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लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा फेक न्यूज – सोशल मीडिया पर हो सर्तक निगाहें

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नहीं, 2000 रुपये के नए नोटों में कोई जीपीएस चिप नहीं लगी है।

नहीं, यूनेस्को ने हमारे राष्ट्रगान को दुनिया का सबसे अच्छा राष्ट्रगान घोषित नहीं किया है।

यूनेस्को एक संस्था के रूप में ऐसा करती भी नहीं है!

नहीं, भारत में 2016 में नमक की कोई किल्लत भी नहीं थी।
अगर आपको ऐसा लगता है कि इन बेतुकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता,

तो आपको बता दें कि जब अंतिम अफवाह फैली थी तो इस अफरा-तफरी में कानपुर में एक महिला की मौत हो गई थी।

ये सभी झूठी खबरें (फेक न्यूज) थीं जो फेसबुक, ट्विटर और व्हॉट्सऐप पर वायरल हुए, ऐसी अफवाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी है।

बीते कुछ साल में फेक न्यूज इतनी बड़ी मुसीबत बनकर उभरी है कि इनकी वजह से लोगों की हत्याएं, हिंसा, दंगे और आगजनी हो चुकी है। फेक न्यूज के कारण भीड़ की हिंसा और लिंचिंग के मामलों में लोगों की मौत हुई है। इसी प्रकार के कई न्यूज हैं जो कि हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं और अच्छे पढ़े लिखे लोग भी इन फर्जी समाचार से भम्रित हो रहे हैं या कहना चाहिए कि पढ़े लिखे लोग ही ज्यादा भरोसा करते देखे गए हैं। फेक न्यूज के फैलने में व्हाट्स ऐप को जिम्मेदार माना जाता है जिसके सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की जुलाई 2018 में जारी रिपोर्ट के अनुसार प्राइवेट टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स का कुल मोबाइल सब्सक्राइबर्स बेस 100.408 करोड़ हो गया है। इसके अलावा फेसबुक, ट्वीटर, लिंकडिन जैसी साईटस भी हैं, पर सबसे ज्यादा व्हाट्सअप और फेसबुक इसका जरिया है।
“अपनी इमेज चमकाने के लिए, कभी अपने विरोधी की इमेज खराब करने के लिए, कभी नफरत फैलाने के लिए तो कभी भ्रम पैदा करने के लिए ऐसे मैसेज फैलाए जाते हैं।”
इन मैसेजों के झांसे में आने वाले न सिर्फ बेवकूफ बनते हैं बल्कि अनजाने में शातिर लोगों के हाथों इस्तेमाल भी होते हैं, कई बार लोग किसी खास सोच से प्रभावित होकर जानते हुए भी झूठ फैलाते हैं। फर्जी खबरें थोक इस समय बेतहाशा आने लगी हैं। इन खबरों में एक खास अजेंडा होता है, कुछ खास तरह के लोगों को लपेटे में लेने के लिए इन्हें गढ़ा जाता है। कुछ खास तरह के लोगों का यकीन हासिल करने की कोशिश होती है। कुछ खास तरह के लोगों को निशाना बनाया जाता है। ये सिलसिला और आगे बढ़ निकला है। अब फेक न्यूज एक विशाल बरगद बन गया है, विराट, बहुत दूर तक फैल गया है।

“सोशल मीडिया पर सही खबरों से ज्यादा फर्जी खबरें तैर रही हैं। खबर झूठी, घटना झूठी, तस्वीरें झूठी, जगहों के नाम झूठे, लोगों के नाम झूठे, उत्तरी अफ्रीका की खबर छत्तीसगढ़ की बनाकर शेयर हो जाती है। इराक में कुछ होता है, लोग मुजफ्फरनगर का कहकर चला देते हैं। पाकिस्तान का वीडियो जयपुर का बना दिया जाता है। कश्मीर की घटना उत्तराखंड की बताकर फैला दी जाती है।”

‘फेक न्यूज’ सिर के ऊपर का नीला आसमान हो गया है, अनंत. हर जगह मौजूद है। इसीलिए कॉलिन्स डिक्शनरी ने ‘फेक न्यूज’ को साल 2017 का सबसे बड़ा शब्द चुना था। भारत में ज्यादातर लोगों के लिए इंटरनेट का जरिया उनका मोबाइल फोन ही है और बहुत से लोगों को खबरें चैट ऐप्स से मिलती हैं और वहीं से वे उसे शेयर करते हैं। ये लोगों से जुड़ने का एक अच्छा तरीका है लेकिन ये एक ऐसी जगह है जहां गलत या फर्जी खबरें बिना किसी रोक-टोक के जल्दी फैलती हैं। लोगों के पास जानकारी और खबरों की बाढ़ आ जाती है और वे सच और झूठ में अंतर नहीं कर पाते। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ विजय मुखी कहते हैं, लोग झूठी या परेशान करने वाली जानकारी पोस्ट करते रहते हैं। उन्हें पता है कि उनके खिलाफ कोई कंपनी या संस्था कार्रवाई नहीं करेगी। आज अगर आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ फेसबुक पर कुछ लिखेंगे, तो आप गिरफ्तार हो सकते हैं, लेकिन अगर आप राहुल गांधी के खिलाफ कुछ लिखें, तो शायद कुछ न हो।
बहुत बड़ा है ‘फेक न्यूज’ का बाजार –
बीते सालो के मुकाबले इस ‘फेक न्यूज’ शब्द का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है. करीब 365 फीसदी। अमेरिका में, भारत में, डॉनल्ड ट्रंप तो राष्ट्रपति बनने के पहले से ही इस शब्द का खूब इस्तेमाल करते आए हैं. उनके ट्विटर हैंडल पर जाकर देखिए। कितने सारे ट्वीट्स में ये शब्द मिलेगा। मुझे नहीं लगता कि आप में से कोई ऐसा होगा, जिसने फेक न्यूज का जिक्र न सुना हो। फिर भी, इसका मतलब बता रही हूं. फेक न्यूज वो फर्जी जानकारियां होती हैं, जिन्हें न्यूज की शक्ल में चलाया जाता है. होती हैं सनसनीखेज, झूठी. मगर पेश ऐसे किया जाता है, मानो एकदम सच्ची हो, पुख्ता हों। ये जान-बूझकर बनाई जाती हैं, चलाई जाती हैं। बहुत सारे लोग दिन-रात फर्जी खबरें बनाने और फैलाने में जुटे हैं। जितनी बड़ी मीडिया इंडस्ट्री है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा कारखाना इस ‘फेक न्यूज’ का है। ये यूं ही नहीं है कि पिछले 2-3 सालों में ‘वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी’ हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है, पहले लगता था, लोगों से बात करने का प्लेटफॉर्म है। अब बस फॉरवर्ड की गई फर्जी खबरें ठेलने का अड्डा बन गया है। सोशल मीडिया पर जो चीजें हमारी आंखों के आगे से गुजरती हैं, उनमें आधी से ज्यादा शायद फर्जी होती हैं.
“यह जाहिर हो गया कि सोशल मीडिया किसी भी लोकतांत्रिक देश के चुनाव में एक अहम भूमिका निभाएगा। आज अमेरिका जैसे देश में ही लगभग दो तिहाई लोग सोशल मीडिया पर खबरें प्राप्त करते हैं जहां पर सच्चाई और अफवाहों के बीच की रेखा को चिन्हित करना मुश्किल होता है। यह प्रवृत्ति दुनिया में हर जगह बढ़ती जा रही है। वैसे ही देखा जाए तो भारत में भी जहां डाटा रेट दुनिया में सबसे कम है और सस्ते स्मार्टफोन विभिन्न भाषाओं में काम कर सकते हैं, एक सोशल मीडिया संचालित समाज बनता जा रहा है।”

