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ज्योतिष

16/10/2020 का पंचांग एवं राशिफल (माता का आगमन घोड़े पर और गमन भैसे पर क्यो होगा घरती पर जीव का हाल जाने नवरात्र पूजा का विस्तार)

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कब और कैसे करें घटस्‍थापना? पढ़ें मुहूर्त और पूजा विधि :

  • रायपुर (etoi news)  15.10.2020
  • दिनांक 16.10.2020 का पंचाग
  • शुभ संवत 2077 शक 1942 सूर्य दक्षिणायन का… द्वितीय (अधिक) आश्विन मास कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि … रात्रि को 01 बजकर 01 मिनट तक … दिन … शुक्रवार … हस्त नक्षत्र …  दोपहर को 02 बजकर 57 मिनट तक … आज चंद्रमा … कन्या राशि में … आज का राहुकाल दिन 10 बजकर 22 मिनट से 11 बजकर 49 मिनट तक होगा …

माता का आगमन घोड़े पर और गमन भैसे पर क्यो होगा घरती पर जीव का हाल जाने नवरात्र पूजा का विस्तार

कब और कैसे करें घटस्‍थापना? पढ़ें मुहूर्त और पूजा विधि :

कल से शारदीय नवरात्र का प्रारंभ होने जा रहा है आईये आज जाने की कैसे क्या तैयारी करें, क्या सामग्री एकत्र करनी होगी और कल कब घट स्थापना करें जिससे माता का आर्शीवाद प्राप्त हो सकें और जीवन में सुख, स्वास्थ्य एवं शांति स्थापित हो।

निर्णय सिन्धु के अनुसार-

संपूर्णप्रतिपद्येव चित्रायुक्तायदा भवेत। वैधृत्यावापियुक्तास्यात्तदामध्यदिनेरावौ।। अभिजीत मुहुर्त्त यत्तत्र स्थापनमिष्यते। अर्थात अभिजीत मुहूर्त में ही कलश स्थापना कर लेना चाहिए।

घट स्थापना मुहूर्त का समय शनिवार, अक्टूबर 17, 2020 को प्रात:काल 06:27 से 10:13 तक है। घटस्थापना के लिए अभिजित मुहूर्त प्रात:काल 11:44 से 12:29 तक रहेगा। नवरात्रि के प्रथम दिन ही घटस्थापना की जाती है। इसे कलश स्थापना भी कहा जाता है।

शारदीय नवरात्रि उत्सव आश्विन शुक्ल शुद्ध प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल शुद्ध नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि की कालावधि में महाबलशाली दैत्यों का वध कर देवी दुर्गा महाशक्ति बनी। देवताओं ने उनकी स्तुति की। उस समय देवी मां ने सर्व देवताओं एवं मानवों को अभय का आशीर्वाद देते हुए वचन दिया कि,

  इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ।

  तदा तदाऽवतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ।।  

अर्थ – जब-जब दानवों द्वारा जगत् को बाधा पहुंचेगी, तब-तब मैं अवतार धारण कर शत्रुओं का नाश करूंगी। इस श्लोक के अनुसार जगत में जब भी तामसी, आसुरी एवं दुष्ट लोग प्रबल होकर, सात्त्विक, उदार एवं धर्मनिष्ठ व्यक्तियों को अर्थात साधकों को कष्ट पहुंचाते हैं, तब धर्मसंस्थापना हेतु अवतार धारण कर देवी उन असुरों का नाश करती हैं।

माता का वाहन यूं तो सिंह है लेकिन तिथि के अनुसार हर साल माता का वाहन अलग-अलग होता है। यानी माता सिंह की बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती हैं।

शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे। गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥

देवीभाग्वत पुराण के इस श्लोक में बताया गया है कि माता का वाहन क्या होगा यह दिन के अनुसार तय होता है। अगर नवरात्र का आरंभ सोमवार या रविवार को हो रहा है तो माता का आगमन गज अर्थात् हाथी पर होगा। शनिवार और मंगलवार को माता का आगमन होने पर उनका वाहन घोड़ा होता है। गुरुवार और शुक्रवार को आगमन होने पर माता डोली में आती हैं जबकि बुधवार को नवरात्र का आरंभ होने पर माता का वाहन नाव होता है। इस वर्ष शनिवार को नवरात्र का आरंभ हो रहा है, इसी दिन कलश स्थापना किया जाएगा इसलिए माता का वाहन घोड़ा है। घोड़े पर सवार होकर माता के आगमन का मतलब घरती पर युद्ध और आतंक हो सकता है।

देवी मां का भैंसे पर होगा प्रस्थान, जानिये भैंसे पर वापसी का अर्थ… एक ओर जहां शारदीय नवरात्रि 2020 में मां दुर्गा का अश्व पर आगमन होगा वहीं देवी मां भैंसे पर प्रस्थान करेंगी। ज्योतिष में भैसे को असूर माना गया है, ऐसे में देवी मां का भैसे पर गमन रोग और शोक की ओर इशारा करता है।

घटस्थापना के लिए आवश्यक सामग्री

  • सप्त धान्य (7 तरह के अनाज)
  • मिट्टी का एक बर्तन जिसका मुँह चौड़ा हो
  • पवित्र स्थान से लायी गयी मिट्टी
  • कलश, गंगाजल (उपलब्ध न हो तो सादा जल)
  • पत्ते (आम या अशोक के)
  • सुपारी
  • जटा वाला नारियल
  • अक्षत (साबुत चावल)
  • लाल वस्त्र
  • पुष्प (फ़ूल)

