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लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा फेक न्यूज – सोशल मीडिया पर हो सर्तक निगाहें

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नहीं, 2000 रुपये के नए नोटों में कोई जीपीएस चिप नहीं लगी है।

नहीं, यूनेस्को ने हमारे राष्ट्रगान को दुनिया का सबसे अच्छा राष्ट्रगान घोषित नहीं किया है।

यूनेस्को एक संस्था के रूप में ऐसा करती भी नहीं है!

नहीं, भारत में 2016 में नमक की कोई किल्लत भी नहीं थी।
अगर आपको ऐसा लगता है कि इन बेतुकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता,

तो आपको बता दें कि जब अंतिम अफवाह फैली थी तो इस अफरा-तफरी में कानपुर में एक महिला की मौत हो गई थी।

ये सभी झूठी खबरें (फेक न्यूज) थीं जो फेसबुक, ट्विटर और व्हॉट्सऐप पर वायरल हुए, ऐसी अफवाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी है।

बीते कुछ साल में फेक न्यूज इतनी बड़ी मुसीबत बनकर उभरी है कि इनकी वजह से लोगों की हत्याएं, हिंसा, दंगे और आगजनी हो चुकी है। फेक न्यूज के कारण भीड़ की हिंसा और लिंचिंग के मामलों में लोगों की मौत हुई है। इसी प्रकार के कई न्यूज हैं जो कि हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं और अच्छे पढ़े लिखे लोग भी इन फर्जी समाचार से भम्रित हो रहे हैं या कहना चाहिए कि पढ़े लिखे लोग ही ज्यादा भरोसा करते देखे गए हैं। फेक न्यूज के फैलने में व्हाट्स ऐप को जिम्मेदार माना जाता है जिसके सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की जुलाई 2018 में जारी रिपोर्ट के अनुसार प्राइवेट टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स का कुल मोबाइल सब्सक्राइबर्स बेस 100.408 करोड़ हो गया है। इसके अलावा फेसबुक, ट्वीटर, लिंकडिन जैसी साईटस भी हैं, पर सबसे ज्यादा व्हाट्सअप और फेसबुक इसका जरिया है।
“अपनी इमेज चमकाने के लिए, कभी अपने विरोधी की इमेज खराब करने के लिए, कभी नफरत फैलाने के लिए तो कभी भ्रम पैदा करने के लिए ऐसे मैसेज फैलाए जाते हैं।”
इन मैसेजों के झांसे में आने वाले न सिर्फ बेवकूफ बनते हैं बल्कि अनजाने में शातिर लोगों के हाथों इस्तेमाल भी होते हैं, कई बार लोग किसी खास सोच से प्रभावित होकर जानते हुए भी झूठ फैलाते हैं। फर्जी खबरें थोक इस समय बेतहाशा आने लगी हैं। इन खबरों में एक खास अजेंडा होता है, कुछ खास तरह के लोगों को लपेटे में लेने के लिए इन्हें गढ़ा जाता है। कुछ खास तरह के लोगों का यकीन हासिल करने की कोशिश होती है। कुछ खास तरह के लोगों को निशाना बनाया जाता है। ये सिलसिला और आगे बढ़ निकला है। अब फेक न्यूज एक विशाल बरगद बन गया है, विराट, बहुत दूर तक फैल गया है।

“सोशल मीडिया पर सही खबरों से ज्यादा फर्जी खबरें तैर रही हैं। खबर झूठी, घटना झूठी, तस्वीरें झूठी, जगहों के नाम झूठे, लोगों के नाम झूठे, उत्तरी अफ्रीका की खबर छत्तीसगढ़ की बनाकर शेयर हो जाती है। इराक में कुछ होता है, लोग मुजफ्फरनगर का कहकर चला देते हैं। पाकिस्तान का वीडियो जयपुर का बना दिया जाता है। कश्मीर की घटना उत्तराखंड की बताकर फैला दी जाती है।”