वॉट्सएप और अन्य सूत्रों द्वारा साझा किए गए समाचारों पर लोगों का विश्वास काफी ज्यादा है, लेकिन इन समाचारों की पुष्टि के संसाधन कम हैं। 2016 के अमेरिकी चुनावों के बाद अमेरिकी सीनेट ने लगभग सभी सोशल मीडिया और सूचना-प्रौद्योगिकी कंपनियों के सीईओ को अपनी सफाई पेश करने के लिए बुलाया। इसमें फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग और गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई भी शामिल थे।
अमेरिकी सीनेट की जांच से फेसबुक का शेयर कुछ ही दिनों में बीस प्रतिशत गिर गया, जो फेसबुक के लिए साढ़े आठ लाख करोड़ का नुकसान था। 2017 की सीनेट सुनवाई के बाद टेक्नालॉजी दिग्गजों ने चुनावों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नियंत्रण शुरू किया। अपने यहां हो रहे लोकसभा चुनाव के लिए फेसबुक और ट्विटर, दोनों ने ही राजनीतिक प्रचार के लिए नई नीतियां बनाई हैं। यहां यह कहना भी जरूरी है कि ये नीतियां अभी परीक्षण के दौर में ही हैं और उनके दूरगामी परिणामों का अनुमान लगाना अभी संभव नहीं है। बीते दिनों इन नीतियों का पहला परिणाम देखने को मिला जब फेसबुक ने अपने प्लेटफॉर्म से 700 पेज और खाते बंद कर दिए। इन खातों के जरिये राजनीतिक प्रेरित गलत सूचनाएं फैलाने का आरोप है। फेसबुक ने 2018 में पूरे भारत में 521 करोड़ रुपये की आय विज्ञापनों द्वारा अर्जित की, जिसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजनीतिक प्रेरित विज्ञापन थे। हालांकि यह भी ध्यान रहे कि फेसबुक सटीक राशि का खुलासा नहीं करता। राजनीतिक सूचनाओं के साथ अफवाह फैलाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल पहले से ही होता आ रहा है। यह लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि 700 पेजों पर एक साथ प्रतिबंध लगा जिससे 28 लाख लोग जुड़े हुए थे तो हमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सूचनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की आवश्यकता है। अधिकांश चुटकुले, मीम्स, डेटा, चित्र और यहां तक कि खबरों पर हम आसानी से विश्वास कर लेते हैं और इसी कारण उन्हें आगे फॉरवर्ड कर देते हैं, लेकिन संभव है कि उनके पीछे एक कंपनी द्वारा संचालित एक मार्केटिंग अभियान हो, जिसके आप केवल एक उपभोक्ता भर हों।

“आखिर यह किससे छिपा है कि तमाम ऐसे ट्विटर एकाउंट मौजूद हैं जो नाम से किसी एक व्यक्ति के लगते हैं, लेकिन उनको बढ़ावा देने के लिए उनके पीछे एक पूरी टीम, एक पूरी इंडस्ट्री लगी है। एक मुद्दा फेसबुक की पारदर्शिता का है। दिलचस्प बात यह है कि किसी एकाउंट को राजनीतिक घोषित करने या किसी पोस्ट को राजनीतिक सामग्री बताने का एकाधिकार फेसबुक ने अमेरिका स्थित अपनी टीम को दिया है। इसका अर्थ यह है कि सात समंदर पार स्थित ऑफिस में भारत जनित कंटेंट के राजनीतिक होने या नहीं होने की सच्चाई पर फैसला लिया जा रहा है। इस तरह के फैसले लेने की क्या प्रणाली है और फैसला लेने के खिलाफ अपील करने की क्या पद्धति है, इस पर फेसबुक ने चुप्पी ही साध रखी है।”

आखिर यह क्यों नहीं संभव है कि यह जांच और उसके आधार पर होने वाली कार्रवाई भारतीय पद्धति को समझने वाले लोग करें? सच तो यह है कि फेसबुक और साथ ही सभी बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत में सिर्फ एक ब्रांच ऑफिस चलाते हैं। इन कंपनियों के सभी नीतिगत फैसले अमेरिका में बैठे उनके अधिकारियों द्वारा लिए जाते हैं। ऐसे परिदृश्य में यह जानना आवश्यक है कि फेसबुक पेज के जरिये करोड़ों रुपये राजनीतिक विज्ञापनों में तो नहीं बहाए जा रहे हैं? महज 700 खाते जिनका कुल व्यय चार साल में 80 लाख रुपये था, हटा देने से ये बड़ा सवाल दरकिनार नहीं किया जा सकता।

