भी स्नान करवाएँ। पंचामृत से स्नान कराकर शुद्ध जल से स्नान कराएँ। इसके बाद दुर्गा प्रतिमा पर क्रमश: गंध, वस्त्र, यज्ञोपवीत समर्पित करें। इसके बाद चंदन व अन्य सुगंधित द्रव्य समर्पित करें। तत्पश्चात् पुष्पमाला, बिल्व पत्र व धूप अर्पित करना चाहिए। दीप दिखलाएँ और हाथ धो लें। माँ को नैवेद्य (भोग) लगाएँ और इसके बाद फल, पान और सुपारी चढ़ाएँ। दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करें। कपूर से माँ भगवती की आरती करें व पुष्पांजलि अर्पित कर क्षमा प्रार्थना करें।

आषाढ़ शुक्ल अष्टमी को त्रिपुरा में खरसी-पूजा उत्सव मनाया जाता है। जिसमें अधिकतर संन्यासी ही भाग लेते हैं। तमिलनाडु में आषाढ़ मास की अष्टमी को मनाए जाने वाले महोत्सव को अदिपुरम कहा जाता है। इस दिन लोग अपने परिवार की सुख-शांति हेतु शक्ति-देवी की पूजा करते हैं। आषाढ़ शुक्ल नवमी गुप्त नवरात्र का अंतिम दिन होता है। उस दिन भारत के कश्मीर के भवानी मंदिर में विशाल मेला लगता है। उसी दिन हरि जयंती के कारण वैष्णव भक्त व्रत भी रखते हैं और वैष्णव मंदिरों में मनोकामनाओं की पूर्ति और दर्शनार्थ जाते हैं। इस दिन व्रत कर माता की पूजा करने से परिवार में शारीरिक से पीड़ित व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है.. परिवार में शरीर कष्ट पर होने वाले व्यय से राहत मिलती है ..

आज के राशियों का हाल तथा ग्रहों की चाल-

मेष राशि –

आपको मानसिक असंतोष हो सकता है…

भौतिक वस्तु की खरीदी कर सकते हैं…

अवसाद से बचकर रहना होगा नहीं तो कार्य बिगड सकता है…

  1. 1. दूध, चावल का दान करें…
  2. 2. श्री सूक्त का पाठ करें धूप तथा दीप जलायें…

वृषभ राशि –

   

यात्रा करने तथा उस यात्रा से धनहानि तथा विवाद के कारण तनाव संभव…

वाणी तथा आहार का संयम रखें…

उपाय –

  1. ऊॅ बुं बुधाय नमः का एक माला जाप कर गणपति की आराधना करें
  2. दूबी गणपति में चढ़ाकर मनन करें,
  3. एक मुठ्ठी मूंग का दान करें।

मिथुन राशि –

व्यवसायिक संबंधों में खटास….

कोर्ट में धन संबंधित विवाद…..

व्यर्थ की यात्रा…..

उपाय –

  1. ऊॅ रां राहवे नमः का जाप कर दिन की शुरूआत करें,
  2. धतूरे की माला शिवजी में चढ़ायें…

कर्क राशि –

ऊर्जा तथा उत्साह में वृद्धि…..

काम में एकाग्रता….

वातरोग से कष्ट….

उपाय –

  1. गणपति की उपासना करें, धूप, दीप तथा नैवेद्य चढ़ायें,
  2. गुरूजन को मीठी चीजों का दान करें,

सिंह राशि –

आर्ट फिल्ड में यष की प्राप्ति….

नई योजनाओं में अच्छी सफलता….

संबंधों में निकटता…

     शुक्र के लिए-

  1. ऊॅ शुं शुक्राय नमः का जाप करें तथा माॅ महामाया के दर्शन कर दिन की शुरूआत करें,
  2. चावल, धी, दूध, दही का दान करें साथ ही सौभाग्यवती स्त्री को सुहाग का सामान दान करें,

कन्या राशि –

सामाजिक उत्थान के महत्वपूर्ण कार्य के लिए छोटी यात्रा तथा उससे यश तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे…

पत्नी के स्वास्थ्य एवं खान पान की अनियमितता के कारण…

छोटे-मोटे रोगों से मानसिक परेशानी हो सकती हैं

उपाय आजमायें –

  1. ऊॅ गुरूवे नमः का जाप करें…
  2. पीली वस्तुओं का दान करें…

तुला राशि –

परीक्षा के समय यात्रा के योग होने से… अध्ययन में बाधा….