नवरात्रि घट स्थापना –

घटस्थापना की विधि में देवी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। घटस्थापना की विधि के साथ कुछ विशेष उपचार भी किए जाते हैं। पूजाविधि के आरंभ में आचमन, प्राणायाम, देशकाल कथन करते हैं। तदुपरांत व्रत का संकल्प करते हैं। संकल्प के उपरांत श्री महागणपति पू्जन करते हैं। इस पूजन में महागणपति के प्रतीक स्वरूप नारियल रखते हैं। व्रत विधान में कोई बाधा न आए एवं पूजा स्थल पर सात्विक भाव आकृष्ट हो सकें इसलिए यह पूजन किया जाता है। श्री महागणपति पूजन के उपरांत आसन शुद्धि करते समय भूमि पर जल से त्रिकोण बनाते हैं। तदउपरांत उसपर पीढा रखते हैं। आसन शुद्धि के उपरांत शरीर शुद्धि के लिए षडन्यास किया जाता है। तत्पश्चात पूजा सामग्री की शुद्धि करते हैं।

घट स्थापना विधि

पूजा स्थल पर खेत की मिट्टी लाकर चैकोर स्थान बनाते हैं। उसे वेदी कहते हैं।

वेदी पर गेहूं डालकर उसपर कलश रखते हैं।

कलश में पवित्र नदियों का आवाहन कर जल भरते हैं।

चंदन, दूर्वा, अक्षत, सुपारी एवं स्वर्णमुद्रा अथवा सिक्के इत्यादि वस्तुएं कलश में डालते हैं।

इनके साथ ही हीरा, नीलमणि, पन्ना, माणिक एवं मोती ये पंचरत्न भी कलश में रखते हैं।

पल, बरगद, आम, जामुन तथा औदुंबर ऐसे पांच पवित्र वृक्षों के पत्ते भी कलश में रखते हैं।

कलश पर पूर्ण पात्र अर्थात चावल से भरा ताम्रपात्र रखते हैं।

वरुण पूजन के उपरांत वेदी पर कलश के चारों ओर मिट्टी फैलाते हैं।

इसके उपरांत मिट्टी पर विविध प्रकार के अनाज डालते हैं।

उसपर पर्जन्य के प्रतीक स्वरूप जल का छिडकाव करते हैं। अनाज से प्रार्थना करते हैं।

तदुपरांत देवी आवाहन के लिए कुंभ अर्थात कलश से प्रार्थना करते हैं, देव-दानवों द्वारा किए समुद्र मंथन से उत्पन्न हे कुंभ, आपके जल में स्वयं श्रीविष्णु, शंकर, सर्व देवता, पितरों सहित विश्वेदेव सर्व वास करते हैं। श्री देवी मां के आवाहन के लिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूं।

घट स्थापना करने के पश्चात नवरात्रि व्रत का और एक महत्त्वपूर्ण अंग है अखंडदीप स्थापना।

अखंडदीप स्थापना की विधि

जिस स्थान पर दीप की स्थापना करनी है, उस भूमि पर वास्तु पुरुष का आवाहन करते हैं।

जिस स्थान पर दीप की स्थापना करनी है, उस भूमि पर जल का त्रिकोण बनाते हैं। उस त्रिकोण पर चंदन, फूल एवं अक्षत अर्पण करते हैं।

दीप के लिए आधार यंत्र बनाते हैं।

तदुपरांत उसपर दीप की स्थापना करते हैं।

दीप प्रज्वलित करते हैं।

इस प्रज्वलित दीप का पंचोपचार पूजन करते हैं।

नवरात्रि व्रत निर्विघ्न रूप से संपन्न होने के लिए दीप से प्रार्थना करते हैं।

कुल की परंपरा के अनुसार इस दीप में घी अथवा तेल का उपयोग करते हैं। कुछ परिवारों में घी के एवं तेल के दोनों ही प्रकार के दीप जलाए रखने की परंपरा है।

देवताओं की स्थापना विधि

कलश से प्रार्थना करने के उपरांत पूर्णपात्र में सर्व देवताओं का आवाहन कर उनका पूजन करते हैं। तदुपरांत आवाहन में कोई त्रुटि रह गई हो, तो क्षमा मांगते हैं। क्षमायाचना करने से पूजक का अहं घटता है तथा देवताओं की कृपा भी अधिक होती है।

श्री दुर्गादेवी आवाहन विधि

कलश पर रखे पूर्णपात्र पर पीला वस्त्र बिछाते हैं।

उस पर कुमकुम से नवार्णव यंत्र की आकृति बनाते हैं।

मूर्ति, यंत्र और मंत्र ये किसी भी देवता के तीन स्वरूप होते हैं। ये अनुक्रमानुसार अधिक सूक्ष्म होते हैं। नवरात्रि में किए जाने वाले देवीपूजन की यही विशेषता है कि, इसमें मूर्ति, यंत्र और मंत्र इन तीनों का उपयोग किया जाता है।

सर्वप्रथम पूर्णपात्र में बनाए नवार्णव यंत्र की आकृति के मध्य में देवी की मूर्ति रखते हैं।

मूर्ति की दाईं ओर श्री महाकाली के तथा बाईं ओर श्री महासरस्वती के प्रतीक स्वरूप एक-एक सुपारी रखते हैं।

मूर्ति के चारों ओर देवी के नौ रूपों के प्रतीक स्वरूप नौ सुपारियां रखते हैं।

अब देवी की मूर्ति में श्री महालक्ष्मी का आवाहन करने के लिए मंत्रोच्चारण के साथ अक्षत अर्पित करते हैं।