फेसबुक के साथ अन्य सभी सोशल मीडिया कंपनियों को इस प्रकार की राजनीतिक गलतफहमियों और अफवाहों को फैलाने वाले खातों के ऊपर और पारदर्शी कार्रवाई करने की दरकार है। 700 फेसबुक एकाउंट पर कार्रवाई एक छोटी सी शुरुआत है। यह कार्रवाई हमारी बड़ी चुनौती के ऊपर पर्दा नहीं बननी चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां बहुत बड़ी हो चुकी हैं, लेकिन उनका तंत्र पारदर्शी नहीं है। एप्पल कंपनी की संपत्ति लगभग 75 लाख करोड़ रुपये की है, जबकि फेसबुक जो महज एक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग है, 45 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। यानी फेसबुक की संपत्ति लगभग पाकिस्तान और बांग्लादेश के संयुक्त जीडीपी के बराबर है। फेसबुक ने इतनी संपत्ति बनाने के लिए 36,000 कर्मचारियों का उपयोग किया है जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश को अपनी पूरी 36 करोड़ की आबादी से यह जीडीपी मिलता है। साफ है कि ऐसे में कोई भी सरकार या उसकी एजेंसियां इन कंपनियों के ऊपर अपना नियंत्रण नहीं कर सकतीं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि फेसबुक के उपभोक्ता जिनकी संख्या एक अरब के ऊपर है, फेसबुक से अधिक पारदर्शिता की मांग करें। यह मांग अन्य सोशल मीडिया कंपनियों से भी करनी चाहिए। इसी के साथ यह भी जरूरी है कि आम लोग राजनीतिक अफवाहों से निपटने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से उठाए गए कदमों की पूरी जानकारी हासिल करने के लिए एक साथ आवाज उठाएं और स्व-नियमन की मांग करें। इस मांग का पूरा होना आसान नहीं होगा, मगर यह तय है कि 2019 के आम चुनावों में सोशल मीडिया का उपयोग-दुरुपयोग वैश्विक लोकतांत्रिक संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कड़ी अवश्य बना।
बहुत सारे लोग हैं, जिन्हें ये फेक न्यूज का झूठ बहुत रास आ रहा है. वो शॉर्ट कट पसंद कर रहे हैं. किताबें पढ़ने की आदत घट गई है। न इतिहास जानने में दिलचस्पी होती है, न विज्ञान. जैसा सोचते हैं, वैसा ही पढ़ना पसंद कर रहे हैं. माने, अगर मेरी सोच कट्टर है तो मैं एक खास तरह की चीजें पढूंगी या पढूंगा। अगर मैं किसी खास विचारधारा की विरोधी हूं, तो उसके खिलाफ लिखी चीजें ही पढूंगी. जान-बूझकर फेक न्यूज का शिकार होने वालों की कोई मदद नहीं की जा सकती। मगर, गलती से इसके झांसे में आने वालों को बचाने की कोशिश हो सकती है। अगर आपको भी कहीं कोई फर्जी खबर दिखती है, ऐसी कोई खबर जिसपर आपको शुबहा हो, तो उसका सच सामने लाने की जरूर मजबूत कोशिश करें।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भी मांगा है जवाब –
भारत में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आईटी मंत्रालय से सोशल मीडिया पर आई फर्जी खबरों के खिलाफ उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी है। सूत्र बताते हैं कि आईटी मंत्रालय ने इस मामले में प्रभावी कदम उठाए जाने और लोगों को जागरूक करने का सुझाव प्रसारण मंत्रालय को दिया है। साथ ही कहा है कि फेसबुक को प्लेटफार्म के दुरुपयोग के लिए हाल ही में चेतावनी दी गई है, जबकि ट्विटर के सीईओ ने केंद्रीय मंत्री को प्लेटफार्म के दुरुपयोग की छानबीन का आश्वासन दिया है।
जो लोग मीडिया को समझते हैं, शिक्षित हैं और उन तक पहुंच रही खबरों की विश्वसनीयता का आकलन करते हैं, वे फर्जी खबरों को कम फैलाते हैं. फेक न्यूज को खत्म करना है, तो इसके लिए आपको किसी को तो जिम्मेदार ठहराना होगा, ये कहना है साइबर लॉ विशेषज्ञ पवन दुग्गल का। वो बताते हैं, भारतीय कानून फेक न्यूज शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। वो न इसे परिभाषित करता है, न ही इसकी पहचान के लिए कोई प्रावधान है।
सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी पोस्ट करना इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) एक्ट के तहत अपराध है. अगर आप फेसबुक पोस्ट में फर्जी जानकारी देते हैं या अपनी पहचान गलत दिखाते हैं, तो ये धोखाधड़ी का भी मामला बनता है।

पवन दुग्गल के अनुसार, सोशल मीडिया पर झूठी खबरों को रोकने के कारगर तरीके मौजूद नहीं हैं। सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट के तीन पक्ष होते हैं- एक पोस्ट करने वाला, दूसरा सर्विस प्रोवाइडर और तीसरा पोस्ट को लाइक या शेयर करने वाले। फर्जी खबरें और नफरत भरे कंटेंट पूरी दुनिया के लिए, और खास तौर पर भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा हैं जिनसे लड़ने के लिए मीडिया और पाठकों को एकजुट होना चाहिए। लोकतंत्र को बचाये रखने और मजबूत रखने के लिए किसी भी अपवाह और फर्जी समाचार से दूर रखने के लिए जरूरी है।

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मोहन भागवत के आरक्षण मुद्दे पर किये ट्वीट से मचा बवाल ! जाने आरक्षण आखिर चीज क्या है ?

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मोहन भगवत ने ट्विटर पर जारी बयान में कहा कि समाज में सदभावना पूर्वक परस्पर बातचीत के आधार पर सब प्रश्नों के समाधान का महत्व बताते हुए आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर विचार व्यक्त करने का आह्वान किया 

 

आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के बयान के बाद विपक्ष दल तिलमिलाए हुए हैं. कांग्रेस ने आरएसएस और बीजेपी पर दलित-पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाया.

आरक्षण क्या है ?इस पर भी आइये एक नजर डालते हैं ?