‘फेक न्यूज’ सिर के ऊपर का नीला आसमान हो गया है, अनंत. हर जगह मौजूद है। इसीलिए कॉलिन्स डिक्शनरी ने ‘फेक न्यूज’ को साल 2017 का सबसे बड़ा शब्द चुना था। भारत में ज्यादातर लोगों के लिए इंटरनेट का जरिया उनका मोबाइल फोन ही है और बहुत से लोगों को खबरें चैट ऐप्स से मिलती हैं और वहीं से वे उसे शेयर करते हैं। ये लोगों से जुड़ने का एक अच्छा तरीका है लेकिन ये एक ऐसी जगह है जहां गलत या फर्जी खबरें बिना किसी रोक-टोक के जल्दी फैलती हैं। लोगों के पास जानकारी और खबरों की बाढ़ आ जाती है और वे सच और झूठ में अंतर नहीं कर पाते। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ विजय मुखी कहते हैं, लोग झूठी या परेशान करने वाली जानकारी पोस्ट करते रहते हैं। उन्हें पता है कि उनके खिलाफ कोई कंपनी या संस्था कार्रवाई नहीं करेगी। आज अगर आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ फेसबुक पर कुछ लिखेंगे, तो आप गिरफ्तार हो सकते हैं, लेकिन अगर आप राहुल गांधी के खिलाफ कुछ लिखें, तो शायद कुछ न हो।
बहुत बड़ा है ‘फेक न्यूज’ का बाजार –
बीते सालो के मुकाबले इस ‘फेक न्यूज’ शब्द का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है. करीब 365 फीसदी। अमेरिका में, भारत में, डॉनल्ड ट्रंप तो राष्ट्रपति बनने के पहले से ही इस शब्द का खूब इस्तेमाल करते आए हैं. उनके ट्विटर हैंडल पर जाकर देखिए। कितने सारे ट्वीट्स में ये शब्द मिलेगा। मुझे नहीं लगता कि आप में से कोई ऐसा होगा, जिसने फेक न्यूज का जिक्र न सुना हो। फिर भी, इसका मतलब बता रही हूं. फेक न्यूज वो फर्जी जानकारियां होती हैं, जिन्हें न्यूज की शक्ल में चलाया जाता है. होती हैं सनसनीखेज, झूठी. मगर पेश ऐसे किया जाता है, मानो एकदम सच्ची हो, पुख्ता हों। ये जान-बूझकर बनाई जाती हैं, चलाई जाती हैं। बहुत सारे लोग दिन-रात फर्जी खबरें बनाने और फैलाने में जुटे हैं। जितनी बड़ी मीडिया इंडस्ट्री है, उससे कहीं ज्यादा बड़ा कारखाना इस ‘फेक न्यूज’ का है। ये यूं ही नहीं है कि पिछले 2-3 सालों में ‘वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी’ हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है, पहले लगता था, लोगों से बात करने का प्लेटफॉर्म है। अब बस फॉरवर्ड की गई फर्जी खबरें ठेलने का अड्डा बन गया है। सोशल मीडिया पर जो चीजें हमारी आंखों के आगे से गुजरती हैं, उनमें आधी से ज्यादा शायद फर्जी होती हैं.
“यह जाहिर हो गया कि सोशल मीडिया किसी भी लोकतांत्रिक देश के चुनाव में एक अहम भूमिका निभाएगा। आज अमेरिका जैसे देश में ही लगभग दो तिहाई लोग सोशल मीडिया पर खबरें प्राप्त करते हैं जहां पर सच्चाई और अफवाहों के बीच की रेखा को चिन्हित करना मुश्किल होता है। यह प्रवृत्ति दुनिया में हर जगह बढ़ती जा रही है। वैसे ही देखा जाए तो भारत में भी जहां डाटा रेट दुनिया में सबसे कम है और सस्ते स्मार्टफोन विभिन्न भाषाओं में काम कर सकते हैं, एक सोशल मीडिया संचालित समाज बनता जा रहा है।”

