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5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनामी के मजेदार सपने का सच क्या है ?

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5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनामी के सपने का सच ?

भारत की जीडीपी का आकार इस वक्त 2.7 ट्रिलियन डॉलर है. 2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनामी का लक्ष्य है. 19 अगस्त को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अगली तिमाही में ऑटो इंडस्ट्री से 5 लाख लोगों की नौकरियां जा सकती हैं. 400 करोड़ से कम टर्नओवर वाली कंपनियों की हालत बहुत ख़राब है. सेल्समैन, पेंटिंग, वेल्डिंग, कास्टिंग, टाइप की नौकरियां जल्दी जाएंगी. पहले ही 2 से 3 लाख नौकरियां इस सेक्टर में जा चुकी हैं. हर बड़ी कंपनी में कम से कम 10 प्रतिशत की छंटनी हो रही है. केयर रेटिंग का कहना है भारत में आर्थिक सुस्ती के कारण नई नौकरियां भी धीमी पड़नी वाली हैं. ब्लूमबर्ग के अनिर्बन नाग की रिपोर्ट है. बैंक, बीमा, ऑटो और लॉजिस्टिक और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की कंपनियां भी भर्ती कम करेंगी. केयर रेटिंग का यह अध्ययन 1000 कंपनियों के सर्वे पर आधारित है. यह 19 अगस्त की रिपोर्ट है. महिंद्रा के प्रबंध निदेशक की आशंकाहै कि बहुत से कार डीलर कंगाल हो सकते हैं. महिंद्रा एंड महिंद्रा के एमडी पवन गोयनका का कहना है,कि अगर त्योहारों में ऑटो सेक्टर में बदलाव नहीं आया तो डीलर और सप्लायर दीवालिया होने लगेंगे. 12 महीने से ऑटो सेक्टर में मंदी चल रही हैऔर  एक साल में 300 डीलरों  ने अपनी दुकाने बंद कर दी है. 2 लाख लोगों की नौकरी भी चली गई है.मतलब देश की अर्थव्यवस्था एकदम चौपट है ,,,,,

अब देखते हैं कि इस पर सरकार के वाईस यानि राजीव कुमार का कहते हैं ?

राजीव कुमार (नीति आयोग के वाइस चेयरमैन) 

सरकार के वाइस सफाई  :

मौजूदा हालात के लिए यूपीए 2 सरकार में मनमाने तरीके से बांटे गए लोन जिम्मेदार हैं , साथ ही, नोटबंदी, जीएसटी और IBC जैसे फैसलों से भी फाइनैंशल सिस्टम प्रभावित हुआ है,‘कोई भी किसी पर भी भरोसा नहीं कर रहा है… निजी क्षेत्र के भीतर कोई भी कर्ज देने को तैयार नहीं है, हर कोई नकदी लेकर बैठा है..’पहले 35 प्रतिशत नकदी घूम रही थी, यह अब बहुत कम हो गई है। इन सब कारणों से एक जटिल स्थिति बन गई है। इसका कोई आसान उत्तर नहीं है।’ सरकार और उसके विभागों द्वारा विभिन्न सेवाओं के लिए भुगतान में देरी  भी सुस्ती की एक वजह हो सकती है  पिछले 70 साल में ऐसी स्थिति का सामना नहीं हुआ  जब पूरी वित्तीय प्रणाली में जोखिम हो। सरकार को ऐसे कदम उठाने की जरूरत है , जिससे निजी क्षेत्र की कंपनियों की आशंकाओं को दूर किया जा सके और वे निवेश के लिए प्रोत्साहित हों।’ निजी निवेश तेजी के  बढ़ने से भारत को मध्यम आय के दायरे से बाहर निकलने में मदद मिलेगी। वित्तीय क्षेत्र में दबाव से निपटने और आर्थिक वृद्धि को गति के लिए केंद्रीय बजट में कुछ कदमों की घोषणा पहले ही की जा चुकी है। वित्त वर्ष 2018-19 में वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रही जो 5 साल का न्यूनतम स्तर है।इस पूरी स्थिति की वजह 2009-14 के दौरान बिना सोचे-समझे दिए गए कर्ज हैं , इससे 2014 के बाद गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बढ़ी हैं।  फंसे कर्ज में वृद्धि से बैंकों की नया कर्ज देने की क्षमता कम हुई है, इस कमी की भरपाई गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) ने की। इनके कर्ज में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई। एनबीएफसी कर्ज में इतनी वृद्धि का प्रबंधन नहीं कर सकती और इससे कुछ बड़ी इकाइयों में भुगतान असफलता की स्थिति उत्पन्न हुई। अंतत: इससे अर्थव्यवस्था में नरमी आयी।प्रशासन अपनी प्रक्रिया को तेज करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है,,,,,

हमारी ना समझ ?