जाति व्यवस्था नामक सामाजिक वर्गीकरण के एक रूप के सदियों से चले आ रहे अभ्यास के परिणामस्वरूप भारत अनेक अंतर्विवाही समूहों, या जातियों और उपजातियों में विभाजित है। आरक्षण नीति के समर्थकों का कहना है कि परंपरागत रूप से चली आ रही जाति व्यवस्था में निचली जातियों के लिए घोर उत्पीड़न और अलगाव है और शिक्षा समेत उनकी विभिन्न तरह की आजादी सीमित है। “मनु स्मृति” जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जाति एक “वर्णाश्रम धर्म” है, जिसका अर्थ हुआ “वर्ग या उपजीविका के अनुसार पदों का दिया जाना”. वर्णाश्रम (वर्ण + आश्रम) के “वर्ण” शब्द के समानार्थक शब्द ‘रंग’ से भ्रमित नहीं होना चाहिए। भारत में जाति प्रथा ने इस नियम का पालन किया।

1882 – हंटर आयोग की नियुक्ति हुई। महात्मा ज्योतिराव फुले ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग की।

1891- त्रावणकोर के सामंती रियासत में 1891 के आरंभ में सार्वजनिक सेवा में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी करके विदेशियों को भर्ती करने के खिलाफ प्रदर्शन के साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए मांग की गयी।

1901- महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण शुरू किया गया। सामंती बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में आरक्षण पहले से लागू थे।

1908- अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था, के लिए आरक्षण शुरू किया गया।

1909 – भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1919- मोंटागु-चेम्सफोर्ड सुधारों को शुरु किया गया।

1919 – भारत सरकार अधिनियम 1919 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1921 – मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।

1935 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया, जो पूना समझौता कहलाता है, जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए।

1935- भारत सरकार अधिनियम 1935 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1942 – बी आर अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की। उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की।

1946 – 1946 भारत में कैबिनेट मिशन अन्य कई सिफारिशों के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव दिया।

1947 में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की। डॉ॰ अम्बेडकर को संविधान भारतीय के लिए मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। भारतीय संविधान ने केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएं रखी गयी हैं।10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए हैं। (हर दस साल के बाद सांविधानिक संशोधन के जरिए इन्हें बढ़ा दिया जाता है).

1947-1950 – संविधान सभा में बहस.

26/01/1950- भारत का संविधान लागू हुआ।

1953 – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग को स्थापित किया गया। जहां तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का संबंध है रिपोर्ट को स्वीकार किया गया। अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी (OBC)) वर्ग के लिए की गयी सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया गया।

1956- काका कालेलकर की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचियों में संशोधन किया गया।

1976- अनुसूचियों में संशोधन किया गया।

1979 – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित किया गया।आयोग के पास उपजाति, जो अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी (OBC)) कहलाती है, का कोई सटीक आंकड़ा था और ओबीसी की 52% आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1930 की जनगणना के आंकड़े का इस्तेमाल करते हुएपिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया।

1980 – आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए 22% से 49.5% वृद्धि करने की सिफारिश की 2006 के अनुसार  पिछड़ी जातियों की सूची में जातियों की संख्या 2297 तक पहुंच गयी, जो मंडल आयोग द्वारा तैयार समुदाय सूची में 60% की वृद्धि है।

1990 मंडल आयोग की सिफारिशें विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया। छात्र संगठनों ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह की कोशिश की। कई छात्रों ने इसका अनुसरण किया।

1991- नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10% आरक्षण शुरू किया।

1992- इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को सही ठहराया. आरक्षण और न्यायपालिका अनुभाग भी देखें

1995- संसद ने 77वें सांविधानिक संशोधन द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरक्की के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए अनुच्छेद 16(4)(ए) डाला। बाद में आगे भी 85वें संशोधन द्वारा इसमें अनुवर्ती वरिष्ठता को शामिल किया गया था।

1998- केंद्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समुदायों की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण का आंकड़ा 32% है . जनगणना के आंकड़ों के साथ समझौ्तावादी पक्षपातपूर्ण राजनीति के कारण अन्य पिछड़े वर्ग की सटीक संख्या को लेकर भारत में काफी बहस चलती रहती है। आमतौर पर इसे आकार में बड़े होने का अनुमान लगाया गया है, लेकिन यह या तो मंडल आयोग द्वारा या और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा दिए गए आंकड़े से कम है।. मंडल आयोग ने आंकड़े में जोड़-तोड़ करने की आलोचना की है। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने संकेत दिया कि बहुत सारे क्षेत्रों में ओबीसी (OBC) की स्थिति की तुलना अगड़ी जाति से की जा सकती है।

12 अगस्त 2005- उच्चतम न्यायालय ने पी. ए. इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में 12 अगस्त 2005 को 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए घोषित किया कि राज्य पेशेवर कॉलेजों समेत सहायता प्राप्त कॉलेजों में अपनी आरक्षण नीति को अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक पर नहीं थोप सकता हैं।

2005- निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया। इसने अगस्त 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को प्रभावी रूप से उलट दिया।

2006- सर्वोच्च न्यायालय के सांविधानिक पीठ में एम. नागराज और अन्य बनाम यूनियन बैंक और अन्य के मामले में सांविधानिक वैधता की धारा 16(4) (ए), 16(4) (बी) और धारा 335 के प्रावधान को सही ठहराया गया।

2006- से केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण शुरू हुआ। कुल आरक्षण 49.5% तक चला गया। हाल के विकास भी देखें.

2007- केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी (OBC) आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगन दे दिया।

2008-भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल 2008 को सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27% ओबीसी (OBC) कोटा शुरू करने के लिए सरकारी कदम को सही ठहराया. न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपनी पूर्व स्थिति को दोहराते हुए कहा कि “मलाईदार परत” को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। क्या आरक्षण के निजी संस्थानों आरक्षण की गुंजाइश बनायी जा सकती है, सर्वोच्च न्यायालय इस सवाल का जवाब देने में यह कहते हुए कतरा गया कि निजी संस्थानों में आरक्षण कानून बनने पर ही इस मुद्दे पर निर्णय तभी लिया जा सकता है। समर्थन करने वालों की ओर से इस निर्णय पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आयीं और तीन-चौथाई ने इसका विरोध किया।

मलाईदार परत को पहचानने के लिए विभिन्न मानदंडों की सिफारिश की गयी, जो इस प्रकार हैं:

साल में 250,000 रुपये से ऊपर की आय वाले परिवार को मलाईदार परत में शामिल किया जाना चाहिए और उसे आरक्षण कोटे से बाहर रखा गया। इसके अलावा, डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, अभिनेता, सलाहकारों, मीडिया पेशेवरों, लेखकों, नौकरशाहों, कर्नल और समकक्ष रैंक या उससे ऊंचे पदों पर आसीन रक्षा विभाग के अधिकारियों, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों, सभी केंद्र और राज्य सरकारों के ए और बी वर्ग के अधिकारियों के बच्चों को भी इससे बाहर रखा गया। अदालत ने सांसदों और विधायकों के बच्चों को भी कोटे से बाहर रखने का अनुरोध किया है।

