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अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह,चिदंबरम से मिलने तिहाड़ जेल पहुंचे.

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पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के सीनियर नेता पी. चिदंबरम आईएनएक्स मीडिया केस में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की जांच का सामना कर रहे हैं. चिदंबरम इन दिनों तिहाड़ जेल में बंद हैं. इस बीच कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सोमवार को चिदंबरम से मिलने तिहाड़ जेल पहुंचे.

सोनिया-मनमोहन से पहले कार्ति चिदंबरम ने अपने पिता पी. चिदंबरम से जेल में मुलाकात की. पिता से मिलने के बाद कार्ति चिदंबरम ने कहा, ‘कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सिंह के तिहाड़ आकर मिलने पर मेरे पिता उनके शुक्रगुजार हैं. इस राजनीतिक लड़ाई में उनका समर्थन हमारे परिवार के लिए एक शक्ति की तरह है.’

हाल ही में कांग्रेस के सीनियर नेता गुलाम नबी आजाद और अहमद पटेल पिछले हफ्ते तिहाड़ जेल में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम से मुलाकात की थी. इस दौरान उनके साथ चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम भी मौजूद थे. सूत्रों के अनुसार आधे घंटे तक चली बैठक के दौरान नेताओं ने मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर चिदंबरम से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने कश्मीर, आगामी चुनाव और देश में आर्थिक स्थिति पर चर्चा हुई थी.

तेजी से घट रहा चिदंबरम का वजन

दरअसल, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम की सेहत ठीक नहीं है. चिदंबरम को कई तरह की बीमारियां होने के कारण उनका वजन तेजी से घट रहा है. चिदंबरम के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से चिदंबरम को समय-समय पर मेडिकल सर्विस  और सप्लीमेंट्री डाइट देने की मांग की है. तिहाड़ से मिली जानकारी के मुताबिक, जेल में बंद चिदंबरम की पीठ और पेट में काफी दर्द रहने लगा है, जिसके कारण वह न तो बैठ पा रहे हैं और न ही लेट पाते हैं.

जमानत याचिका पर आज सुनवाई

कोर्ट ने बीते गुरुवार को सुनवाई के दौरान चिदंबरम की न्यायिक हिरासत की अवधि 3 अक्टूबर तक बढ़ा दी थी. अब उनकी जमानत याचिका पर 23 सितंबर को दिल्ली की हाईकोर्ट में सुनवाई होगी.

जयराम रमेश ने की टिप्पणी

वहीं कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश  ने कहा कि ‘हमारे पूर्व गृहमंत्री चिदंबरम के खिलाफ सरकार द्वारा चलाया गया एक अभियान है, जिसमें चिदंबरम के खिलाफ उकसाने वाली राजनीति में आईएनएक्स मीडिया से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों और विवरणों का उल्लेख नहीं किया गया है.’

जयराम रमेश ने कहा कि ‘जांच एजेंसियों ने कभी नहीं कहा कि अधिकारियों ने कुछ भी गलत किया है, फिर कैसे मंत्री को दोषी ठहराया जा सकता है. आप मुझसे पूछते हैं कि क्या अधिकारियों को अब गिरफ्तार किया जाना चाहिए, तो मैं कहूंगा कि पूर्व एफएम ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कुछ भी गलत नहीं किया गया है, फिर किसी अधिकारी को क्यों गिरफ्तार किया गया है? यह बहुत स्पष्ट है कि किंगपिन सरकार में है जो इस एजेंडे को चला रहे हैं न कि चिदंबरम.

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स्वीडन के इतिहास में छिपा है लॉकडाउन न करने का राज, जानें पूरी कहानी

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यूरोपीय देश स्वीडन अपने शानदार ह्यूमन इंडेक्स की वजह से दुनियाभर में पहचाना जाता है. इस देश को दुनिया के सबसे शांतिप्रिय और प्रगतिशील देशों की लिस्ट में जगह मिली हुई है. कोरोना वायरस से दुनिया के अन्य देशों की तरह स्वीडन भी जूझ रहा है. लेकिन इस महामारी की रोकथाम के लिए उठाए गए कदमों को लेकर स्वीडन की चर्चा एक बार फिर पूरी दुनिया में हो रही है. दिलचस्प रूप से स्वीडन ने कोरोना वायरस को रोकने के लिए अपने यहां कोई लॉकडाउन नहीं किया और न ही हेल्थ इमरजेंसी घोषित की. स्वीडन द्वारा अपनाए गए इन तरीकों की कई जगह आलोचनाएं भी हुईं.