मूर्ति की दाईं और बाईं ओर रखी सुपारियों पर अक्षत अर्पण कर क्रम के अनुसार श्री महाकाली और श्री महासरस्वती का आवाहन करते हैं।

मूर्ति की दाईं ओर रखी सुपारी पर अक्षत अर्पण कर श्री महाकाली और बाईं ओर रखी सुपारी पर श्री महासरस्वती का आवाहन करते हैं।

तत्पश्चात नौ सुपारियों पर अक्षत अर्पण कर नवदुर्गा के नौ रूपों का आवाहन करते हैं तथा इनका वंदन करते हैं।

श्री दुर्गादेवी का षोडशोपचार पूजन –

अब देवी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इसमें सर्वप्रथम देवी को अध्र्य, पाद्य, आचमन आदि उपचार अर्पण करते हैं। इसके उपरांत देवी को पंचामृत स्नान कराते हैं। तदुपरांत शुद्ध जल, चंदन मिश्रित जल, सुगंधित द्रव्य मिश्रित जल से स्नान कराते हैं और अंत में श्री देवीमां को शुद्ध जल से महाभिषेक कराते हैं। उसके उपरांत देवी को कपास के वस्त्र, चंदन, सुहाग द्रव्य अर्थात हलदी, कुमकुम, सिंदूर, अष्टगंध अर्पण करते हैं। काजल लगाते हैं। मंगलसूत्र, हरी चूडियां इत्यादि सुहाग के अलंकार, फूल, दूर्वा, बिल्वपत्र एवं फूलों की माला अर्पण करते हैं।

श्री दुर्गादेवी की अंगपूजा

श्री दुर्गादेवी के शरीर का प्रत्येक अंग शक्ति का स्रोत है, इसीलिए श्री दुर्गादेवी के प्रत्येक अंगपर अक्षत अर्पित कर अंगपूजा की जाती है।

 

श्री दुर्गादेवी की पूजा चरणों की ओर से आरंभ की जाती है। घुटने की अर्थात् श्री देवीमंगला की। कमर की अर्थात् श्री देवी भद्रकाली की, दाएं बाहू की अर्थात् श्री महागौरी की पूजा। बाएं बाहू की अर्थात् श्री वैष्णवी की पूजा। कंठ की अर्थात् श्री स्कंधमाता की, मुख की अर्थात् श्री सिंहवाहिनी की पूजा।

दिशा, राशि, ऋतु जैसे आवरण यद्यपि शक्ति का पूर्ण अथवा सत्य स्वरूप नहीं हैं परंतु शक्ति के कार्य में मानवी जीवन से संबंधित इन सबका एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन्ही आवरणों की पूजा की जाती है। और एक एक रूप की पूजा से एक एक कष्ट की निवृत्ति होती है।

देवी को महानैवेद्य निवेदित करते हैं।

देवी की आरती करते हैं।

प्रार्थना करते हैं।

कलश पर प्रतिदिन एक अथवा कुल परंपरा के अनुसार प्रथम दिन एक, दूसरे दिन दो इस प्रकार माला बांधते हैं। माला इस प्रकार बांधें, कि वह कलश में पहुंच सके। नई माला चढाते समय पहले दिन की माला नहीं उतारी जाती।

राशियों के अनुसार नवरात्रि में विशेष पूजन –

मेष- इस राशि के लोगों को स्कंदमाता की विशेष उपासना करनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। स्कंदमाता करुणामयी हैं, जो वात्सल्यता का भाव रखती हैं।

वृषभ- वृषभ राशि के लोगों को महागौरी स्वरूप की उपासना से विशेष फल प्राप्त होते हैं। ललिता सहस्र नाम का पाठ करें। जन-कल्याणकारी है। अविवाहित कन्याओं को आराधना से उत्तम वर की प्राप्ति होती है।

मिथुन- इस राशि के लोगों को देवी यंत्र स्थापित कर ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए। साथ ही तारा कवच का रोज पाठ करें। मां ब्रह्मचारिणी ज्ञान प्रदाता व विद्या के अवरोध दूर करती हैं।

कर्क- कर्क राशि के लोगों को शैलपुत्री की पूजा-उपासना करनी चाहिए। लक्ष्मी सहस्रनाम का पाठ करें। भगवती की वरद मुद्रा अभय दान प्रदान करती हैं।

सिंह- सिंह राशि के लिए मां कूष्मांडा की साधना विशेष फल करने वाली है। दुर्गा मंत्रों का जप करें। ऐसा माना जाता है कि देवी मां के हास्य मात्र से ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। देवी बलि प्रिया हैं, अतः साधक नवरात्र की चतुर्थी को आसुरी प्रवृत्तियों यानी बुराइयों का बलिदान देवी चरणों में निवेदित करते हैं।

कन्या- इस राशि के लोगों को मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए। लक्ष्मी मंत्रों का साविधि जप करें। ज्ञान प्रदान करती हुई विद्या मार्ग के अवरोधों को दूर करती हैं। विद्यार्थियों हेतु देवी की साधना फलदाई है।

तुला- तुला राशि के लोगों को महागौरी की पूजा-आराधना से विशेष फल प्राप्त होते हैं। काली चालीसा या सप्तशती के प्रथम चरित्र का पाठ करें। जन-कल्याणकारी हैं। अविवाहित कन्याओं को आराधना से उत्तम वर की प्राप्ति होती है।

वृश्चिक- वृश्चिक राशि के लोगों को स्कंदमाता की उपासना श्रेष्ठ फल प्रदान करती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। वात्सल्य भाव रखती हैं।