भारतीय न्यायपालिका ने आरक्षण को जारी रखने के लिए कुछ निर्णय दिए हैं और इसे सही ढंग से लागू करने के लिए के कुछ निर्णय सुनाया है। आरक्षण संबंधी अदालत के अनेक निर्णयों को बाद में भारतीय संसद द्वारा संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से बदलाव लाया गया है। भारतीय न्यायपालिका के कुछ फैसलों का राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा उल्लंघन भी किया गया है।शैक्षिक संस्थानों और नौकरियों में सीटें विभिन्न मापदंड के आधार पर आरक्षित होती हैं। विशिष्ट समूह के सदस्यों के लिए सभी संभावित पदों को एक अनुपात में रखते हुए कोटा पद्धति को स्थापित किया जाता है। जो निर्दिष्ट समुदाय के तहत नहीं आते हैं, वे केवल शेष पदों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जबकि निर्दिष्ट समुदाय के सदस्य सभी संबंधित पदों (आरक्षित और सार्वजनिक) के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

आरक्षण के प्रकार :

  • जातिगत आधार
  • प्रबंधन कोटा
  • लिंग आधारित
  • धर्म आधारित
  • अधिवासियों के राज्य
  • पूर्वस्नातक महाविद्यालय
  • स्वतंत्रता सेनानियों के बेटे/बेटियों/पोते/पोतियों के लिए।
  • शारीरिक रूप से विकलांग.
  • खेल हस्तियों.
  • शैक्षिक संस्थानों में अनिवासी भारतीयों (एनआरआई (NRI)) के लिए छोटे पैमाने पर सीटें आरक्षित होती हैं। उन्हें अधिक शुल्क और विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है (नोट: 2003 में एनआरआई आरक्षण आईआईटी से हटा लिया गया था).
  • विभिन्न संगठनों द्वारा उम्मीदवार प्रायोजित होते हैं।
  • जो सशस्त्र बलों में काम कर चुके हैं (सेवानिवृत सैनिक कोटा), उनके लिए।
  • कार्रवाई में मारे गए सशस्त्र बलों के कर्मियों के आश्रितों के लिए।
  • स्वदेश लौट आनेवालों के लिए।
  • जो अंतर-जातीय विवाह से पैदा हुए हैं।
  • सरकारी उपक्रमों/सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के विशेष स्कूलों (जैसे सेना स्कूलों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के स्कूलों आदि) में उनके कर्मचारियों के बच्चों के लिए आरक्षण.
  • पूजा स्थलों (जैसे तिरूपति (बालाजी) मंदिर, तिरुथानी मुरुगन (बालाजी) मंदिर) में भुगतान मार्ग आरक्षण है।
  • वरिष्ठ नागरिकों/पीएच (PH) के लिए सार्व‍जनिक बस परिवहन में सीट आरक्षण.

आरक्षण के समर्थन में तर्क :

  • आरक्षण भारत में एक राजनीतिक आवश्यकता है क्योंकि मतदान की विशाल जनसंख्या का प्रभावशाली वर्ग आरक्षण को स्वयं के लिए लाभप्रद के रूप में देखता है। सभी सरकारें आरक्षण को बनाए रखने और/या बढाने का समर्थन करती हैं। आरक्षण कानूनी और बाध्यकारी हैं। गुर्जर आंदोलनों (राजस्थान, 2007-2008) ने दिखाया कि भारत में शांति स्थापना के लिए आरक्षण का बढ़ता जाना आवश्यक है।
  • हालांकि आरक्षण योजनाएं शिक्षा की गुणवत्ता को कम करती हैं लेकिन फिर भी अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, ब्राजील आदि अनेक देशों में सकारात्मक कार्रवाई योजनाएं काम कर रही हैं। हार्वर्ड विश्वविद्याल में हुए शोध के अनुसार सकारात्मक कार्रवाई योजनाएं सुविधाहीन लोगों के लिए लाभप्रद साबित हुई हैं। अध्ययनों के अनुसार गोरों की तुलना में कम परीक्षण अंक और ग्रेड लेकर विशिष्ट संस्थानों में प्रवेश करने वाले कालों ने स्नातक के बाद उल्लेखनीय सफलता हासिल की। अपने गोरे सहपाठियों की तुलना में उन्होंने समान श्रेणी में उन्नत डिग्री अर्जित की हैं। यहां तक कि वे एक ही संस्थाओं से कानून, व्यापार और औषधि में व्यावसायिक डिग्री प्राप्त करने में गोरों की तुलना में जरा अधिक होनहार रहे हैं। वे नागरिक और सामुदायिक गतिविधियों में अपने गोरे सहपाठियों से अधिक सक्रिय हुए हैं।
  • हालांकि आरक्षण योजनाओं से शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है लेकिन विकास करने में और विश्व के प्रमुख उद्योगों में शीर्ष पदों आसीन होने में, अगर सबको नहीं भी तो कमजोर और/या कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के अनेक लोगों को सकारात्मक कार्रवाई से मदद मिली है। (तमिलनाडु पर अनुभाग देखें) शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण एकमात्र समाधान नहीं है, यह सिर्फ कई समाधानों में से एक है। आरक्षण कम प्रतिनिधित्व जाति समूहों का अब तक का प्रतिनिधित्व बढ़ाने वाला एक साधन है और इस तरह परिसर में विविधता में वृद्धि करता है।
  • हालांकि आरक्षण योजनाएं शिक्षा की गुणवत्ता को कमजोर करती हैं, लेकिन फिर भी हाशिये में पड़े और वंचितों को सामाजिक न्याय प्रदान करने के हमारे कर्तव्य और उनके मानवीय अधिकार के लिए उनकी आवश्यकता है। आरक्षण वास्तव में हाशिये पर पड़े लोगों को सफल जीवन जीने में मदद करेगा, इस तरह भारत में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी व्यापक स्तर पर जाति-आधारित भेदभाव को ख़त्म करेगा। (लगभग 60% भारतीय आबादी गांवों में रहती है)
  • आरक्षण-विरोधियों ने प्रतिभा पलायन और आरक्षण के बीच भारी घाल-मेल कर दिया है। प्रतिभा पलायन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार बड़ी तेजी से अधिक अमीर बनने की “इच्छा” है। अगर हम मान भी लें कि आरक्षण उस कारण का एक अंश हो सकता है, तो लोगों को यह समझना चाहिए कि पलायन एक ऐसी अवधारणा है, जो राष्ट्रवाद के बिना अर्थहीन है और जो अपने आपमें मानव जाति से अलगाववाद है। अगर लोग आरक्षण के बारे में शिकायत करते हुए देश छोड़ देते हैं, तो उनमें पर्याप्त राष्ट्रवाद नहीं है और उन पर प्रतिभा पलायन लागू नहीं होता है।
  • आरक्षण-विरोधियों के बीच प्रतिभावादिता (meritrocracy) और योग्यता की चिंता है। लेकिन प्रतिभावादिता समानता के बिना अर्थहीन है। पहले सभी लोगों को समान स्तर पर लाया जाना चाहिए, योग्यता की परवाह किए बिना, चाहे एक हिस्से को ऊपर उठाया जाय या अन्य हिस्से को पदावनत किया जाय. उसके बाद, हम योग्यता के बारे में बात कर सकते हैं। आरक्षण या “प्रतिभावादिता” की कमी से अगड़ों को कभी भी पीछे जाते नहीं पाया गया। आरक्षण ने केवल “अगड़ों के और अधिक अमीर बनने और पिछड़ों के और अधिक गरीब होते जाने” की प्रक्रिया को धीमा किया है। चीन में, लोग जन्म से ही बराबर होते हैं। जापान में, हर कोई बहुत अधित योग्य है, तो एक योग्य व्यक्ति अपने काम को तेजी से निपटाता है और श्रमिक काम के लिए आता है जिसके लिए उन्हें अधिक भुगतान किया जाता है। इसलिए अगड़ों को कम से कम इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि वे जीवन भर सफेदपोश नागरिक हुआ करते हैं।