वॉट्सएप और अन्य सूत्रों द्वारा साझा किए गए समाचारों पर लोगों का विश्वास काफी ज्यादा है, लेकिन इन समाचारों की पुष्टि के संसाधन कम हैं। 2016 के अमेरिकी चुनावों के बाद अमेरिकी सीनेट ने लगभग सभी सोशल मीडिया और सूचना-प्रौद्योगिकी कंपनियों के सीईओ को अपनी सफाई पेश करने के लिए बुलाया। इसमें फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग और गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई भी शामिल थे।
अमेरिकी सीनेट की जांच से फेसबुक का शेयर कुछ ही दिनों में बीस प्रतिशत गिर गया, जो फेसबुक के लिए साढ़े आठ लाख करोड़ का नुकसान था। 2017 की सीनेट सुनवाई के बाद टेक्नालॉजी दिग्गजों ने चुनावों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नियंत्रण शुरू किया। अपने यहां हो रहे लोकसभा चुनाव के लिए फेसबुक और ट्विटर, दोनों ने ही राजनीतिक प्रचार के लिए नई नीतियां बनाई हैं। यहां यह कहना भी जरूरी है कि ये नीतियां अभी परीक्षण के दौर में ही हैं और उनके दूरगामी परिणामों का अनुमान लगाना अभी संभव नहीं है। बीते दिनों इन नीतियों का पहला परिणाम देखने को मिला जब फेसबुक ने अपने प्लेटफॉर्म से 700 पेज और खाते बंद कर दिए। इन खातों के जरिये राजनीतिक प्रेरित गलत सूचनाएं फैलाने का आरोप है। फेसबुक ने 2018 में पूरे भारत में 521 करोड़ रुपये की आय विज्ञापनों द्वारा अर्जित की, जिसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजनीतिक प्रेरित विज्ञापन थे। हालांकि यह भी ध्यान रहे कि फेसबुक सटीक राशि का खुलासा नहीं करता। राजनीतिक सूचनाओं के साथ अफवाह फैलाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल पहले से ही होता आ रहा है। यह लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि 700 पेजों पर एक साथ प्रतिबंध लगा जिससे 28 लाख लोग जुड़े हुए थे तो हमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सूचनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की आवश्यकता है। अधिकांश चुटकुले, मीम्स, डेटा, चित्र और यहां तक कि खबरों पर हम आसानी से विश्वास कर लेते हैं और इसी कारण उन्हें आगे फॉरवर्ड कर देते हैं, लेकिन संभव है कि उनके पीछे एक कंपनी द्वारा संचालित एक मार्केटिंग अभियान हो, जिसके आप केवल एक उपभोक्ता भर हों।

“आखिर यह किससे छिपा है कि तमाम ऐसे ट्विटर एकाउंट मौजूद हैं जो नाम से किसी एक व्यक्ति के लगते हैं, लेकिन उनको बढ़ावा देने के लिए उनके पीछे एक पूरी टीम, एक पूरी इंडस्ट्री लगी है। एक मुद्दा फेसबुक की पारदर्शिता का है। दिलचस्प बात यह है कि किसी एकाउंट को राजनीतिक घोषित करने या किसी पोस्ट को राजनीतिक सामग्री बताने का एकाधिकार फेसबुक ने अमेरिका स्थित अपनी टीम को दिया है। इसका अर्थ यह है कि सात समंदर पार स्थित ऑफिस में भारत जनित कंटेंट के राजनीतिक होने या नहीं होने की सच्चाई पर फैसला लिया जा रहा है। इस तरह के फैसले लेने की क्या प्रणाली है और फैसला लेने के खिलाफ अपील करने की क्या पद्धति है, इस पर फेसबुक ने चुप्पी ही साध रखी है।”