तनाव हो सकता है…

भावुकता तथा अव्यवहारिक निर्णय लेने से बचें

उपाय करें-

  1. ऊॅ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः का जाप करें…
  2. दूध, चावल, का दान करें…

वृश्चिक राशि –

आज आपको मानसिक परेशानी का अनुभव हो सकता है.

आप अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें

व्यवसाय के संबंध में यात्रा भी कर सकते हैं.

उपाय

1.हनुमान मंदिर में नारियल चढ़ायें

2.बड़ों का आर्शीवाद लेकर घर से निकलें।

धनु राशि –

आज आपको अपने साथी की सहायता से लाभ प्राप्त हो सकता है.

नये अवसर की प्राप्ति….

वाहन चलाने में सावधानी बरतें

उपाय

     1.श्री सूक्त का पाठ करें धूप तथा दीप जलायें…

     2.रूद्राभिषेक करें…

मकर राशि –

थकान और कष्ट के कारण आपके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं

अपनी मानसिक स्थिति नियंत्रण में रखनी होगी ….

अपने आहार और योग पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी ….

उपाय

1.चीनी या चावल का दान करें….

2.स्वेत वस्त्र धारण करें…

कुंभ राशि –

आज आपको कुछ बाधाओं के साथ सफलता प्राप्त होगी

वाहन की रफ्तार नियंत्रित रखें.

बाधाओं के कारण आपको सफलता की खुशी अधिक नहीं होगीं.

उपाय

     1.राहु के मंत्र का जाप करें…

     2.तिल का दान करना चाहिए।

मीन राशि –

व्यवसायिक दृष्टिकोण से भी आज का दिन अनुकूल रहेगा….

आप अपने कार्यों की सफलता के लिए प्रयास और मेहनत अधिक करेगें….

आज का दिन पारिवारिक दृष्टि से आपके अनुकूल रहने की संभावनाएं बनती है….

उपाय

      1.सूर्य के मंत्र का जाप

      2.गेहूं का दान करें।

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भगवान शिव के इन 5 मंदिरों में दर्शन के साथ, सावन महीने की करें शुरुआत

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”शि’ का अर्थ है ‘मंगल’ और ‘व’ कहते हैं दाता को, इसलिए जो मंगलदाता है, वही शिव है। शिव ब्रह्म रूप में शांत हैं, तो रुद्र रूप में रौद्र हैं। शिव हमारी प्रार्थनाएं सहजता से स्वीकार करते हैं पर शिव का मूल उद्देश्य हमें अपनी तरह सहज, सरस और सरल बनाना है। श्रावण में शिव अभिषेक कामनाओं की पूर्ति हेतु संपन्न किया जाता है, लेकिन वह शुष्क मन-प्राण को भी सरस कर देता है। मन को चंद्रमा नियंत्रित करता है, जो सोमवार के दिन का स्वामी है। इसलिए शिवलिंग अभिषेक सोमवार को अवश्य किया जाता है, क्योंकि मन को उत्फुल्लित करने का यह एक कारगर उपाय है। तो 17 जुलाई से सावन महीने की हो रही है शुरुआत। भारत में बने इन मंदिरों का दर्शन इस पावन महीने में होगा खास, जानेंगे इसके बारे में….