आरक्षण के विरोध  में तर्क  :

  • जाति आधारित आरक्षण संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक विचार के एक कारक के रूप में समाज में जाति की भावना को कमजोर करने के बजाय उसे बनाये रखता है। आरक्षण संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति का एक साधन है।
  • कोटा आवंटन भेदभाव का एक रूप है, जो कि समानता के अधिकार के विपरीत है।
  • आरक्षण ने चुनावों को जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ बदला लेने के गर्त में डाल दिया है और इसने भारतीय समाज को विखंडित कर रखा है। चुनाव जीतने में अपने लिए लाभप्रद देखते हुए समूहों को आरक्षण देना और दंगे की धमकी देना भ्रष्टाचार है और यह राजनीतिक संकल्प की कमी है। यह आरक्षण के पक्ष में कोई तर्क नहीं है।
  • आरक्षण की नीति एक व्यापक सामाजिक या राजनीतिक परीक्षण का विषय कभी नहीं रही। अन्य समूहों को आरक्षण देने से पहले, पूरी नीति की ठीक से जांच करने की जरूरत है और लगभग 60 वर्षों में इसके लाभ का अनुमान लगाया जाना जरूरी है।
  • शहरी संस्थानों में आरक्षण नहीं, बल्कि भारत का 60% जो कि ग्रामीण है उसे स्कूलों, स्वास्थ्य सेवा और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है।
  • “अगड़ी जातियों” के गरीब लोगों को पिछड़ी जाति के अमीर लोगों से अधिक कोई भी सामाजिक या आर्थिक सुविधा प्राप्त नहीं है। वास्तव में परंपरागत रूप से ब्राह्मण गरीब हुआ करते हैं।
  • आरक्षण के विचार का समर्थन करते समय अनेक लोग मंडल आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हैं। आयोग मंडल के अनुसार, भारतीयों की 52% आबादी ओबीसी श्रेणी की है, जबकि राष्ट्रीय सर्वेक्षण नमूना 1999-2000 के अनुसार, यह आंकड़ा सिर्फ 36% है (मुस्लिम ओबीसी को हटाकर 32%).
  • सरकार की इस नीति के कारण पहले से ही प्रतिभा पलायन में वृद्धि हुई है और आगे यह और अधिक बढ़ सकती है। पूर्व स्नातक और स्नातक उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयों का रुख करेंगे।
  • अमेरिकी शोध पर आधारित आरक्षण-समर्थक तर्क प्रासंगिक नहीं हैं क्योंकि अमेरिकी सकारात्मक कार्रवाई में कोटा या आरक्षण शामिल नहीं है। सुनिश्चित कोटा या आरक्षण संयुक्त राज्य अमेरिका में अवैध हैं। वास्तव में, यहां तक कि कुछ उम्मीदवारों का पक्ष लेने वाली अंक प्रणाली को भी असंवैधानिक करार दिया गया था।इसके अलावा, सकारात्मक कार्रवाई कैलिफोर्निया, वाशिंगटन, मिशिगन, नेब्रास्का और कनेक्टिकट में अनिवार्य रूप से प्रतिबंधित है. “सकारात्मक कार्रवाई” शब्दों का उपयोग भारतीय व्यवस्था को छिपाने के लिए किया जाता है जबकि दोनों व्यवस्थाओं के बीच बड़ा फर्क है।
  • आधुनिक भारतीय शहरों में व्यापारों के सबसे अधिक अवसर उन लोगों के पास हैं जो ऊंची जातियों के नहीं हैं। किसी शहर में उच्च जाति का होने का कोई फायदा नहीं है।
  • आरक्षण वैसे खत्म नहीं होना चाहिए सिर्फ आर्थिक स्थिति देखकर आरक्षण देना चाहिए जाति के आधार पर नहीं

समस्या का समाधान खोजने के लिए नीति में परिवर्तन के सुझाव निम्नलिखित हैं।

सच्चर समिति के सुझाव

  • सच्चर समिति जिसने भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन का अध्ययन किया है, ने असली पिछड़े और जरूरतमंद लोगों की पहचान के लिए निम्नलिखित योजना की सिफारिश की है।
योग्यता के आधार पर अंक: 60
घरेलू आय पर आधारित (जाति पर ध्यान दिए बिना) अंक : 13
जिला (ग्रामीण/शहरी और क्षेत्र) जहां व्यक्ति ने अध्ययन किया, पर आधारित अंक : 13
पारिवारिक व्यवसाय और जाति के आधार पर अंक : 14
कुल अंक : 100