आखिर यह क्यों नहीं संभव है कि यह जांच और उसके आधार पर होने वाली कार्रवाई भारतीय पद्धति को समझने वाले लोग करें? सच तो यह है कि फेसबुक और साथ ही सभी बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत में सिर्फ एक ब्रांच ऑफिस चलाते हैं। इन कंपनियों के सभी नीतिगत फैसले अमेरिका में बैठे उनके अधिकारियों द्वारा लिए जाते हैं। ऐसे परिदृश्य में यह जानना आवश्यक है कि फेसबुक पेज के जरिये करोड़ों रुपये राजनीतिक विज्ञापनों में तो नहीं बहाए जा रहे हैं? महज 700 खाते जिनका कुल व्यय चार साल में 80 लाख रुपये था, हटा देने से ये बड़ा सवाल दरकिनार नहीं किया जा सकता।

फेसबुक के साथ अन्य सभी सोशल मीडिया कंपनियों को इस प्रकार की राजनीतिक गलतफहमियों और अफवाहों को फैलाने वाले खातों के ऊपर और पारदर्शी कार्रवाई करने की दरकार है। 700 फेसबुक एकाउंट पर कार्रवाई एक छोटी सी शुरुआत है। यह कार्रवाई हमारी बड़ी चुनौती के ऊपर पर्दा नहीं बननी चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां बहुत बड़ी हो चुकी हैं, लेकिन उनका तंत्र पारदर्शी नहीं है। एप्पल कंपनी की संपत्ति लगभग 75 लाख करोड़ रुपये की है, जबकि फेसबुक जो महज एक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग है, 45 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। यानी फेसबुक की संपत्ति लगभग पाकिस्तान और बांग्लादेश के संयुक्त जीडीपी के बराबर है। फेसबुक ने इतनी संपत्ति बनाने के लिए 36,000 कर्मचारियों का उपयोग किया है जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश को अपनी पूरी 36 करोड़ की आबादी से यह जीडीपी मिलता है। साफ है कि ऐसे में कोई भी सरकार या उसकी एजेंसियां इन कंपनियों के ऊपर अपना नियंत्रण नहीं कर सकतीं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि फेसबुक के उपभोक्ता जिनकी संख्या एक अरब के ऊपर है, फेसबुक से अधिक पारदर्शिता की मांग करें। यह मांग अन्य सोशल मीडिया कंपनियों से भी करनी चाहिए। इसी के साथ यह भी जरूरी है कि आम लोग राजनीतिक अफवाहों से निपटने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से उठाए गए कदमों की पूरी जानकारी हासिल करने के लिए एक साथ आवाज उठाएं और स्व-नियमन की मांग करें। इस मांग का पूरा होना आसान नहीं होगा, मगर यह तय है कि 2019 के आम चुनावों में सोशल मीडिया का उपयोग-दुरुपयोग वैश्विक लोकतांत्रिक संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कड़ी अवश्य बना।
बहुत सारे लोग हैं, जिन्हें ये फेक न्यूज का झूठ बहुत रास आ रहा है. वो शॉर्ट कट पसंद कर रहे हैं. किताबें पढ़ने की आदत घट गई है। न इतिहास जानने में दिलचस्पी होती है, न विज्ञान. जैसा सोचते हैं, वैसा ही पढ़ना पसंद कर रहे हैं. माने, अगर मेरी सोच कट्टर है तो मैं एक खास तरह की चीजें पढूंगी या पढूंगा। अगर मैं किसी खास विचारधारा की विरोधी हूं, तो उसके खिलाफ लिखी चीजें ही पढूंगी. जान-बूझकर फेक न्यूज का शिकार होने वालों की कोई मदद नहीं की जा सकती। मगर, गलती से इसके झांसे में आने वालों को बचाने की कोशिश हो सकती है। अगर आपको भी कहीं कोई फर्जी खबर दिखती है, ऐसी कोई खबर जिसपर आपको शुबहा हो, तो उसका सच सामने लाने की जरूर मजबूत कोशिश करें।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भी मांगा है जवाब –
भारत में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आईटी मंत्रालय से सोशल मीडिया पर आई फर्जी खबरों के खिलाफ उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी है। सूत्र बताते हैं कि आईटी मंत्रालय ने इस मामले में प्रभावी कदम उठाए जाने और लोगों को जागरूक करने का सुझाव प्रसारण मंत्रालय को दिया है। साथ ही कहा है कि फेसबुक को प्लेटफार्म के दुरुपयोग के लिए हाल ही में चेतावनी दी गई है, जबकि ट्विटर के सीईओ ने केंद्रीय मंत्री को प्लेटफार्म के दुरुपयोग की छानबीन का आश्वासन दिया है।
जो लोग मीडिया को समझते हैं, शिक्षित हैं और उन तक पहुंच रही खबरों की विश्वसनीयता का आकलन करते हैं, वे फर्जी खबरों को कम फैलाते हैं. फेक न्यूज को खत्म करना है, तो इसके लिए आपको किसी को तो जिम्मेदार ठहराना होगा, ये कहना है साइबर लॉ विशेषज्ञ पवन दुग्गल का। वो बताते हैं, भारतीय कानून फेक न्यूज शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। वो न इसे परिभाषित करता है, न ही इसकी पहचान के लिए कोई प्रावधान है।
सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी पोस्ट करना इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) एक्ट के तहत अपराध है. अगर आप फेसबुक पोस्ट में फर्जी जानकारी देते हैं या अपनी पहचान गलत दिखाते हैं, तो ये धोखाधड़ी का भी मामला बनता है।