सरकार की ओर से बीते दिनों में भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनामी बनानें  का लक्ष्य रखा गया है ,,उसका सच क्या है ? इस वक्त 2.7 डॉलर की इकॉनामी का दम फूल रहा है,नौकरियां जा रही हैं व्यापार बर्बाद हो रहा है निर्माता कंपनियां डूब रही हैं ,,,कई लाख युवा बेरोजगार हो गए ,,लोगों की क्रय शक्ति कम हो गयी ,,नई नौकरियां सृजित नहीं हो रही हैंऔर पुरानी बच नहीं रही हैं ,ऐसे में 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनामी का सपना देखना या दिखाना कितना ठीक है ? देश में इन दिनों जो कुछ भी हो रहा है वो किसी मुर्गे की लड़ाई से कम दिलचस्प नहीं,इन बातों से एक बात पक्के तौर पर समझ आती है कि सरकार आर्थिक मुद्दे पर संवाद को राजी नहीं है ,,,,ऐसी स्थिति में अब पूरे पांच साल पाकिस्तान ,काश्मीर,भ्रष्टाचार पर कार्यवाहियों की खबरे ही अब आपको चैनलों में आपका मनोरंजन करेंगी ,इन दिनों में यह भी देखना दिलचस्प होगा कि सरकार के एडवेंचर्स और खतरनाक कार्यवाहियों के लाइव  पेट की भूख और उसके इंकलाब को कब तक रोक पाती है ? ऐसा नहीं कि ये मुद्दा सिर्फ केंद्र का भर हो  असल में ये नौटंकी हर देश में और जाहिरा तौर पर हमारे प्रदेश में भी देखी जा सकती है ,,,,आने वाले दिनों में यह भी संभव है की सरकार द्वारा प्रायोजित लाइव कबूतर की लड़ाई या सांप नेवले की लड़ाई के कार्यक्रम या फिर भूत प्रेत की कहानियां या फिर कोई आसाराम लाइव शुरू हो जावे,पर यह तय है क़ि  सरकारें रोजी रोटी के प्रश्नों से भाग रही हैं ,,,,,

मर गया सदमा-ए-यक-जुम्बिश-ए-लब से ‘ग़ालिब’ 

ना-तवानी से हरीफ़-ए-दम-ए-ईसी न हुआ

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देश इन दिनों : …..सबब मुंसिफ की बेरहमी का ,गुजारिश जान बक्शी की !

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सबब मुंसिफ की बेरहमी का ,गुजारिश जान बक्शी की

देश के ताज़ा हालात और ट्रेफिक जुर्मानें के कानून के अमल में हो रहे दरिंदगी से परेशान एक सम्पादकीय

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए,,,,,,

दुष्यंत कुमार की यह कविता हिन्दुस्तान के अवाम की बेबसी की कविता है ,,,,,,,,मसला निजाम की बेरुखी,बेदर्दी या बेरहमी का है या फिर मेरी बेबसी का ,,,,,समझ सको तो समझ लेना,,,, ,,,,वैसे हर वक्त के निजाम तुम्हारी तरह ही होते रहे होंगे ,,,मग़र मुझे शिकायत अपने साहेब खास से है,,,,,,आखिर ऐसा क्या है ? कि निजाम  जिनके लिए कानून बनाती है वे ही नाखुश होते हैं,आइये नजर डालते हैं मेरी शिकायतों के पुलिंदे पर :