धनु- इस राशि वाले मां चंद्रघंटा की उपासना करें। संबंधित मंत्रों का यथाविधि अनुष्ठान करें। घंटा प्रतीक है उस ब्रह्मनाद का, जो साधक के भय एवं विघ्नों को अपनी ध्वनि से समूल नष्ट कर देता है।

मकर- मकर राशि के जातकों के लिए कालरात्रि की पूजा सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। नर्वाण मंत्र का जप करें। अंधकार में भक्तों का मार्गदर्शन और प्राकृतिक प्रकोप, अग्निकांड आदि का शमन करती हैं। शत्रु संहारक है।

कुंभ- कुंभ राशि वाले व्यक्तियों के लिए कालरात्रि की उपासना लाभदायक है। देवी कवच का पाठ करें। अंधकार में भक्तों का मार्गदर्शन और प्राकृतिक प्रकोपों का शमन करती हैं।

मीन- मीन राशि के लोगों को मां चंद्रघंटा की उपासना करनी चाहिए। हरिद्रा (हल्दी) की माला से यथासंभव बगलामुखी मंत्र का जप करें। घंटा उस ब्रह्मनाद का प्रतीक है, जो साधक के भय एवं विघ्नों को अपनी ध्वनि से समूल नष्ट कर देता है।

 

 

 

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ज्योतिष

दिनांक 25.10.2020 का पंचांग एवं राशिफल

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शुभ संवत 2077 शक 1942 सूर्य दक्षिणायन का…द्वितीय (शुद्ध) आश्विन मास शुक्ल पक्ष नवमी तिथि … दिन को 07 बजकर 42 मिनट तक … दिन … रविवार … धनिष्ठा नक्षत्र …  रात्रि को 04 बजकर 23 मिनट तक … आज चंद्रमा … मकर राशि में … आज का राहुकाल दोपहर 04 बजकर 05 मिनट से 05 बजकर 30 मिनट तक होगा …

शक्तियों की प्राप्ति हेतु करें मां सिद्धिदात्री की पूजा –

या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्रि की नवमी तिथि को मां दुर्गा के नवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री का पूजन किया जाता है. देवी पुराण के मुताबिक सिद्धिदात्री की उपासना करने के बाद ही शिव जी ने सिद्धियों की प्राप्ति की थी. माना जाता है कि देवी सिद्धिदात्री की आराधना करने से लौकिक और परलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती है.

मां सिद्धिदात्रि का स्वरुप

हिन्दू धर्म के पुराणों में बताया गया है कि देवी सिद्धिदात्री के चार हाथ है जिनमें वह शंख, गदा, कमल का फूल तथा चक्र धारण करे रहती हैं. यह कमल पर विराजमान रहती हैं. इनके गले में सफेद फूलों की माला और माथे पर तेज रहता है. इनका वाहन सिंह है. देवीपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवी की शक्तियों और महिमाओं का बखान किया गया है.

देवी सिद्धिदात्री का पूजन-

– देवी दुर्गा या मां सिद्धिदात्री को लाल वस्त्र पर पूर्व दिशा की तरफ स्थापित करें.

– मां सिद्धिदात्री के सामने घी का दीपक जलाएं.

– कमल या लाल गुलाब के 9 फूल अर्पण करें.

– मां को भोग लगाने के लिए 9 तरीके का प्रसाद भी रखें.

– एक लाल या पीले आसन पर बैठकर ॐ सिद्धिदात्रये नमः मंत्र का 108 बार पाठ करें.

– जाप के बाद अपने मनोवांछित कार्य को बोलते हुए मां को अर्पण किए गए 9 फूल लाल वस्त्र में लपेटकर रखें.

– मां सिद्धिदात्री की कृपा से आपके हर कार्य में सफलता निश्चित है.

देवी का पूजन करते समय इन बातों का रखें ध्यान-

– देवी सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना में काले नीले रंग के वस्त्र का प्रयोग ना करें.

– पूजा पाठ के दौरान मन में दूषित विचार ना आने दें.

देवी सिद्धिदात्री की विशेष पूजा दिलाएगी रुका हुआ धन-

– देवी सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना से सर्व कार्य सिद्ध किए जा सकते हैं. इसके अलावा सातों चक्रों के साथ-साथ नवग्रहों भी को नियंत्रित किया जा सकता है.

– देवी सिद्धिदात्री के सामने गाय के घी का दीया जलाएं और उन्हें शुद्ध सिंदूर अर्पण करें.

– एक लाल आसन पर बैठकर निम्न मंत्र का जाप करें.

देवी सर्वभूतेषु सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता

नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः

– जाप के बाद देवी सिद्धिदात्री को अर्पण किए गए सिंदूर का तिलक करें. जब भी बाहर जाएं तिलक करके ही जाएं.

रात्रि का महाउपाय देगा अज्ञात भय से मुक्ति-

– नवरात्रि के नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री के समक्ष नवग्रह समिधा से हवन करने से नवरात्रि का पूर्ण फल मिलता है.

– देवी सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना करने से शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है.

– एक पान के पत्ते पर 9 साबुत फूलदार लौंग के साथ देसी कपूर पर रखें और 9 लाल गुलाब के फूलों के साथ देवी को अर्पण करके अपने अज्ञात भय को खत्म करने की प्रार्थना करें.

– ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे मंत्र का 108 बार लाल आसन पर बैठकर जाप करें.

– जाप के बाद लौंग को सिर से उल्टा 7 बार वारकर देसी कपूर में जलाएं.