अब बीते सप्ताह आई एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वीडन में कोरोना डेथ रेट दुनिया में सबसे ज्यादा है. लेकिन इसके बावजूद भी स्वीडन की सरकार लॉकडाउन या कोई सख्त कदम उठाने को तैयार नहीं है. ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में प्रकाशित एक लेख में स्वीडन द्वारा लॉकडाउन न किए जाने के फैसले की पड़ताल की है. इस लेख के मुताबिक स्वीडन के इस बड़े फैसले के पीछे उसका 100 सालों का इतिहास काम कर रहा है.

इस लेख में कहा गया है कि स्वीडन ने कोरोना वायरस को किसी नेशनल इमरजेंसी के तौर पर देखने के बजाए एक सीरियस पब्लिक हेल्थ प्रॉब्लम के तौर पर देखा है. दुनिया के अन्य देश कोरोना को भले ही एक अदृश्य दुश्मन मान रहे हों लेकिन स्वीडन ऐसा नहीं मानता. सरकार का मानना है कि इस महामारी से लड़ने के लिए बेहद सख्त कानून की बजाए लोगों में जागरुकता पैदा करना ज्यादा जरूरी है. किसी हेल्थ क्राइसिस के दौर में सिविल लिबर्टी को खत्म कर देने के फैसले को ज्यादा बुरा माना गया. हालांकि ये भी सच है कि इसी दौरान आस-पास के अन्य नॉर्डिक देश जैसे डेनमार्क और नॉर्वे ने लॉकडाउन किया. लेकिन स्वीडन ने इन सभी देशों के फैसलों से खुद को अलग रखा.

द गार्जियन के लेख में कहा गया है कि सख्त उपाय न करने के पीछे स्वीडन का बीते सौ सालों का इतिहास भी जिम्मेदार हो सकता है. दरअसल देश में बीते सौ सालों के दौरान कोई भी नेशनल इमरजेंसी या त्रासदी नहीं आई है. 1909 में देश में हुई बड़ी हड़ताल के बाद अब तक कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन या संघर्ष देश में नहीं हुआ है. जबकि इस दौरान यूरोप के अन्य देशों ने कई युद्धों में हिस्सा लिया या फिर उनके यहां बड़े सामाजिक आंदोलन हुए. जैसे ब्रिटेन में खदान मजदूरों की हड़ताल या फिर स्पेन और फिनलैंड में हुए गृह युद्ध जैसे हालातों से स्वीडन बिल्कुल नावाकिफ है. स्वीडिश लोगों के बारे में आस-पास के देशों में धारणा है कि ये लोग कॉन्फ्लिक्ट से बेहद दूरी बनाकर रखते हैं.

इसके अलावा 1810 के बाद से स्वीडन किसी भी देश के साथ सशस्त्र संघर्ष में नहीं उलझा है. लेकिन उसके पड़ोसी देश नॉर्वे और डेनमार्क पर जर्मनी ने द्वितीय विश्व युद्द के दौरान हमला कर दिया था. वहीं फिनलैंड पर सोवियत ने हमला कर दिया था. लेकिन स्वीडन द्वितीय विश्व युद्ध से भी बचकर निकल गया.

शायद यही वजह है कि जब कोरोना वायरस से दुनियाभर के देश हैरान-परेशान थे तब भी स्वीडन ने कठोर कदमों से परहेज रखा. वहां की सरकार ने सिविल लिबर्टी को कोरोना वायरस से भी ऊपर तरजीह दी है. और शायद यही वजह है कि स्वीडन का हेल्थ डिपार्टमेंट हर्ड इम्यूनिटी जैसे कॉन्सेप्ट की बात करता दिखता है जिसे दुनिया के अन्य देश खतरनाक मान रहे हैं. लेकिन स्वीडिश हेल्थ एक्पर्ट्स का मानना है कि सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में पब्लिक को बताना ज्यादा जरूरी है, बजाए कि पैनिक सिचुएशन क्रिएट करने के. सरकार को भरोसा है कि वो कोरोना वायरस से भी जंग जीत जाएगी. लेकिन इसके लिए वो कोई सख्त कदम नहीं उठाने जा रहे हैं.