  • सरकार का स्वच्छता मिशन,,,, सारे देश की सड़कें गुटखा और पान की पीक से रंगी,सरकार सफाई पर गंभीर, पर गंदगी के व्यापार से ऐतराज नहीं,
  • 75 फीसद घरों में पीने का साफ पानी तक नहीं है,पर पूरा देश पूरा ओ डी एफ हो गया,
  • 25 प्रतिशत गांवों के शौचालयविहीन परिवारों ने शौचालय बनाए ही नहीं, बावजूद इसके पूरा गांव ओडीएफ हो गया।
  • नोटबंदी और जीएसटी, देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लागू किया,मग़र अर्थव्यवस्था एक गहरी मंदी की ओर पहुँच गयी,
  • साल में दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया परंतु पिछले एक साल में ही  1.1 करोड़ लोगों ने रोजगार गंवा दिया
  • बेरोजगारी की दर 6.1फीसद हो गई,
  • देश में 11 करोड़ लोग पहले से ही बेरोजगार हैं,
  • बीएसएनएल जैसी सरकारी कंपनियों के पास 1.54 लाख कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए पैसे नहीं हैं,
  • 12 राष्ट्रीयकृत बैंकों का बकाया कर्ज 10 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच गया है,
  • 1999 के बाद पहली बार इतनी वैश्‍व‍िक निवेशक तेजी से बाजार से बाहर हुए,
  • सरकार ने  जिनके लिए ट्रेफिक का कानून बनाया ,उन्हें ही सरकारी भेड़ियों ने झिंझोड़ डाला,
  • सर की सलामती को हेलमेट जरुरी है,पर नशे पर सरकार ए आला खामोश हैं,जबकि देश का असल कातिल नशा है,
  • सरकार ने नारा दिया ‘क्या जान से ज्यादा जुर्माना’ महत्वपूर्ण है ? भेड़ियों ने साबित कर दिया हाँ ‘जान से ज्यादा जुर्माना’ महत्वपूर्ण है,
  • कश्मीर से  धारा 370 हटा दी तीन प्रदेश बना दिए मगर पूरी घाटी आज भी अशांत है, आखिर सब के पीछे कारण क्या है ?
  • बेसबब बेरोजगार अपनी बेरोजगारी से हार क़र फिर लौट चुके अपने गॉंव ,पर निजाम अब तक न जाने किस दुनिया में खोये हुए हैं ?
  • देश पेट की भूख और बेरोजगारी से परेशान है,बाजार की लगातार बुरी खबरों से लोग सहमें हैं और साहेब कि एन आर सी और मंदिर में व्यस्त हैं,

आइये दुष्यंत कुमार की इस कविता को पूरा पढ़ें शायद बात कुछ समझ आये

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए,

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो कमीज़ तो पाओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

वो मुतमुइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

साहिबे सरकार को चाहिए कि वो एक बार छत्तीसगढ़ आएं और उस सुकून को देखें कि कैसे बुरे वक्त में हम सूखी रोटी भी खाकर खुश रह लेते हैं ? कुछ समझ में आये तो पुरे देश को सुकून से जीने दें ये आपकी रोज रोज की तुनक, हमारी जिंदगी को बे मजा क़र देती है, गुजारिश है आपसे सुकून की जिंदगी नहीं तो, मौत तो सुकून की दे दीजिये………

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

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मोदी का गांधीवाद ?

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मोदी का गांधीवाद ? 

आइये जाने मोदी का गाँधीवाद  ?

भारतीय जनता पार्टी और आर एस एस के इतिहास पर गौर करें तो पाते हैं कि उसकी विचार धरा को स्थापित करने में वीरसावरकर  और दीन दयाल उपाध्याय सर्व प्रमुख रहे हैं  ,,,,,

सावरकर ने भारत के एक सार के रूप में एक सामूहिक “हिंदू” पहचान बनाने के लिए हिंदुत्व का शब्द गढ़ा ,,,,भाजपा लगातार इसी मार्ग पर चल भी रही है,मगर भारत में गैर हिन्दू भी बडी मात्रा में हैं, ऐसे में इस लाइन पर चलकर मोदी जी थोड़े असहज भी हो सकते हैं,हालाँकि मोदी जी की छवि तीसरे पंक्ति के हिंदुत्व वादी बड़े नेता की रही है,यानि वीर सावरकर (पहले वीर सावरकर फिर आडवाणी जी और उनके बिरसा के रूप में मोदी हुए ,इसकी अगली पंक्ति में योगी आदित्य नाथ हुए) के वे सीधे उत्तराधिकारी हैं ,,,,,

