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त्वचा के लिए फायदेमंद है अंगूर के बीज का तेल

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इन दिनों आपको बाजार में ब्यूटी ऑयल के काफी सारे विकल्प मिल जाएंगे. लेकिन इनमें से एक चुनना काफी मुश्किल है. अंगूर के बीज का तेल भी त्वचा के लिए फायदेमंद है. अंगूर के बीज के तेल में ओमेगा फैटी एसिड और विटामिन ई होता है. ये त्वचा के लिए टॉनिक का काम करता है. इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण त्वचा को खूबसूरत बनाए रखने का काम करते हैं. ये त्वचा संबंधित कई समस्याओं को दूर करने का काम करता है. आइए जानें त्वचा के लिए कैसे लाभदायक है ये तेल.

मुंहासे का इलाज करने के लिए  अंगूर के बीज के तेल में लिनोलिक एसिड होता है जो एक ओमेगा -6 फैटी एसिड होता है. ये बंद छिद्रों को कम करके मुंहासों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.

निशानों को हल्का करता है  अंगूर के बीज के तेल में मौजूद विटामिन ई और लिनोलिक एसिड मुंहासों के निशान और सनस्पॉट को हल्का कर सकता है.

फ्री रेडिकल्स से बचाता है  अंगूर के बीज के तेल में कई अन्य कंपाउंड होते हैं. ये कैरोटीन, विटामिन सी, डी, ई और पॉलीफेनोल्स से भी भरपूर होता है. इन सभी कंपाउंड में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट क्षमताएं होती हैं जो आपकी त्वचा को हानिकारक यूवी किरणों और फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं.

त्वचा को मॉइस्चराइज करता है –  अंगूर के बीज का तेल विटामिन ई से भरपूर होता है जो त्वचा में नमी देने के लिए बेहद मददगार होता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें मौजूद विटामिन त्वचा की बाहरी परत को नरम और हाइड्रेट करता है. इसके साथ ही तेल में मौजूद सुपर फैटी एसिड कंपोनेंट त्वचा को संतुलित और स्मूद बनाते हैं.

महीन रेखाओं और झुर्रियों को कम करता है  अंगूर के बीज के तेल में पॉलीफेनोल्स होते हैं. ये समय से पहले बूढ़ा होने और झुर्रियों को रोकने में मदद करता है. फैटी एसिड के साथ पॉलीफेनोल्स सर्कुलेशन को बढ़ावा देता है. ये समय से पहले बूढ़ा होने के संकेतों को कम करने में मदद करते हैं. इसके अलावा इसमें मौजूद कसैले गुणों के कारण तेल त्वचा को जवां रखने में मदद करता है.

एंटीमाइक्रोबॉयल  अंगूर के बीज के तेल के एंटीमाइक्रोबॉयल गुण ब्रेकआउट से लड़ने के लिए सक्षम होते हैं. तेल में मौजूद कसैले गुण सूजन को कम करते हैं. ये त्वचा की सूजन को कंट्रोल करने में मदद करते हैं.

 

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महिलाओं के लिए घातक है यह बीमारी, अगर एक रात भी अच्छी नींद नहीं ली तो यह बीमारी बिन बुलाए मेहमान की तरह घर कर सकती है।

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दिल्ली निवासी शारदा (67) अक्सर अपने घर का पता भूल जाती हैं, जबकि पार्क से उनका घर महज 200 मीटर के फासले पर ही है। कई बार उन्हें अपने रोजाना के कामकाज तक याद नहीं रहते। दिल्ली के कई ओल्ड एज होम में न जाने ऐसी कितनी महिलाएं हैं, जो अपना बीता हुआ कल भूल चुकी हैं। कई ऐसी हैं, जिन्हें अपना नाम तक याद नहीं। अल्जाइमर एक मानसिक बीमारी है, जिसमें मरीज लगातार अपनी याददाश्त गंवाता जाता है और आखिर में वह खुद को भी भूल जाता है। यानी मरीज के ब्रेन में लगातार बदलाव आता है। वैसे तो इस बीमारी की सटीक वजह अभी तक पता नहीं चल पाई है, मगर कई रिसर्च में इसकी आशंकाओं के बारे में बात की गई है। वर्ल्ड अल्जाइमर्स डे के मौके पर हम आपको इस बीमारी से बचने के उपाय और इसकी रफ्तार थामने वाले कदमों के बारे में जानकारी देंगे, जो शायद आपके भी काम की हो सकती हैं