सच्चर समिति ने बताया कि शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग हिंदुओं की उपस्थिति उनकी आबादी के लगभग बराबर/आसपास है। भारतीय मानव संसाधन मंत्री ने भारतीय मुसलमानों पर सच्चर समिति की सिफारिशों के अध्ययन के लिए तुरंत एक समिति नियुक्त कर दी, लेकिन किसी भी अन्य सुझाव पर टिप्पणी नहीं की। इस नुस्खे में जो विसंगति पायी गयी है वो यह कि प्रथम श्रेणी के प्रवेश/नियुक्ति से इंकार की स्थिति भी पैदा हो सकती है, जो कि स्पष्ट रूप से स्वाभाविक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

अन्य सुझाव

समस्या का समाधान खोजने के लिए नीति में परिवर्तन के सुझाव भी  हैं।

सच्चर समिति ने बताया कि शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग हिंदुओं की उपस्थिति उनकी आबादी के लगभग बराबर/आसपास है। भारतीय मानव संसाधन मंत्री ने भारतीय मुसलमानों पर सच्चर समिति की सिफारिशों के अध्ययन के लिए तुरंत एक समिति नियुक्त कर दी, लेकिन किसी भी अन्य सुझाव पर टिप्पणी नहीं की। इस नुस्खे में जो विसंगति पायी गयी है वो यह कि प्रथम श्रेणी के प्रवेश/नियुक्ति से इंकार की स्थिति भी पैदा हो सकती है, जो कि स्पष्ट रूप से स्वाभाविक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
कुल मिलाकर आरक्षण इस देश का ऐसा राजनैतिक मुद्दा है जिस पर सैकड़ों सालों से बवाल होता आया है ,यह भी सच है कि पूरी दुनिया में भारत के तरह आरक्षण की व्यवस्था नहीं है,दूसरा सच यह भी है कि इस लाभार्थी इसे बनाये रखना चाहेंगे और विरोधी इसे देश में वर्ग भेद पैदा करने वाले मानते हैं,,,,अब सरकार इस मुद्दे से कैसा निपटती है ये देखना महत्वपूर्ण होगा ,,,,,,

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है,,,,,जिगर मुरादाबादी

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Etoi Exclusive

राजीव की काँग्रेस आखिर हांफ क्यों रही है ?

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गाँधी,नेहरू,शास्त्री, इंदिरा ,राजीव,नरसिंहा राव जैसे दिग्गजों की बिरसा पार्टी  हांफ क्यों रही है ?

जवाब इस प्रश्न में ही छिपा है ? अपने पुरखों की विरासत को भुला देने के कारण ,,,,आज जिस डिजिटल तकनीक के दम पर हिन्दुस्तान सारी दुनिया के सामने गर्व से सीना ताने खड़ा है इसकी बुनियाद रखीं राजीव गाँधी ने ,,,,,मोदी मोदी के नारे लगती हुई युवा शक्ति को वोट का अधिकार दिया राजीव गाँधी ने ,,,मनमोहन सिंह को जिस लिबरलाइजेशन का फाउंडर माना जाता था उसकी बुनियाद रखी राजीव गाँधी ने,,,,जिस देश के चुनाव को नई दिशा देने वाले  टी एन शेषन को काम की आजादी दी राजीव ने ,,,,,जिन पंचायतों और नगर पालिकाओं की राजनैतिक उपेक्षा हुआ करती थी उसको सम्मान दिलाया राजीव ने ,,,,33 प्रतिशत महिलाओं को हर जगह आरक्षण की पैरवी करने वाले थे राजीव ,,,,,चीन ,रूस और अमेरिका तीनो शक्तियों के साथ भारत को बराबरी का सम्मान दिलाने वाले थे राजीव ,,,जिस नए भारत के निर्माण की बात मोदी जी किया करते हैं उसकी बुनियाद रखने वाले थे राजीव ,,,,,,,1982 में में एशियाई खेलो की मेजबानी का दायित्व सम्मान पूर्वक निर्वहन करने वाले थे राजीव ,,,,पुरे सम्मान के साथ राजनीति में देश का हित सर्वोपरि रखकर स्पष्ट विदेश नीति का अनुगमन करने वाले थे राजीव ,,असल में राजीव ही नए भारत के स्वप्न दृष्टा थे ,,,,,एकलौते  बोफोर्स में उन्हें उलझा कर लगातार विपक्ष ने परेशान किया तो कांग्रेस के अंदर भी उनकी नीतियों को बहुत याद किया हो ऐसा नहीं है,,,,यदि आज जिस जगह पर कांग्रेस खड़ी है राजीव और इंदिरा जी के राजनैतिक दर्शन पर चलती  तो निश्चित ही उसे सॉफ्ट हिंदुत्व या कटटर हिंदुत्व का भरम नहीं होता ,,,,कश्मीर या तीन तलाक या फिर राम मंदिर पर कोई उलझाव नहीं होता ,,,,राहुल गाँधी या पूरी कांग्रेस को अपने पुरखों की विरासत ,राजनैतिक दृढ़ता और देश हित और स्पष्ट नीति को हमेशा याद रखना चाहिए ,,,,,उन्हें याद रखना चाहिए उस इंदिरा को जिसनें बड़ी ताकत से पाकिस्तान की नाक पकड़ क़र जमीं पर रगड़ दिया था,,,उन्हें  याद रखना चाहिए राजीव जी को कि उन्होंने अपने जान की परवाह किये बिना श्रीलंका में शांति सेना भेजी थी अमेरिका को पेट्रोल देने इंकार किया था ,बड़ी ताकत से खड़े थे वोअपने मित्र राष्ट्र रूस के साथ ,याद करना चाहिए इंदिरा गाँधी को जिसने बड़ी दिलेरी से पंजाब में आतंकवाद से लोहा लिया और बदले में उन्हें अपनी जान भी गवानी पड़ी ,शहीदों के बिरसे को खौफ किसका होना चाहिए ? हाँ प्रवाह में मोड़ आते हैं पर प्रवाह अपना गंतव्य नहीं छोड़ता !!और छोड़ना भी नहीं चाहिए ,,,,आज बड़े ह्रदय से देश की सरकार और उस वक्त के विपक्ष को राजीव का स्मरण करना चाहिए जिसकी बिनाह पर सबका साथ सबका विकास का नारा संभव नहीं था ,,,,हमें उस महान नेत्री का भी स्मरण रखना चाहिए जिसने शिमला समझौते के रूप में सालों पहले भारत को कश्मीर का समाधान दिया था ,,,,हमे हमेशा अपने पुरखों पर गर्व होना चाहिए ,,,,क्योकि जिस आज पर हम गर्व क़र रहे हैं उसकी बुनियाद में वो बीता हुआ क़ल था जिसे हमारे पुरखों की शहादत ने संभाला था ,,,,गलतियां हर निजाम से होती हैं और उनकी अच्छी नीतियों से लाभ भी होता है ,,,,याद रखें जो आज मुंसिफ हैं वो कल नहीं रहेंगे,,, उस वक्त फिर ये बात उठेगी कि उस वक्त के निजाम ने गलतियां न की होती तो क्या होता ? बस यही बात हर नस्ल के साथ होनी है ,,,मगर आज बड़ा दिन है उस महान शिल्पकार की महानता के लिए दो शब्द लिखने का ,,,,,और शायद हर महान शिल्पकार के लिए ये बात लागू होगी ,,,,कि हमें अपने पुरखों की नसीहतों को याद रखना चाहिए ,,,,,,,,हमें अपने पुरखों की विरासत पर गर्व होना चाहिए ,,,,,,आज सारा देश राजीव जी को याद क़र रहा है ,,