इसी तरह मोदी जी को दीनदयाल का एकात्मवादी राजनीतिक दर्शन भी विरासत में मिला जिस पर वे और पूरी भाजपा चलती आयी है,,,दीनदयाल  उपाध्याय जनसंघ के पितृ पुरुष हैं,,,, जिन्होनें भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद नामक विचारधारा दी।वे एक समावेशित विचारधारा के समर्थक थे,जो एक मजबूत व सशक्त भारत चाहते थे,उनका विचार था कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है।“ भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा .”मोदी ने इस लाइन पर भी चलकर लगातार पहले  गुजरात में फिर देश में नारा दिया “सबका साथ सबका विकास” ये एक समावेशी विकास की कोशिश थी हालाँकि 2014 की  इसी राजनैतिक नारे से शुरुआत हुई फिर राजनीति में गाय,गोबर, गौरक्षक, नोट बंदी और आधे अधूरे तैयारी से शुरू किये जी एस टी के मारे रास्ता राजनीति अपना रास्ता भटक गयी,फिर आखिर में मोदी सावरकर के मूल “राष्ट्रवाद और कट्टर हिंदुत्व” की ओर लौटे,जीत भी हासिल की,पर मोदी को मालूम हैं कि वीर सावरकर और दीन दयाल उपाध्याय का प्रभाव भारत में तो था मग़र उन्हें भारत को विश्व गौरव और खुद को वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करना है तो कुछ बड़ा करना होगा ये बड़ा नाम पटेल और गाँधी हो सकते हैं ,,, उन्होंने देश के उन नामों का बिरसा बनने की कोशिश जारी रखी जिन्हें देश के अंदर और बाहर बहुत सम्मान प्राप्त है, इनमें सरदार पटेल और फिर महात्मा गाँधी थे ,हालाँकि कभी कभी भाजपा नेता गाँधी नेहरू विरासत को कोस भी लेते हैं,मगर मोदी जी ने यह नहीं किया ,,,पिछले चुनाव के दौरान ही उन्होंने गांधी जी के 150 जन्म दिवस को बड़े वैश्विक मंच पर जोर शोर से मनाने की घोषणा की,,, और दूसरी तरफ पटेल की शानदार विशाल मूर्ति गुजरात में स्थापित की ,बहुतायत में राजनेता इसे मोदी जी की राजनीतिक बुद्धिमत्ता मान सकते हैं, मगर ये इसमें वृहद  दूरदर्शिता भी है,,,,,

महात्मा गांधी का राजनीतिक दर्शन,तब से लेकर अब तक बड़ा सामयिक रहा परिणामतः मोदी जी को शांति और अहिंसा के मार्ग पर ही चलना सहज होगा ,,,मतलब साफ है कि आने वाले दिनों में मोदी महात्मा गांधी केउत्तराधिकारी  के रूप में स्थापित होना चाहेंगे, जिसकी दो वजह है, पहली देश के अंदर महात्मा गांधी सर्व स्वीकार्य हैं, दूसरा देश के बाहर पूरी दुनिया में सत्य अहिंसा के पुजारी के रूप में महात्मा गांधी एक वैश्विक राजनीतिक और सामाजिक दार्शनिक के रूप में एक सदी से ज्यादा स्थापित हैं, ऐसे में मोदी के लिए गांधीजी सचमुच एक राजनैतिक आदर्श के रूप में साबित हो सकते हैं, इसके मायने बहुत साफ हैं कि आने वाले दिनों में मोदी के अंदर उसी तरह के  परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं असल में यही है,,,, मोदी का गांधीवाद है ,,,,,उल्लेखनीय है कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा के साथ उन्होंने अपने आप को भी लौह पुरुष के रूप में स्थापित कर दिया है, बालाकोट से लेकर, अनुच्छेद 370 पर दिलेरी से कार्यवाही कर मोदी जी ने उसी चरित्र का अनुगमन किया ,अब मोदी 2 अक्टूबर से साल भर तक चलने वाले गाँधी जी की 150 वीं जयंती मना रहें हैं, ये भी बड़ी दूर दर्शिता होगी,इस रूप में वे दुनिया भर में गाँधी के प्रति कृतग्यता और अपना विनयी व्यक्तित्व बना सकेंगे, ध्यान रहे इसी दूर दृष्टी के कारण मोदी जी आज पुरे भारत के सबसे बड़े नेता के रूप में खुद को स्थापित करने में सफल और भाजपा को सत्ता दिलाने में कामयाब रहे ,,,,,वंदे मातरम

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हरतालिका तीज कब है ? एक या दो सितंबर को ?