बैड स्लीप से ब्रेन में बढ़ जाता है खराब प्रोटीन का स्तर, बीमारी को बुलावा

वैसे तो अच्छी नींद कई बीमारियों को दूर से ही नमस्ते करने का अच्छा उपाय है। 2017 के रिसर्च से यह बात सामने आई थी कि अगर एक रात भी अच्छी नींद नहीं ली तो यह बीमारी बिन बुलाए मेहमान की तरह घर कर सकती है। अमेरिका के सेंट लुई में वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन, स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी और नीदरलैंड्स में रैडबाउड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर द्वारा संयुक्त रूप से किए गए रिसर्च में यह खुलासा हुआ। रिसर्च में कहा गया है कि एक रात भी बैड स्लीप लेने से ब्रेन में एक प्रोटीन एमाइलॉयड बीटा का लेवल बढ़ जाता है और अगर यही खराब नींद एक हफ्ते तक कायम रहती है तो एक और प्रोटीन ताउ का स्तर भी बढ़ जाता है। बीटा और ताउ दोनों प्रोटीन के स्तर बढ़ने से अल्जाइमर की शुरुआत हो सकती है।

युवतियों में बैड प्रोटीन से बचाने के लिए ताकतवर माइटोकॉन्ड्रिया

युवा महिलाओं में इन बैड प्रोटीन से बचने के लिए उनकी कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया ताकतवर स्थिति में होता है, जबकि बुजुर्ग महिलाओं में यह माइटोकॉन्ड्रिया कमजोर पड़ जाता है, जिससे उनमें पुरुषों के मुकाबले अल्जाइमर होने की आशंका बढ़ जाती है। कई शोध में यह भी कहा गया है कि जो लोग युवावस्था में काम के बोझ या किसी अन्य वजह से कम नींद लेते हैं, उन्हें बुढ़ापे में यह बीमारी हो सकती है।

मोनोपॉज भी बन सकता है कारण, नींद के पैटर्न में आता है बदलाव

कई रिसर्च में यह भी बताया गया है कि बढ़ती उम्र के साथ मोनोपॉज में गिरावट भी अल्जाइमर को दावत दे सकता है, क्योंकि इससे भी नींद के पैटर्न में कई बार बदलाव आता है। फिनलैंड में हुई एक स्टडी के मुताबिक, जिन महिलाओं में मोनोपॉज नहीं आता है, अगर वे ओरल हॉर्मोन थेरेपी ले रही हैं, तो उनमें 17 फीसदी ज्यादा इस बीमारी के होने की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि, अभी तक ऐसे रिसर्च नहीं हुए है, जो यह बता सकें कि आखिर इलाज के दौरान दिए जाने वाले हाॅर्मोन से महिलाओं के स्वास्थ्य में किस तरह से बदलाव आते हैं।

डिमेंशिया पीड़ित की देखभाल पर 5 घंटे खर्च करता है परिवार, इनमें भी महिलाएं ज्यादा

2019 के एक अध्ययन के अनुसार, डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल पर परिवार के लोग हर रोज औसतन 5 घंटे देते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह की बीमारी में महिलाएं ही महिलाओं की मददगार होती हैं। डिमेंशिया पीड़ित व्यक्ति की देखभाल करने वालों में 70 फीसदी महिलाएं ही होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस बीमारी को 2017 में सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं में से एक माना। इस साल जुलाई में संगठन ने उन देशों की मदद करने का फैसला किया है, जहां पर डिमेंशिया पीड़ितों के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

खानपान में हल्दी को करें शामिल, बरकरार रहेगी आपकी याददाश्त

कई अध्ययनों में हल्दी को याददाश्त के लिए बेहतरीन बताया गया है। वजह है इसमें पाया जाने वाला करक्यूमिन में एंटी ऑक्सीडेंट के गुण होते हैं। भारतीय खानपान में हल्दी के इस्तेमाल की वजह से ही यहां पर अल्जाइमर का खतरा बाकी देशों के मुकाबले कम होता है। यहां के बुजुर्गों की याददाश्त भी तुलनात्मक रूप से अच्छी होती है। अमेरिका के लॉस ऐंजिलिस में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में हुए एक शोध के अनुसार, करक्यूमिन ब्रेन को शांत रखने में बेहद मददगार साबित होता है। करक्यूमिन के नैनो पार्टिकल से अल्ज़ाइमर का इलाज आसानी से हो सकता है। साथ ही याददाश्त कायम रखने के लिए बेहद जरूरी ब्रेन सेल्स यानी न्यूरॉन्स को फिर से रिजनरेट करने में भी यह अहम भूमिका निभा सकता है।

 

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दुनिया भर में हर साल करीब 23 मिलियन मिसकैरेज होते हैं। जानिए कैसे?