पवन दुग्गल के अनुसार, सोशल मीडिया पर झूठी खबरों को रोकने के कारगर तरीके मौजूद नहीं हैं। सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट के तीन पक्ष होते हैं- एक पोस्ट करने वाला, दूसरा सर्विस प्रोवाइडर और तीसरा पोस्ट को लाइक या शेयर करने वाले। फर्जी खबरें और नफरत भरे कंटेंट पूरी दुनिया के लिए, और खास तौर पर भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा हैं जिनसे लड़ने के लिए मीडिया और पाठकों को एकजुट होना चाहिए। लोकतंत्र को बचाये रखने और मजबूत रखने के लिए किसी भी अपवाह और फर्जी समाचार से दूर रखने के लिए जरूरी है।

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etoinews.com के बीते दो घंटे की सुखियाॅ क्या रहीं विशेष खबरे और क्या था उनको खबरो के पीछे और क्या रहा आज का देश और विदेश में खबरो का सैलाब। सभी कुछ जाने www.etoinews.com में। अभी मतलब सात बजे तक बीते दो घंटे के विशेष खबर

 

 

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मोदी का स्पेस विजन चंद्रयान 2

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मोदी का स्पेस विजन चंद्रयान 2

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सम्पादकीय ,,,,,

भारत बनेगा अंतरिक्ष का सुपरपावर  ? क्या बनाएगा अपना स्पेस स्टेशन ?

 

 