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हरतालिका तीज का व्रत कब करें, इसे लेकर उलझन है। दरअसल 1 सितंबर को सुबह में द्वितीय तिथि की भी मौजूदगी के कारण उलझन की स्थिति बन गई है।जन्माष्टमी के बाद अब हरतालिका तीज का व्रत कब करें, इसे लेकर उलझन की स्थिति बन गई है। बिहार सहित झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में किये जाने वाला यह व्रत हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। यह व्रत मुख्यतौर पर शादीशुदा महिलाएं करती हैं और अपने पति के लिए लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
महिलाएं इस दिन नये वस्त्र पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और श्रृंगार आदि कर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हालांकि, इस बार यानी साल 2019 में इसे मनाने की तिथि को लेकर उलझन जैसी स्थिति पैदा हो गई है। हरतालिका तीज-2019 व्रत की तारीख इस बार 1 सितंबर है या फिर 2 सितंबर, इसे लेकर जानकारों और आम लोगों में मतभेद है।

हरतालिका तीज कब है, एक या दो सितंबर?

हरतालिका तीज को लेकर उलझन दरअसल 1 सितंबर को सुबह में द्वितीय तिथि की भी मौजूदगी के कारण शुरू हुई है। चित्रा पक्षीय पंचांग के अनुसार द्वितीय तिथि 1 सितंबर को सुबह 8.27 बजे तक है। इसके बाद तृतीय तिथि शुरू हो रही है और यह अगले दिन यानी 2 सितंबर को सुबह 8.58 में खत्म होगी। ऐसे में इसे 1 सितंबर को मनाया जाना चाहिए। वहीं, ग्रहलाघवी पद्धति से निर्मित पंचांग के अनुसार हरतालिका तीज 2 सितंबर को मनाया जाना चाहिए।
कुछ पंडित 1 सितंबर को तीज के लिए शुभ मान रहे हैं क्योंकि अगर 2 सितंबर को तीज की पूजा की जाएगी, तब चतुर्थी तिथि होगी। कुछ जानकारों का यह भी मत है कि तीज का व्रत 2 सितंबर को ही किया जाए लेकिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा सुबह-सुबह की कर ली जाए। ऐसी उलझन में बेहतर है कि आप भी अपने पुरोहित से इस बारे में स्थिति स्पष्ट कर लें। वैसे अगर आप 1 सितंबर को हरतालीका तीज कर रही हैं तो इसके लिए पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6.05 बजे से रात 8.23 बजे तक का होगा।
गौरतलब है कि हरतालिका तीज व्रत के दौरान महिलाएं करीब 24 घंटे और कई मुहूर्त और तिथि के मुताबिक उससे भी ज्यादा वक्त के लिए निर्जला रहती हैं। यही नहीं, किसी भी प्रकार का अन्न भी ग्रहण नहीं करती हैं। मान्यताओं के मुताबिक माता पार्वती ने सबसे पहले हरतालिका तीज का व्रत किया था। इसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शंकर पति के रूप में प्राप्त हुए।

1 सितम्बर रविवार को ही क्यों है?

1 सितंबर रविवार को सुबह 8.27 बजे से तृतीया तिथि शुरू हो जाएगी और 2 सितंबर सोमवार को ब्रह्ममुहूर्त में 4.57 बजे खत्म होगा।

अर्थात

2 तारीख को सूर्योदय से लगभग 1 घण्टा पहले ही तृतीया तिथि समाप्त होकर चतुर्थी लग जायेगा।

1 तारीख को तृतीया तिथि के साथ हस्त नक्षत्र भी है। हस्त नक्षत्र की तीजा शुभ मानी जाती है।

इसलिये हरतालिका तीजा का व्रत 1 तारीख को ही रखना है

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