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मैं अपने पहले बच्चे के जन्म के लिए बहुत उत्साहित थी। शादी के पांच साल बाद ये मेरी पहली प्रेग्नेंसी थी। बच्चे का नाम भी सोच लिया था। घर पर अकेले बैठे घंटों उससे बातें करती। एक दिन अचानक शरीर के निचले हिस्से में दर्द होने लगा। मुझे महसूस हुआ कि ब्लीडिंग की वजह से मैं पूरी तरह भीग गई हूं। पति के साथ अस्पताल गई। वहां पहुंचकर पता चला कि जिस बच्चे के जन्म के सपने देख रही थी, वो अब इस दुनिया में नहीं रहा। ये किस्सा है दिल्ली की रेखा की जिंदगी का। उनकी आवाज में अपने अजन्मे बच्चे को खोने का दर्द साफ झलकता है। ये दर्द सिर्फ एक महिला का नहीं है बल्कि 31 शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय टीम के सर्वे की मानें तो दुनिया भर में हर साल करीब 23 मिलियन मिसकैरेज होते हैं। इनमें 50 में से एक महिला जीवन में दो बार मिसकैरेज का अनुभव करती है, जबकि एक प्रतिशत महिलाएं तीन या इससे अधिक बार। ये स्थिति मानसिक रूप से हिला देने वाली होती है। इससे न सिर्फ महिला, बल्कि उसके पार्टनर पर भी असर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार मिसकैरेज की सटीक वजह के बारे में तो नहीं बताया जा सकता, लेकिन कुछ खास मेडिकल कंडीशन के दौरान महिला को अलर्ट रहने की जरूरत होती है।

क्या है मिसकैरेज?
जब प्रेग्‍नेंसी के 20वें सप्‍ताह से पहले ही भ्रूण नष्‍ट हो जाए तो इस स्थिति को मिसकैरेज कहा जाता है। ज्यादातर मामलों में प्रेग्‍नेंसी की पहली तिमाही में मिसकैरेज होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में कम से कम 30% प्रेग्नेंसी मिसकैरेज की वजह से खत्म हो जाती हैं। शोध पत्रिका ‘लांसेट प्लानेटरी हेल्थ’ के एक अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं में बढ़ते एयर पॉल्यूशन के कारण मिसकैरेज का खतरा सात फीसद तक बढ़ जाता है, जोकि भारत और पाकिस्तान में ज्यादा है।

मिसकैरेज के लक्षण

  • ब्लीडिंग
  • स्पॉटिंग
  • पेट और कमर में दर्द
  • खून के साथ टिश्यू निकलना

मिसकैरेज की वजह
थायरॉयड– प्रेग्नेंसी में थायरॉयड होने पर बहुत सतर्क रहने की जरूरत होती है, क्योंकि ये कई बार मिसकैरेज की वजह बन जाता है।
डायबिटीज – इस दौरान तमाम महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज हो जाती है। ऐसे में समय समय पर डॉक्टर से जांच कराना जरुरी है।
फाइब्रॉयड्स– यूटरिन फाइब्रॉयड, इम्यून डिसऑर्डर भी कई बार मिसकैरेज का कारण बन जाते हैं।
क्रोमोसोमल असामान्यता और हार्मोनल असंतुलन– भ्रूण को गलत संख्‍या में क्रोमोजोम मिलने के कारण भी मिसकैरेज के चांस बढ़ जाते हैं। वहीं, समय रहते हार्मोनल असंतुलन की स्थिति को दवाओं से कंट्रोल किया जा सकता है।