तुंगनाथ मंदिर, उत्तराखंड

समुद्र तल से 3680मीटर की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर है। जो बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर के बीच में स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने का रास्ता बहुत ही अद्भुत है। हिमालय पर्वत की बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां इसकी खूबसूरती में लगाती हैं चार चांद। तीर्थयात्रियों के साथ ही सैलानियों को भी ये जगह बहुत लुभाती है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भगवान शिव के प्रिय ‘नंदी’ की मूर्ति विराजमान है। द्वार के दाईं ओर भगवान गणेश की मूर्ति है। मंदिर की वास्तुकला उत्तर भारतीय शैली में बनी हुई है और आसपास कई छोटे मंदिर हैं।

जूनागढ़, भावनाथ तालेटी

जूनागढ़ सिर्फ गिर नेशनल पार्क के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि ये साधुओं का भी घर है जो सावन महीने और महाशिवरात्रि के मौके पर दर्शन के लिए भारी तादाद में आते हैं। इनके अलावा दुनिया के अलग-अलग कोनों से भी लोग मंदिर में जल चढ़ाने और पूजा-अर्चना करने आते हैं। शिवरात्रि में तो जूनागढ़ आकर यहां के कल्चर और साधुत्व से भी रुबरू होने का मौका मिलता है।

पशुपतिनाथ मंदिर, मंदसौर

मध्यप्रदेश के मंदसौर में बना ये मंदिर भारत का इकलौता पशुपतिनाथ का मंदिर है। जो नेपाल के पशुपतिनाथ से काफी मिलता-जुलता हुआ है और इसलिए ही इसका नाम पशुपतिनाथ पड़ा। चिकने चमकदार पत्थर से बनी हुई पशुपतिनाथ की प्रतिमा सवा सात फीट ऊंची है। शिवना नदी के तट पर बसे इस मंदिर की मान्यता दूर-दूर तक फैली हुई है। कहते हैं सच्चे मन से मांगी गई मुराद जरूरी पूरी होती है।

मुरुदेश्वर मंदिर, कर्नाटक 

भगवान शिव का एक नाम मुरुदेश्वर भी है। कंडुका पहाड़ी पर बना ये मंदिर तीनों तरफ से अरब सागर से घिरा हुआ है। मंजिल में 20 मंजिला गोपुरा बना हुआ है। 249 फुट लंबा दुनिया का सबसे बड़ा गोपुरा है। समुद्र तट के पास स्थित भगवान शिव का यह मंदिर बहुत ही खूबसूरत है और मंदिर परिसर में बने भगवान शिव की विशाल मूर्ति तकरीबन 123 फीट है।

लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर

भुवनेश्र्वर के सबसे बड़े मंदिरों से में एक है। जो कलिंग की वास्तुकला और मध्यकालीन ऐतिहासिक परंपरा का बेजोड़ नमूना है। मंदिर के अंदर भगवान विष्णु की भी प्रतिमा है। शिव से जुड़े हर एक त्यौहार में आप यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देख सकते हैं। लिंगराज मंदिर से होकर एक नदी गुजरती है जो कई तरह की शारीरिक बीमारियों को दूर करता है। सावन महीने में सुबह से ही भक्तगण महानदी से पानी भरकर पैदल चलकर मंदिर तक आते हैं।

 

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जानें गुरु पूर्णिमा का महत्व और उपासना का तरीका….

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आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के पर्व के रूप में मनाया जाता है. इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था, अतः इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. इस दिन से ऋतु परिवर्तन भी होता है अतः इस दिन वायु की परीक्षा करके आने वाली फसलों का अनुमान भी किया जाता है. इस दिन शिष्य अपने गुरु की विशेष पूजा करता है और उसे यथाशक्ति दक्षिणा,पुष्प,वस्त्र आदि भेंट करता है.शिष्य इस दिन अपनी सारे अवगुणों को गुरु को अर्पित कर देता है, तथा अपना सारा भार गुरु को दे देता है. इस बार गुरु पूर्णिमा का पर्व 16 जुलाई को मनाया जाएगा.

कौन हो सकता है आपका गुरु :-मान्यतः हम लोग शिक्षा प्रदान करने वाले को ही गुरु समझते हैं परन्तु वास्तव में ज्ञान देने वाला शिक्षक बहुत आंशिक अर्थों में गुरु होता है. जन्म जन्मान्तर के संस्कारों से मुक्त कराके जो व्यक्ति या सत्ता ईश्वर तक पहुंचा सकती हो,ऐसी सत्ता ही गुरु हो सकती है. हिंदू धर्म में गुरु होने की तमाम शर्तें बताई गई हैं, जिसमें से प्रमुख 13 शर्तें निम्न प्रकार से हैं.