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राजौरी में घोड़ा हुआ होम क्वारनटीन, मालिक की रिपोर्ट का इंतजार

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कोरोना वायरस को लेकर हर ओर डर का माहौल है. कोई भी इस महामारी को लेकर कोताही नहीं बरत रहा है. इसी कारण जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के प्रशासन ने एहतियातन एक घोड़े को होम क्वारनटीन कर दिया है. अपनी तरह का यह पहला मामला है जिसमें एक घोड़े को राजौरी जिले के थाना मंडी क्षेत्र में अधिकारियों ने होम क्वारनटीन कर दिया है.

हुआ यूं कि एक शख्स जो अपने घोड़े के साथ मुगल रोड से कश्मीर घाटी से आ रहा था, जिसे पुलिसकर्मियों ने पूछताछ के लिए रोक लिया. चूंकि शख्स कोरोना वायरस के लिए निर्धारित रेड जोन से आया था, इसलिए उसे तुरंत प्रशासनिक क्वारनटीन के लिए भेज दिया गया. साथ ही उसका सैंपल लेकर टेस्टिंग के लिए भेज दिया गया है.

परिजनों को भी दूर रखा गया

घोड़े को उसके मालिक के घर ले जाया गया और उसे आइसोलेशन में रखा गया है. पशु चिकित्सकों की एक टीम ने मंगलवार को घोड़े का टेस्ट लिया. उसमें किसी तरह की बीमारी के कोई लक्षण नहीं मिले. हालांकि, घोड़े के मालिक के परिवार के सदस्यों को उससे दूर रहने को कहा गया है. घोड़े का सैंपल नहीं लिया गया है. अधिकारी फिलहाल घोड़े के मालिक के टेस्ट रिजल्ट का इंतजार कर रहे हैं.

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video : शराबी कूदा भालू के पिंजरे में…. फिर खुद को बचने करने लगा कुछ ऐसा..

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पौलेंड एक चिड़ियाघर में तब हंगामा मच गया जब एक शराबी न सिर्फ भालू के पिंजरे में कूद गया बल्कि उसे पानी में डुबोकर मारने की कोशिश करने लगा. हालांकि भालू उसके काबू में नहीं आया और उल्टा शराबी व्यक्ति ही बुरी तरह घायल हो गया. चिड़ियाघर में मौजूद कई लोगों ने इस पूरी घटना को कैमरे में कैद कर लिया जिसे बाद में सोशल मीडिया पर शेयर किया गया है.

द इंडिपेंडेंट के मुताबिक वारसा के एक चिड़ियाघर में नशे में धुत 23 वर्षीय एक शख्स भालू के पिंजरे में कूद गया. ये शख्स न सिर्फ कूदा बल्कि बाद में उससे बचने के लिए पानी में चला गया और जब भालू उसके पीछे-पीछे पानी में आया तो उसने उसे डुबोकर मारने की असफल कोशिश भी की. हालांकि भालू काफी शक्तिशाली था और उसने इस शख्स को बुरी तरह घायल कर दिया. बाद में बचाव दल ने इस शख्स को भालू के पिंजरे से बहार निकाला. इस व्यक्ति के सिर और हाथों पर काफी चोट आई है.

इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो गयी है. लोग पिंजरे में घुसे आदमी के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं. बता दें कि जिस भालू के पिंजरे में ये शख्स कूदा था वह अभी बच्चा ही है, इसी के चलते इस व्यक्ति की जान बच सकी. जानकारों के मुताबिक अगर ये व्यक्ति एक वयस्क भालू के साथ ऐसी हरक़त करता तो इसका बचना नामुमकिन था. भालू का नाम सबीना बताया जा रहा है, जिसे एक सर्कस से छुड़ाया गया है. चिड़ियाघर के प्रशासन ने बताया कि सबीना भी इस हमले से काफी घबराई हुई है.

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