मिसकैरेज से रिलेशनशिप पर असर
शोध की मानें तो मिसकैरेज के बाद कपल्स के रिश्ते पर असर पड़ सकता है। ये उनके अलग होने की वजह भी बन सकता है और करीब भी ला सकता है। ये सब इस बात पर डिपेंड करता है कि वे कैसे एक-दूसरे को संभालते हैं। साइकॉलोजिस्ट डॉ. नेहा गर्ग बताती हैं कि किसी महिला को अचानक जब पता चले कि उनके गर्भ में पल रहा बच्चा दुनिया में आने से पहले ही चल बसा तो इस दुख को बर्दाश्त करना बेहद मुश्किल होता है। इसे लेकर कई महिलाओं में डिप्रेशन के लक्षण तीन साल तक दिखाई देते हैं। ऐसे में इस डिप्रेशन से बाहर निकलना बहुत जरूरी है। अगर आप और आपके पार्टनर की मिसकैरेज पर अलग-अलग सोच है, तो आप अपने रिश्ते में अकेला महसूस कर सकते हैं। यहां तक​ कि ये सोचने लग जाते हैं कि क्या आपको एक साथ होना चाहिए। ऐसे में ये जरुर याद रखें कि मिसकैरेज किसी भी महिला के साथ हो सकता है। एक दूसरे को समझना जरुरी है।

मिसकैरेज के बाद कपल्स रिश्ते को ऐसे संभालें

  • अपनी फीलिंग शेयर करें- मिसकैरेज के बाद कपल्स के अनुभवों को लेकर अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं के पार्टनर फीलिंग और अनुभवों को एक दूसरे से साझा करते हैं वे पर्सनली और फिजिकली उनके करीब महसूस करती हैं। दुख बांटने के अनुभव उन्हें ज्यादा पास ले आते हैं।
  • एक दूसरे का सहारा बनें- अगर आपको लगता है कि आपका पार्टनर पूरी तरह से ठीक है तो इसका मतलब ये न समझें कि उसे दुख नहीं है। हमेशा एक-दूसरे को सपोर्ट करें।
  • मिसकैरेज होना किसी की गलती नहीं है। एक-दूसरे पर दोष डालने से कपल्स के बीच केवल दरार पैदा होती है इसलिए दोष देने से बचें।
  • ऐसे कपल्स से बात करें, जो मिसकैरेज का दर्द झेल चुके हैं। अगर फिर भी डिप्रेशन महसूस करते हैं, तो डॉक्टर से परामर्श लें सकते हैं।

महिलाएं इन बातों का रखें ध्यान

  • मिसकैरेज के बाद शरीर में खून की कमी हो जाती है, इसलिए आयरन और विटामिन युक्त फलों और सब्जियों का सेवन जरूरी है।
  • कम से कम दो सप्ताह तक आराम करें।
  • भोजन में दाल, दूध और पनीर जैसी प्रोटीन और कैल्शियम वाली चीजों की मात्रा बढ़ा दें।
  • प्रेग्नेंसी के बारे में पढ़ें। डॉक्टरों और पहले मां बन चुकी महिलाओं से बात करें।

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महिलाओं के लिए जरूरी है हेल्दी लाइफस्टाइल जाने कैसे ?

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हर महिला को हेल्दी लाइफस्टाइल रूटीन की जरूरत होती है, जिसमें स्वस्थ खानपान, एक्सरसाइज, मेडिटेशन, प्रोपर स्लीप, स्ट्रेस मैनेजमेंट और रूटीन डायग्नोस्टिक टेस्ट। जी हां, डायग्नोस्टिक टेस्ट्स सुनने में थोड़ा अटपटा लग रहा होगा, लेकिन ये स्वस्थ शरीर के लिए जरूरी हैं। इन परीक्षणों से स्वास्थ्य की स्थिति का जायजा लगाया जाता है। दिल्ली की नमामी लाइफ में न्यूट्रीशनिस्ट शैली तोमर का कहना है कि 30 की उम्र के बाद महिलाएं कई तरह के हार्मोनल बदलावों से गुजरती हैं, जिस वजह से वे कई तरह की बीमारियों की चपेट में भी आ जाती हैं, लेकिन अगर नियमित तौर पर ब्लड टेस्ट कराए जाएं, तो शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है, और बीमारियों से बचा जा सकता है।