  • भारत सरकार ने इसके लिए 1.43 अरब डॉलर का बजट रखा है,
  • मानव अंतरिक्ष मिशन के लॉन्च के बाद गगनयान कार्यक्रम को बनाए रखना होगा,
  • भारत अपना स्पेस स्टेशन लॉन्च करने की योजना बना रहा है,
  • चंद्रयान-2 लूनरक्राफ्ट नासा के एक पैसिव एक्सपेरिमेंटल इंस्ट्रूमेंट को चांद पर ले जाएगा,
  • चंद्रयान-2 15 जुलाई को दोपहर 2.51 बजे चांद के लिए टेक ऑफ करेगा,
इसरो प्रमुख के सिवन ने कहा कि मानव अंतरिक्ष मिशन के लॉन्च के बाद गगनयान कार्यक्रम को बनाए रखना होगा. इसी के चलते भारत अपना स्पेस स्टेशन लॉन्च करने की योजना बना रहा है.अंतरिक्ष में भारत का कद तेजी से बढ़ रहा है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अंतरिक्ष में नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है. अब इसरो की योजना अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने की है. इसरो प्रमुख के सीवन ने गुरुवार को यह जानकारी दी. यह प्रोजेक्ट गगनयान मिशन का ही विस्तार होगा. सिवन ने कहा कि मानव अंतरिक्ष मिशन के लॉन्च के बाद गगनयान कार्यक्रम को बनाए रखना होगा. इसी के चलते भारत अपना स्पेस स्टेशन लॉन्च करने की योजना बना रहा है. बता दें कि गगनयान योजना के तहत भारत 2022 में अंतरिक्षयात्रियों को स्पेस में भेजने वाला है. पिछले साल 15 अगस्त के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी घोषणा की थी. यह पहली बार होगा जब कोई भारतीय अंतरिक्ष यात्री भारतीय मिशन के तहत अंतरिक्ष में कदम रखेगा.यह भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन है. भारत सरकार ने इसके लिए अलग से 1.43 अरब डॉलर का बजट रखा है.इस मिशन के तीन अंतरिक्ष यात्रियों को सात दिनों के लिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा. समझा जाता है कि इस मिशन की लॉन्चिंग दिसंबर 2020 से शुरू हो जाएगी. अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले क्रू मेंबर्स का फाइनल सिलेक्शन इसरो करेगा और फिर वायु सेना इन्हें प्रशिक्षित करेगी.जुलाई में लॉन्च होगा चंद्रयान-2,इसरो ने बुधवार को अपनी महत्वकांक्षी परियोजना चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण की जानकारी दी थी. इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-2 15 जुलाई को दोपहर 2.51 बजे चांद के लिए टेक ऑफ करेगा. इसरो के चेयरमैन के. सिवान ने बताया कि चंद्रयान-2 लूनरक्राफ्ट नासा के एक पैसिव एक्सपेरिमेंटल इंस्ट्रूमेंट को चांद पर ले जाएगा. पहली बार ये साउथ पोल से चांद की तस्वीर लेगा. अमेरिकी एजेंसी इस मॉड्यूल के जरिए धरती और चांद की दूरी को नापने का काम करेगी. बता दें कि इसरो 2008 में चंद्रयान मिशन की सफल लॉंचिंग कर चुका है.
हाल के साल में भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में लंबी उड़ान भरी है और दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया है. बीते मार्च में भारत ने अंतरिक्ष में लाइव सैटेलाइट को मार गिराया. अपने ‘मिशन शक्ति’ की इस कामयाबी के बाद भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया, जिनके पास मिसाइल को अंतरिक्ष में मार गिराने की तकनीक है. अब तक यह क्षमता अमेरिका, रूस और चीन के पास थी. अंतरिक्ष में भारत की इस सफलता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डीआरडीओ के वैज्ञानिकों और अधिकारियों को बधाई दी. साथ ही उन्होंने ‘मिशन शक्ति’ को लेकर देश के नाम संदेश भी दिया था

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मोदी हैं तो मुमकिन है:पाम्पियो :अमेरिकी विदेश मंत्री