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,,,,
 
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में,,,, दीदा-वर पैदा,,,,,,

वंदे मातरम ,,,,,,

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Etoi Exclusive

क्या प्रदेश के मुखिया के सोच के अनुरूप नरवा,गरवा,घुरुआ,बारी पर अमल हो रहा है ?

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नरवा,गरवा,घुरुआ,बारी, पर सरकारी अमला ठीक चल रहा है ? या फिर  छत्तीसगढ़ की  इस ब्रांड और ग्रैंड योजना के अमल में कोई कोताही हो रही है ? क्या प्रदेश के मुखिया के सोच के अनुरूप इस पर अमल हो रहा है ? आइये सबसे पहले देखें कि इस योजना की  मूल धारणा क्या है ?

“छत्तीसगढ़ी भाषा में नरवा का अर्थ है प्राकृतिक नाले, गरवा का अर्थ हैं पशुधन, घुरवा का अर्थ है अपशिष्ट पदार्थो का भण्डार और बाड़ी का अर्थ है छोटी बागवानी। उन्होंने कहा कि इस योजना के अंतर्गत हम भू-जल संरक्षण एवं संवर्धन के लिए नाले में बहते पानी को रोकेंगे, गाय तथा गौवंशीय पशुधन को बचायेंगे तथा इनका किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उपयोग सुनिश्चित करेंगे। इसके साथ ही गोबर तथा अन्य जैविक ग्रामीण अपशिष्ट पदार्थो से कम्पोस्ट खाद का निर्माण एवं बाड़ी अर्थात हर किसान तथा ग्रामीण के यहां छोटे बगीचों का विकास करेंगे”

असल में यह योजना कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने, स्थानीय संसाधनों को विकसित करने और व्यापक तौर पर पर्यावरण संरक्षण को को ध्यान में रखकर यह कार्यक्रम प्रारंभ किया गया हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संतुलन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, गिरता भू-जल स्तर, पशुधन संवर्धन, जैविक खेती जैसे विषय आज वैश्विक चिंता के कारक बन गए है। छत्तीसगढ़ में विभिन्न समस्याओं के एक समाधान के रूप में नवाचार किया हैं।

ध्यान देने योग्य बात है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है भारत मुख्य रूप से एक कृषि देश है। अधिकांश भारतीय परिवारों के लिए कृषि सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय है। भारत में कुल सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 16% कृषि और कुल निर्यात का 10% का योगदान है। और आज तक सरकारों ने कृषि को लाभ का व्यापार बनाने के लिए थोड़ा कच्चा पक्का काम किया है मगर अब ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है क्योकि इस वक्त में देश में जबरदस्त में बेरोजगारी है,जिस तरह  से जनसंख्या बढ़ रही है आने वाले दिनों में सभी लोगो को पीने का साफ़ पानी खाना और ऑक्सीजन देना भी सरकार को आसान नहीं होगा ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार की ये योजना बड़ी महत्व पूर्ण हो जाती है असल में ये योजना कृषि अपशिष्ट को रीसायकल करके कृषि उत्पादन लागत को कम करने और कृषि को लाभ का व्यापार बनाने में बहुत ज्यादा सफल हो सकती है,,, कृषि अपशिष्ट,उत्पादन के अतिरिक्त हैं जिनका अब तक प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं किया गया है। इस योजना में क्या होना चाहिए ? जो इस वक्त नहीं दिखाई पड़ता ?

  • इस योजना में सरकार गौठान के आगे बढ़ती नहीं नजर आ रही है
  • अब सरकार ने एक भी लाभ का मॉडल तैयार नहीं किया है मतलब सरकार को कम से कम एक आदर्श मॉडल तत्काल तैयार क़र लेना चाहिए
  • अब तक सरकार इस योजना में किसानों के साथ सहभागिता तैयार नहीं क़र पायी है मतलब कि सारे किसान अपने पशुधन गौठान में रखें और इनका गोबर तत्काल बॉयोगैस में कन्वर्ट हो ,,,वो बॉयोगैस किसानों की खुद की जरुरी बिजली और ईंधन की जरूरत को पूरा करें और फिर इसका अपशिष्ट बायो फर्टिलाइजर में कन्वर्ट हो इसके लिए कोई प्लांट बने और फिर प्लांट  से बॉयो फर्टिलाइजर और बायो पेस्टीसाइड पैक होकर बाजार में आवे,,,किसान इससे अपनी निजी कृषि जरूरतों और बाजार की खाद और पेस्टी साइड्स की जरूरतों को पूरा करे तभी यह योजना सफल हो पायेगी मगर सरकारी अमला जिस तरह से गौठानों की शुरुआत कराकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान रहें हैं उससे लगता है कि यह योजना भी सरकारी ढर्रे का शिकार होकर केवल सफेद हाथी बनकर रह जायेगा,,,,,,

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