– ऐसा करने से आपका अज्ञात भय दूर होगा और देवी सिद्धिदात्री की कृपा मिलेगी.

मां सिद्धिदात्री की मिलेगी विशेष कृपा-

– नवमी के दिन माता को कमल का फूल अर्पित करें.

– इससे माता की विशेष कृपा प्राप्त होगी.

मां सिद्धिदात्री को लगाएं उनका पसंदीदा भोग –

नवमी तिथि पर मां को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं जैसे- हलवा, चना-पूरी, खीर और पुए और फिर उसे गरीबों को दान करें. इससे जीवन में हर सुख-शांति मिलती है.

लौकिक और परलौकिक शक्तियों की प्राप्ति के लिए करें राशि अनुसार उपाय –

मेष राशि

मेष राशि के जातक आज मां सिद्धिदात्री की पूजा और मंत्र ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः करते समय नौ की संख्या में कमलगटटा, पान के पत्ते और एकाक्षी नारियल मां को अर्पित करें, लाल वस्त्र तथा मां को चरणपादुका भी अर्पित करें।

वृष राशि

मां सिद्धिदात्री को प्रसन्न करने के लिए वृष राशि के जातक कन्याओं को भोजन कराने के बाद उन्हें मीठा खिलाएं, लाल चुड़िया और लाल रंग का बटुआ नौ सिक्के डाल कर दें।

मिथुन राशि

मिथुन राशि के जातक कन्याओं को भोजन कराएं और उनकी मनपसंद मिल्क से बनी मिठाई तथा लिखाई की सामग्री भेंट करें। साथ ही मां को हरी चमकीली चुनरी तथा मूंग से बनी मिठाई चरणों में अर्पित कर मंत्र का जाप करें।

कर्क राशि

कर्क राशि के जातक पूजा करते समय मां सिद्धिदात्री को पीले वस्त्र, पीले पुष्प तथा मीठे पके रसीले फल अर्पित करें।

सिंह राशि

सिंह राशि के जातक मां सिद्धिदात्री को चने और हलवे का भोग लगाएं और इसे गरीब बच्चों में वितरित कर दें।

कन्या राशि

कन्या राशि के जातक पूजा करते समय मां सिद्धिदात्री को सुहाग की सामग्री तथा हरी चुड़िया अर्पित करें और मां को नारियल का भोग लगाएं।

तुला राशि

तुला राशि के जातक  का पाठ करें और छोटी कन्याओं को भोजन कराकर उन्हें उपहार में पाठ्य सामग्री तथा लेखन सामग्री दें।

वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि के जातक मां के समक्ष ज्योत प्रज्वलित करें और इसके बाद घर की सभी जगहों पर गंगाजल छिड़कें उसके उपरांत मंत्र ऊॅं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नमः का जाप करते हुए माता को पंजीरी का भोग लगाते हुए नारंगी रंग की चुनरी तथा मूंगे की माला अर्पित करें।

धनु राशि 

धनु राशि के जातक कन्याओं को भोजन कराकर उन्हें बालो को सजावट की सामग्री तथा सुगंधित सामग्री प्रदान करें।

मकर राशि 

मकर राशि के जातक मां सिद्धिदात्री के मंत्र ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम: का पाठ करें और कन्याओं तथा ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा सामथ्र्य अनुसार मोती का दान करें।

कुंभ राशि 

कुंभ राशि के जातक मां को हलवे का भोग लगाएं और इस प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित करें, बुजूर्ग महिला सदस्य को वस्त्र तथा शाल भेट करें।

मीन राशि 

मीन राशि के जातक आज मंत्र ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः का पाठ करें और मां के चित्र पर लाल चंदन लगाकर मोतीचूर के लड्डू प्रसाद में वितरित करें।

 

 

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दिनांक 24.10.2020 का पंचांग एवं राशिफल

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शुभ संवत 2077 शक 1942 सूर्य दक्षिणायन का… द्वितीय (शुद्ध) आश्विन मास शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि … दिन को 07 बजकर 00 मिनट तक … दिन … शनिवार … श्रवण़ नक्षत्र …  रात्रि को 02 बजकर 38 मिनट तक … आज चंद्रमा … मकर राशि में … आज का राहुकाल दिन 08 बजकर 56 मिनट से 10 बजकर 22 मिनट तक होगा …

अक्षय पुण्य प्राप्ति हेतु करें मां महागौरी की पूजा

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नवरात्रों के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है. माँ महागौरी की पूजा से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा जीवन में पवित्र और अक्षय पुण्य प्राप्त होता है.

महागौरी आदी शक्ति हैं इनके तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाश-मान होता है, इनकी शक्ति अमोघ फल प्रदान करने वाली हैं, देवी गौरी ने देवों की प्रार्थना व भक्तों के उद्धार हेतु शुम्भ निशुम्भ का अंत किया व सृष्टि को दैत्यों के प्रकोप से मुक्त कराया. यही शिवा और शाम्भवी के नाम से भी पूजित होती हैं. इनका पूजन सौभाग्य में वृद्धि करने वाला होता है.

महागौरी का पौराणिक महत्व

भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए देवी ने बचपन से ही कठोर तपस्या की थी, जिससे इनका शरीर काला पड़ गया. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वीकार करते हैं और इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी का रंग विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान, अत्यंत ओजपूर्ण होता जाता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं. गौर वर्ण की होने के कारण इन्हें गौरी नाम प्राप्त हुआ. महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं.