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सम्पादकीय ,,,,,

मोदी हैं तो मुमकिन है

           
                भारत दौरे से पहले अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो बोले- मोदी हैं तो मुमकिन है,हालाँकि अमेरिकियों पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता है मगर फिर भी जो कहा उसके कुछ मायने लगाए जा सकते हैं अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा कि कुछ हफ्ते पहले 600 मिलियन भारतीयों ने नरेंद्र मोदी को विशाल जनादेश दिया था. 1971 के बाद से कोई भी भारतीय पीएम बहुमत के साथ दोबारा पीएमओ में नहीं लौटा लेकिन नरेंद्र मोदी ने ‘शानदार’ जीत हासिल की.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू अमेरिका पर भी चल गया. इसी महीने भारत के दौरे से पहले अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने दोनों देशों में और भी अच्छे रिश्ते की उम्मीद जताते हुए कहा कि मोदी है तो मुमकिन है. कुछ हफ्ते पहले 600 मिलियन भारतीयों ने मोदी को विशाल जनादेश दिया था. 1971 के बाद से कोई भी भारतीय पी एम बहुमत के साथ दोबारा पीएमओ में नहीं लौटा, लेकिन मोदी ने ‘शानदार’ जीत हासिल की.
               इसके बाद पोम्पियो इस महीने के आखिर में कोरिया में परमाणु निरस्त्रीकरण पर चर्चा करने के लिए जापान और दक्षिण कोरिया का दौरा करेंगे. समाचार एजेंसी सिन्हुआ के मुताबिक, विभाग के प्रवक्ता मॉर्गन ओर्टागस ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि पोम्पियो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से जी-20 शिखर सम्मलेन से इतर मिलेंगे. यह सम्मेलन जापान के ओसाका में 28-29 जून को होगा. माइक पॉम्पियो ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी कैंपेनिंग में कहा था- मोदी है तो मुमकिन है और उन्होंने इसे सच कर दिखाया. अब भारत और अमेरिका के बीच संभावनाओं के विस्तार की तरफ हम देख रहे हैं. माइक पॉम्पियो ने ये बातें बुधवार को यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल समिट में कही.
 

             अमेरिकी विदेश मंत्री पॉम्पियो की इस महीने भारत यात्रा प्रस्तावित है. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय समकक्ष एस जयशंकर से उनकी मुलाकात होनी है. पोम्पियो का मानना है कि इस दौरान दोनों देशों के बीच बड़े मुद्दों और विचारों पर चर्चा होगी. जिससे द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम मिलेगा. बीते दिनों में भारत और अमेरिका के सम्बन्ध लगातार घनिष्ट होते जा रहे हैं। अमेरिका ने भारत को द्विपक्षीय व्यापार के मामले में नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) के सदस्य देशों के बराबर का दर्ज़ा दिया था ।अमेरिका के इस फैसले का भारत को सबसे बड़ा फ़ायदा ये होन था कि उच्च तकनीकी वाले अमेरिकी रक्षा उपकरण और हथियार आदि आसानी से हासिल हो सकेंगे। जिन देशों को अमेरिका ने एसटीए-1 (पहले स्तर का स्ट्रैटजिक ट्रेड ऑथोराइज़ेशन) का दर्ज़ा दिया हुआ है, उन्हें इस नियंत्रण और लाइसेंसिंग प्रक्रिया से छूट मिल जाती है। भारत को भी यह दर्ज़ा मिल चुका था इसलिए वह भी इस छूट का हक़दार हो गया था । सख़्त नियंत्रण वाले उत्पाद भी मिल सकते थे – कई ऐसे ग़ैर-रक्षा उत्पाद भी अमेरिका से सहज तौर पर मिल सकते थें जिनके निर्यात पर वहां सख़्त नियंत्रण रखा जाता है। सिर्फ कड़ी लाइसेंसिंग प्रक्रिया के तहत इन उत्पादों का निर्यात किया जाता है। इंडो-पैसिफिक (भारत-प्रशांत क्षेत्र) बिज़नेस फोरम की बैठक में अमेरिकी वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस ने भारत को मिले एसटीए-1 दर्ज़े की पुष्टि की थी और इसकी अहमियत भी बताई थी । अमेरिका ने भारत को एसटीए- 1 का दर्जा देकर चीन को दिया था  बड़ा झटका ,अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का भारत को अपने सहयोगी देशों के बराबर एसटीए- 1 ट्रेडिंग स्टेटस का दर्जा दे दिया था । यह चीन के लिए करारा तमाचा था जो परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की एंट्री की राह में बार-बार रोड़े अटकाता रहा है।मगर भारत और रूस के बढ़ते सामरिक रिश्तों के वजह से अमेरिकी प्रशासन नाराज है और भारत का GSP दर्जा ख़त्म करने पर अड़ गया है,अमेरिका की ट्रंप सरकार भारत से जेनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस यानी जी एस पी का दर्जा ख़त्म करने के फैसले को वापस नहीं लेगी.अमेरिका की ट्रंप की सरकार ने कहा है कि वह भारत को मिले जेनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस (जीएसपी) दर्जे को समाप्त करने के अपने निर्णय से पीछे हटने वाली नहीं है.

“राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने बीते 4 मार्च को इस बात की घोषणा थी कि जल्द ही भारत को जीएसपी कार्यक्रम से बाहर कर दिया जाएगा. इसके लिए भारत को 60 दिनों का नोटिस दिया गया था. नोटिस की अवधि 3 मई को समाप्त हो गई. अब इस संबंध में किसी भी समय औपचारिक अधिसूचना जारी की जा सकती है”

 
अमेरिका के एक अधिकारी ने कहा, ‘‘पिछले एक साल से भारतीय समकक्षों के साथ जारी बातचीत के बाद अंततः मार्च में हमें यह घोषणा करनी पड़ी कि भारत को अब जीएसपी के तहत मिलने वाले लाभ से वंचित रखा जाए.’’ अधिकारी के मुताबिक निलंबन अब तय है. उन्‍होंने कहा, ”अब काम यह है कि हम आगे कैसे बढ़ते हैं. आगे की राह तलाशने के लिये हम नरेंद्र मोदी की दूसरी सरकार के साथ किस तरह से काम कर पाते हैं?’’अगर इस बात को सही मानें तो साफ़तौर पर अमेरिका भारत से कुछ ज्यादा  चाहता है वह क्या चाहता है ?ये सारी चीजें अब धीरे धीरे साफ़ होंगी,,,,,,
 
जीएसपी खत्‍म होने का मतलब क्या हैं ?
 
जीएसपी खत्म होने का मतलब यह हुआ कि भारत अब जिन प्रोडक्ट को अमेरिका में बेचेगा उस पर वहां की सरकार टैक्स लगाएगी. अब तक भारत बिना टैक्स के कुछ प्रोडक्ट का निर्यात करता है. अमेरिका के इस कदम को द्विपक्षीय रिश्तों के लिहाज से बड़ा झटका माना जा रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के केमिकल्स और इंजिनियरिंग जैसे सेक्टरों के करीब 1800 से ज्यादा छोटे-बड़े प्रोडक्ट पर जीएसपी का फायदा मिलता है. मतलब यह है कि भारतीय बाजार से ये प्रोडक्ट अमेरिकी बाजार में बिना किसी टैक्स या मामूली ड्यूटी चार्ज के पहुंचते हैं. जाहिर सी बात है कि इन प्रोडक्ट पर अब टैक्स लगाना भारत के लिए एक झटका है. जानकारी हो कि भारत जीएसपी के तहत अमेरिका को 5.6 अरब डॉलर (करीब 40 हजार करोड़ रुपये) के सामानों का निर्यात करता है.इधर मोदी के जबरदस्त विजय के बाद अमेरिकी प्रशासन थोड़ा जरूर पड़ा है शायद इसीलिए पंपियों ने कहा है की मोदी है तो मुमकिन है,क्यों कि देर सबेर अमेरिका को भारत की जरूरत पड़ने ही वाली  हैदक्षिण एशिया में जिस तरह की भौगोलिक स्थिति है और जो दुनिया में व्यापार की स्थिति है और जिस तरह सेअमेरिका चीन से ट्रेड वार लड़ रहा है वो भारत के बिना संभव नहीं,वैसे भारतीय कूटनीतिज्ञों ने भी अमेरिका के नाक में है क्युकी रूस से रक्षा सौदों के पश्चात अमेरिका खासा नाराज था बहरहाल मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है

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