थायरॉयड प्रोफाइल
थायरॉयड प्रोफाइल ब्लड टेस्ट के माध्यम से होता है, यह टेस्ट आपके ब्लड में टी3, टी4 और टीएसएच के लेवल की जांच करता है। हालांकि, थायरॉयड डिसऑर्डर पुरुषों को भी प्रभावित करता है, लेकिन महिलाओं में यह आम परेशानी है। टी3, टी4 का कम लेवल और टीएसएच का हाई लेवल का मतलब है कि आपकी थायरॉयड ग्लैंड्स अंडरएक्टिव (हाइपोथायरॉयड) हैं जिसकी वजह से वजन बढ़ता है। तो वहीं, टी3, टी4 का हाई लेवल और टीएसएच का लो लेवल का मतलब है कि आपकी थायरॉयड ग्लैंड्स ओवरएक्टिव (हाइपरथायरॉयड) है, जो वजन कम होने का कारण बनता है। थायरॉयड डिसऑर्डर्स की वजह से एक्ने, हेयरफॉल, कब्ज और ड्राय स्किन होती है। अगर आप प्रेग्नेंसी की प्लानिंग कर रही हैं या प्रेग्नेंट हैं, तब भी थायरॉयड प्रोफाइल जरूरी है। अगर आपके थायरॉयड लेवल नॉर्मल रेंज में हैं, तो हर साल में एक टेस्ट जरूर कराएं। अगर आपका थायरॉयड लेवल सामान्य नहीं है तो हर 3 महीने में टेस्ट कराएं।

हिमोग्लोबिन
हिमोग्लोबिन ब्लड टेस्ट आपके ब्लड में हिमोग्लोबिन की मात्रा को मापता है। हिमोग्लोबिन एक प्रोटीन का टाइप है, जिसमें आयरन मौजूद है और शरीर के सभी सेल्स में ऑक्सीजन की सप्लाई करता है। शरीर में कम हिमोग्लोबिन लेवल की वजह से एनिमिया होता है, जबकि हिमोग्लोबिन का हाई लेवल पोलिसिथेमिया का कारण बनता है। महिलाओं के लिए सामान्य हिमोग्लोबिन का रेंज 12-15 gm/dl (grams per decilitre) है। पीरियड्स के दौरान महिलाओं में खून की कमी होती है जिससे हीमोग्लोबिन का लेवल कम होता है। 7 से कम हीमोग्लोबिन खतरनाक माना जाता है और इसकी पूर्ति के लिए शरीर में रक्त को चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।

विटामिन बी12
बी12 टेस्ट शरीर में विटामिन बी12 की मात्रा को मापता है। इस टेस्ट को कोबाल्मिन के नाम से भी जाना जाता है। विटामिन बी12 ब्रेन हेल्थ और रेड ब्लड सेल्स के लिए जरूरी है। ये डिप्रेशन को कम करने में भी मदद करता है। विटामिन बी12 चिकन, मछली और डेयरी प्रोडक्ट्स में पाया जाता है। अगर आप वेजिटेरियन हैं, तो आपके शरीर में विटामिन बी12 की कमी होगी। प्रेग्नेंट महिलाओं में विटामिन बी12 की कमी शिशु में सिरियस बर्थ डिफेक्ट डाल सकती है। यही नहीं, मिसकैरिज, प्रीमेच्योर बर्थ का भी कारण बन सकता है। शरीर में विटामिन बी12 की सामान्य रेंज 211 – 911 pg/mL होता है। 200 pg/ml से कम होने पर शरीर में विटामिन बी12 की कमी कही जाती है।

विटामिन डी
विटामिनि डी हड्डियों और जॉइंट हेल्थ के लिए जरूरी है। तो वहीं, यह कैल्शियम लेवल को भी रेग्युलेट करती है। शरीर में विटामिन डी की कमी जॉइंट पेन, मांसपेशियों का दर्द, कमजोर इम्युनिटी और डिप्रेशन का रिस्क बढ़ा देता है। वे महिलाएं जो घर में रहती हैं, उनमें विटामिन डी की कमी होती है, क्योंकि वे सूरज की रोशनी में बहुत कम जा पाती हैं। सूरज की रोशनी शरीर में विटामिन डी के प्रोडक्शन में मदद करता है। प्रेग्नेंसी में विटामिन डी के लेवल के कम होने से गर्भकालीन मधुमेह और प्री-एक्लैम्पसिया होता ह, जो ज्यादा खतरनाक हो सकता है। सामान्य विटामिन डी लेवल 20 और 40 ng/mL होता है।

महिलाएं जिस तरह से अपने दिनचर्या में बाकी काम चिंता से करती हैं, ठीक उसी तरह उन्हें अपनी सेहत को दुरुस्त रखने के लिए ये 4 बल्ड टेस्ट जरूर कराने चाहिए

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