जो देवी गौरी की पूजा करते हैं उनका जीवन सुखमय रहता है देवी उनके पापों को जला देती हैं और शुद्ध अंतःकरण देती हैं. मां अपने भक्तों को अक्षय आनंद और तेज प्रदान करती हैं.

महागौरी पूजा विधि

नवरात्रि में इस दिन का विशेष महत्व होता है. कुछ लोग इस दिन व्रत का समापन करते हैं तो कुछ लोग नवमी के दिन. जो लोग अष्टमी पूजन करते हैं उनके लिए गौरी पूजा बहुत महत्वपूर्ण होती है. इस दिन देवी गौरी की पूजा का विधान पूर्ण रुप से भक्ति भाव से भरा होता है. अष्टमी के दिन भी देवी की पंचोपचार सहित पूजा करें. देवी का ध्यान करने के लिए ॐ देवी महागौर्यै नमः”. मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.

महागौरी की मूर्ति को लाल रंग के कपडे से लिपेट कर उन्हें चैकी पर रखा जाता है. सबसे पहले श्री गणेश जी का पूजन किया जाता है. पूजन में श्री गणेश पर जल, रोली, मौली, चन्दन, सिन्दूर, सुपारी, लोंग, पान,चावल, फूल, इलायची, बेलपत्र, फल, मेवा और दक्षिणा चढाते हैं. इसके पश्चात कलश का पूजन भी किया जाता है.

माता को हलवा और चने के प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। कन्या पूजन में सामर्थ्य के अनुसार इन कन्याओं को भोजन के लिए आमंत्रित करना चाहिए। कन्या पूजन में सर्वप्रथम कन्याओं के पैर धुलाकर उन्हें आसन पर एक पंक्ति में बिठाकर, मंत्र द्वारा कन्याओं का पंचोपचार पूजन करना चाहिए। रोली से तिलक लगाने के बाद उनकी कलाईयों पर कलावा बांधना चाहिए। इसके बाद उन्हें हलवा, पूरी और चने का प्रसाद परोसते हैं। कन्याओं के भोजन ग्रहण करने के बाद उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। अपनी सामर्थ्यनुसार, कोई भी भेंट तथा दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धा पूर्वक अष्टमी पूजन करने से भक्तों समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

– नवरात्रि के आठवें दिन मां से शीघ्र विवाह का वरदान मिल सकता है. साथ ही वैवाहिक जीवन भी सुखमय हो सकता है.

– माना जाता है कि माता सीता ने श्री राम की प्राप्ति के लिए इन्हीं की पूजा की थी.

– विवाह संबंधी तमाम बाधाओं के निवारण में इनकी पूजा अचूक होती है.

– ज्योतिष में इनका संबंध शुक्र नामक ग्रह से माना जाता है.

परिणाम ज्यादा शुभ के लिए क्या है मां गौरी की पूजा विधि?

– पीले वस्त्र धारण करके पूजा आरंभ करें.

– मां के समक्ष दीपक जलाएं और उनका ध्यान करें.

– पूजा में मां को श्वेत या पीले फूल अर्पित करें.

– उसके बाद इनके मन्त्रों का जाप करें.

– अगर पूजा मध्य रात्रि में की जाय तो इसके परिणाम ज्यादा शुभ होंगे.

विवाह की बाधा दूर करने के लिए ऐसे करें देवी महागौरी की पूजा अर्चना

– लकड़ी के पटरे पर स्वच्छ पीला वस्त्र बिछाकर देवी महागौरी की प्रतिमा को स्थापित करें.

– स्वयं भी पीले वस्त्र धारण करके पूरे पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें.

– देवी महागौरी के सामने गाय के घी का दिया जलाएं और उनका ध्यान करें.

– देवी मां को सफेद या पीले फूल दोनों हाथों से अर्पण करें तथा मंत्र का जाप करें.

– प्रसाद के रूप में देवी महागौरी को नारियल अर्पण करें.

– ऐसा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी और कन्याओं को सुयोग्य वर मिलता है.

देवी महागौरी पूजा से कैसे शुक्र को करें मजबूत ?

– मां की उपासना सफेद वस्त्र धारण करके करें.

– मां को सफेद फूल, और सफेद मिठाई अर्पित करें.

– फिर शुक्र के मूल मंत्र ॐ शुं शुक्राय नमः का जाप करें.

– शुक्र की समस्याओं के समाप्ति की प्रार्थना करें.

– नवरात्रि के आठवें दिन मां को सफेद फूल अर्पित करें.

– इससे मां की विशेष कृपा प्राप्त होगी.

नवदुर्गा का विशेष प्रसाद

– आज मां को नारियल का भोग लगाएं.

– इसे सर पर से फिरा कर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें.

-आपकी कोई एक खास मनोकामना पूर्ण होगी.