शांत,दान्त,कुलीन,विनीत,शुद्धवेषवाह,शुद्धाचारी,सुप्रतिष्ठित,शुचिर्दक्ष,सुबुद्धि,आश्रमी,ध्याननिष्ठ,तंत्र-मंत्र विशारद,निग्रह-अनुग्रह गुरु की प्राप्ति हो जाने के बाद प्रयास करना चाहिए कि उसके दिशा निर्देशों का यथा शक्ति पालन किया जाए.

  • कैसे करें गुरु की उपासना
  • इसके बाद उन्हें श्वेत या पीले वस्त्र दें.
  • यथाशक्ति फल,मिष्ठान्न दक्षिणा अर्पित करें.
  • गुरु से अपना दायित्व स्वीकार करने की प्रार्थना करें.
  • गुरु को उच्च आसन पर बैठाएं.
  • उनके चरण जल से धुलाएं और पोंछे.
  • फिर उनके चरणों में पीले या सफेद पुष्प अर्पित करें .
  • अगर आपके गुरु नहीं हैं तो क्या करें?
  • श्रीकृष्ण या शिव जी का ध्यान कमल के पुष्प पर बैठे हुए करें.
  • मानसिक रूप से उनको पुष्प,मिष्ठान्न, तथा दक्षिणा अर्पित करें.
  • स्वयं को शिष्य के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना करें.
  • हर गुरु के पीछे गुरु सत्ता के रूप में शिव जी ही हैं.
  • अतः अगर गुरु न हों तो शिव जी को ही गुरु मानकर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाना चाहिए.
  • श्रीकृष्ण को भी गुरु मान सकते हैं.

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आज गुरु पूर्णिमा के दिन हुआ था महर्षि वेदव्यास का जन्म , जानें उनसे जुड़ी ये खास बातें….

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”आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाए जाने के कई ऐतिहासिक पौराणिक कारण हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार हजारों वर्ष पहले इसी तिथि पर आदि गुरु शिव ने सप्तऋषियों को ब्रह्म के बारे में ज्ञानोपदेश देना आरंभ किया था तबसे आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। इसी तिथि को गौतम बुद्ध तथा जैन तीर्थंकर महावीर ने अपने प्रथम शिष्य बनाए और गुरु के रूप में अपने कार्य की शुरुआत की। यह दिन बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी पवित्र है।

  • मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन ही ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और 18 पुराण जैसे अद्भुत साहित्यों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इस पर्व को गुरु व व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। हमें अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित राजनाथ झा के मुताबिक सदियों से चली आ रही गुरु शिष्य की परंपरा का निवर्हन गुरु पूर्णिमा पर देखने को मिलता है। शिष्य देश-विदेश में कहीं भी हो इस मौके पर गुरु पूजन के लिए अवश्य पहुंचते हैं। राजधानी पटना के गुरु बलराम के शिष्य देशभर में हैं। पर गुरु पूर्णिमा पर उनके शिष्य गुरु पूजन को पटना स्थित मातृउदबोधन आश्रम जरूर पहुंचते हैं। हालांकि गुरु बलराम ब्रह्मलीन हो चुके हैं।  चार भागों में वेदों को विभक्त किया  महर्षि वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे।
  • हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास तीनों कालों के ज्ञाता थे। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देख कर यह जान लिया था कि कलियुग में धर्म के प्रति लोगों की रुचि कम हो जाएगी। मनुष्य ईश्वर में विश्वास न रखने वाला, कर्तव्य से विमुख और कम आयु वाला हो जाएगा। एक बड़े और सम्पूर्ण वेद का अध्ययन करना उसके बस की बात नहीं होगी। इसलिये महर्षि व्यास ने वेद को चार भागों में बांट दिया। व्यास ने वेदों को अलग-अलग खण्डों में बांटने के बाद उनका नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद रखा। वेदों का इस प्रकार विभाजन करने के कारण ही वह वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद का ज्ञान अपने प्रिय शिष्यों वैशम्पायन, सुमन्तुमुनि, पैल और जैमिन को दिया।

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