संपूर्ण मनोरथ पूर्ति हेतु किस राशि वाले कैसे करें मां महागौरी की पूजा और क्या करें उपाय

मेष राशि

मेष राशि वाले जातक मां महागौरी की पूजा करने के लिए एकादश स्थान के स्वामी शनि की शांति करें इसके लिए मां महागौरी को लाल फूल और एकाक्षी नारियल तथा नारियल से बने मिष्ठान अर्पण करें। मनोकामना पूरी करने के लिए माता महागौरी की पूजा करें साथ ही मंत्र ऊँ गौरये नमः का पाठ करके मां की पूजा करें।

वृषभ राशि

वृषभ राशि के जातक मां दुर्गा के महागौरी रूप की पूजा करें और उनको पंचमेवा, सुपारी, सफेद चंदन और फूल चढ़ाएं। साथ ही ऊँ सिद्धिकुंजिकास्तोत्र का पाठ करें। माता को मिश्री का भोग लगा सकते हैं।

मिथुन राशि

मिथुन राशि के जातक मां महागौरी की पूजा करें और उनको फूल, केला, धूप, कपूर से पूजा करें। साथ ही ऊँ शिव शक्त्यै नम: मंत्र का 108 बार जप करें और कवच का हर रोज पाठ करें।

कर्क राशि

कर्क राशि के जातक को मां महागौरी स्वरूप की पूजा में बताशा, चावल और दही का अर्पण करें। साथ ही मंत्र श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम: का पाठ करें। दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। ऐसे करने से आरोग्य की प्राप्ति होगी।

सिंह राशि

सिंह राशि के जातक को माता महागौरी देवी स्वरूप की उपासना में तांबे के पात्र में रोली, चंदन, केसर और कपूर से आरती उतारें। जीवन में सफलता पाने के लिए ऊँ साम्ब शिवाय नमः का पाठ जरूर करें।

कन्या राशि

कन्या राशि के जातक को मां महागौरी की पूजा करनी चाहिए। उनको फल, पान पत्ता, गंगाजल अर्पित करें। नवरात्र में आज के दिन एक माला श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम: मंत्र का जप करें और मां को खीर का भोग लगाएं।

तुला राशि

तुला राशि के जातक मां दुर्गा के महागौरी रूप की पूजा करें और उनको दूध, चावल और लाल चुनरी चढ़ाएं। इसके बाद कपूर और देसी घी से आरती करें। साथ ही ऊँ गौरये नमः का पाठ करें। गुलाबी रत्न से बनी माला का प्रयोग व नैवेद्य में सफेद बर्फी या मिश्री का भोग लगा सकते हैं।

वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि के जातक को महागौरी की उपासना में लाल फूल, चावल, गुड़ और चंदन के साथ पूजा करें। कपूर से माता की आरती उतारें और मंत्र श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम: जाप करें तथा कलाकंद का भोग लगायें एवं शहद अर्पित करें।

धनु राशि

धनु राशि के जातक को माता महागौरी स्वरूप की पूजा में हल्दी, केसर, पीले फूल और तिल का तेल अर्पित करें। ब्रह्म मुहूर्त में ऊँ गौरये नमः पाठ करें। माता को बेसन की मिठाई व केले चढ़ाएं।

मकर राशि

मकर राशि के जातक मां महागौरी की पूजा में सरसों तेल का दिया, फूल, कुमकुम अर्पित करें। नर्वाण मंत्र का जप करें। भोग में मां को उड़द से बनी मिठाई या हलवा चढ़ाएं।

कुंभ राशि 

कुंभ राशि के जातक को मां महागौरी की पूजा में फूल, कुमकुम और तेल का दीपक और फल अर्पित करें। देवी कवच का पाठ करें। भोग में मां को आटे का हलवा और सूखे मेवे चढ़ाएं।

मीन राशि 

मीन राशि के जातक को मां महागौरी की पूजा में हल्दी, चावल, पीले फूल और केले के साथ पूजन करें। नवरात्र में आज के दिन श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम: मंत्र का एक माला जप करें और मां को भोग में रसीले फल तथा खीर का भोग लगाकर बड़ो को प्रसाद वितरित करें।

 

 

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ज्योतिष

दिनांक 23.10.2020 का पंचांग एवं राशिफल

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शुभ संवत 2077 शक 1942 सूर्य दक्षिणायन का…द्वितीय (शुद्ध) आश्विन मास शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि … दिन को 06 बजकर 58 मिनट तक … दिन … शुक्रवार … उत्तरा आषाढ़ नक्षत्र …  रात्रि को 01 बजकर 28 मिनट तक … आज चंद्रमा … मकर राशि में … आज का राहुकाल दिन 10 बजकर 22 मिनट से 11 बजकर 48 मिनट तक होगा …

 

काल का नाश करने वाली  मां कालरात्रि दूर करती हैं भय, निराशा व चिंता

मां कालरात्रि नाम से ही अभिव्यक्त होता है कि दुर्गा की यह सातवीं शक्ति घने अंधकार की तरह एकदम काली हैं। इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है। माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम शुभंकारी भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

मां को गुड़ का भोग प्रिय है

सप्तमी तिथि के दिन भगवती की पूजा में गुड़ का नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मण को दे देना चाहिए. ऐसा करने से शोकमुक्त हो सकते हैं।

मां कालरात्रि की पूजा करने से शनि ग्रह संबंधी दोष दूर हो जाते हैं। इतना ही नहीं मृत्यु तुल्य कष्टों से भी मुक्ति मिलती है। मां की आराधना करने से सभी क्षेत्रों में सफलता मिलती है। यह माना जाता है कि मां कालरात्रि की पूजा से हड्डी संबंधी रोगों, श्वांस, फालिस आदि में लाभ होता है। इतना ही नहीं निराशा, चिंता व भय भी दूर होता है।

कथा

शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि के पूजन में बेला का फूल मां को अर्पित करें। कथा है कि जब देवी पार्वती ने शुंभ व निशुंभ नामक दैत्यों के नाश के लिए अपनी वाह्य त्वचा को हटाया, तब उन्हें कालरात्रि नाम मिला। देवी पार्वती का यह सबसे भयंकर रूप है, वह अपने भक्तों को अभय व वरद मुद्रा में आशीर्वाद देती हैं। अपनी शुभाशुभ शक्तियों के कारण देवी कालरात्रि को देवी शुंभकरी कहकर भी बुलाया जाता है।

पूजा विधि, भोग

माँ दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा विधि

नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए, फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए। सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें, इसके पश्चात माता कालरात्रि जी की पूजा कि जाती है। पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है। सप्तमी की पूजा अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है। इस दिन कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। लाल चम्पा के फूलों से माँ प्रसन्न होती हैं। दूध , खीर या अन्य मीठे प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। लाल चन्दन , केसर , कुमकुम आदि से माँ को तिलक लगाएँ। अक्षत चढ़ाएं और माँ के सामने सुगंधित धूप आदि भी लगाएँ। मंत्र पढ़ें

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

 

सावधानी

मां काली की उपासना का सबसे उपयुक्त समय मध्य रात्रि का होता है.

इनकी उपासना में लाल और काली वस्तुओं का विशेष महत्व होता है.

शत्रु और विरोधियों को शांत करने के लिए मां काली की उपासना अमोघ है.

किसी गलत उद्देश्य से मां काली की उपासना कतई नहीं करनी चाहिए.

मंत्र जाप से ज्यादा प्रभावी होता है मां काली का ध्यान करना.

ज्यादा बुराई से दूर होते जाएंगे, मां काली के उतने ही करीब होते जाएंगे. फिर संसार की हर विपत्ति से आपकी सुरक्षा करेंगी मां काली.

कालरात्रि की क्या पूजा करें और किस उपाय से करें अपने ग्रहो को शांत

मेष राशि

मेष राशि वाले जातक सभी प्रकार के कष्टो और भय से मुक्त होने के लिए मां कालरात्रि की पूजा ॐ कालरात्र्यै नम: मंत्र से करें, साथ ही माता को ग्यारह नींबू की माला अर्पित करें एवं गुड़ का भोग लगायें।

वृषभ राशि

इस राशि वाले जातक सभी प्रकार से सुख प्राप्ति एवं हानि से बचने के लिए मां कालरात्रि की मध्यरात्रि की पूजा ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गति नाशिन्यै महामायायै स्वाहा मंत्र से करें साथ ही माता को तिल से बनी मिठाईयां और नीली साड़ी अर्पित करें।

मिथुन राशि

इस राशि वाले जातक माता को काई हरी साड़ी तथा महावर चरणों में अर्पित करें एवं उड़द दाल की खिचड़ी का भोग लगाकर गरीबों में प्रसाद के रूप में वितरित करें साथ ही या देवी सर्वभूतेषु कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ मंत्र का 108 जाप करें।

कर्क राशि

इस राशि वाले जातक माता को चरण पादुका अर्पित करें एवं चांदी की गाय और बछिया की जोड़ी मां के चरणों में रखें तथा ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मंत्र से माता की पूजा करें, और केले का भोग लगायें।

सिंह राशि

इस राशि वाले जातक मां कालरात्रि की पूजा में पंजीरी का भोग लगाकर माता को रक्तलाल चुनरी चरणों में अर्पित करें एवं ॐ फट् शत्रून साघय घातय ॐ मंत्र का 108 माला जाप करें।

कन्या राशि

कन्या राशि वाले जातक सभी प्रकार के शत्रुबाधा को दूर करने के लिए माता के मंत्र ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गति नाशिन्यै महामायायै स्वाहा का जाप करें तथा माता को गुड़ और तिल से बनी मिठाई का भोग लगायें।

तुला राशि

तुला राशि वाले जातक मां कालरात्रि की पूजा में सिंघाड़े का भोग लगायें और मिश्री का प्रसाद वितरित करें साथ ही मंत्र ॐ कालरात्र्यै नम: का जाप करते हुए किसी अपंग को तिल का तेल दें।

वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि वाले जातक मां कालरात्रि की पूजा में मंत्र का जाप करते हुए अनार का दान करें एवं मां को जामुनिया रंग का वस्त्र अर्पित करें एवं ॐ फट् शत्रून साघय घातय ॐ मंत्र का जाप करें, इससे उनके जीवन में कटुता दूर होकर रिश्तों में मधुरता आयेगी।

धनु राशि

धनु राशि वाले जातक अपने जीवन में अपयश दूर करने के लिए माता के मंत्र ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का 11 हजार बार जाप करें साथ ही किसी बुजूर्ग या गुरू तुल्य व्यक्ति को छाता तथा काला शाल अर्पित करें एवं पीठे का प्रसाद दें।

मकर राशि

मकर राशि वाले जातक मां कालरात्रि की पूजा से अपने कर्मक्षेत्र के विरोध को दूर कर सकते हैं इसके लिए उन्हें नारंगी रंग का वस्त्र मां को अर्पित करते हुए खट्टे फल मां के चरणों में अर्पित करना चाहिए और ॐ कालरात्र्यै नम: मंत्र का जाप करना चाहिए।

कुंभ राशि

कुंभ राशि वाले जातक आटे का दीपक बनाकर घी से प्रज्जवलित कर मां के निम्न मंत्र ॐ फट् शत्रून साघय घातय ॐ का एक माला जाप करते हुए शहद का दान करें और माता को आरेंज रंग की चुड़िया अर्पित करें।

मीन राशि

मीन राशि वाले लोग अपने जीवन में सभी सुख प्राप्ति हेतु मां को चीनी एवं चावल से बने लड्डू का भोग लगाते हुए मां को ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गति नाशिन्यै महामायायै स्वाहा मंत्र अर्पित करें एवं सुहाग की सामग्री मां के चरणों मे रखें।

 

 

 

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