राजधानी रायपुर का एक ऐसा मंदिर जहाँ विजयदशमी के दिन लगता माता का दरबार

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक ऐसा मंदिर है जो केवल दशहरे के दिन खुलती है. साल में एक बार ही यहां माता का दरबार लगता है. हम बात कर रहे हैं रायपुर के ब्राम्हणपारा स्थित कंकाली मठ का. मंगलवार को इस मठ के पठ खुले. पारपंरिक मान्यताओं के अनुसार शस्त्र पूजा के बाद पट श्रद्धालुओं के लिए खोला गया. पट खुलते ही मठ में लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है. इस दिन कंकाली माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. ऐसी मान्यता है कि माता केवल एक दिन के लिए इस मंदिर में आती हैं. सालों से लोग पूजा की ये परंपरा मानते आ रहे हैं.
होती है शस्त्रों की पूजा
रायपुर में दशहरे के दिन एक बार फिर कंकाली माता का दरबार सजाया गया. सबसे पहले यहां प्रमुख महंत द्वारा माता कंकाली की विशेष पूजा-अर्चना के बाद शस्त्रों की खास तरीके से पूजा की गई. ऐसी मान्यता है कि नवरात्री के बाद विजयादशमी के दिन एक दिन के लिए कंकाली माता इस मठ में आती हैं. तकरीबन चार सौ साल पहले इस परंपरा की शुरूआत की गई थी.
जब कंकाली माता इस मठ में विराजती थी और उसी समय महंत कृपालु गिरी महाराज के सपने में देवी ने दर्शन दिए और तालाब खुदवाने के साथ मंदिर बनाने के निर्देश दिए. इसके बाद कृपालु गिरी ने मंदिर का निर्माण कराया और माता उस मंदिर में चली गई. लेकिन जाते समय ये विजयादशमी के दिन इस मठ में वापस आने का आश्वासन भी माता ने महंत को दिया और उसी दिन से एक दिन के लिए इस मठ में आती है. इसी दिन मठ के पट को खोला जाता है. साथ ही माता के अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है, क्योंकि माता इस दिन अपने सारे अस्त्र-शस्त्रों के साथ विराजती हैं. मठ की मान्यताओं को देखते हुए हर साल यहां लोगों की भीड़ लगती है. आम और खास सभी वर्ग के लोग कंकाली मठ पहुंचकर दर्शन करते हैं.
लगता है श्रद्धालुओं का तांता
लोगों का मानना है कि बरसों से मठ में आने वाले लोगों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती है. साल में एक बार सजने वाले माता के इस दरबार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. मंदिर में आए श्रद्धालुओं का कहना है कि यहां मांगी गई सारी मुरादें पुरी होती है. इस वजह से हर साल वे यहां आते हैं.

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SBI ने बदला गर्भवती महिलाओं की भर्ती का नियम ; 3 महीने से ज्यादा की प्रेग्नेंसी पर महिला को अनफिट करार देना मातृत्व अधिकारों का हनन

दिल्ली महिला आयोग का कहना है कि इस नियम से महिलाओं का अधिकार प्रभावित होगा और कार्यस्थल पर उनके साथ भेदभाव को और बढ़ावा मिलेगा. बैंक एसोसिएशन ने भी मैनेजमेंट को पत्र लिखकर गाइडलाइन वापस लेने का दबाव बनाया है.देश के सबसे बड़े बैंक SBI के महिला कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर नियमों में किए बदलाव पर बवाल शुरू हो गया है. एसबीआई ने 3 महीने से ज्यादा प्रेग्नेंट महिला को अस्थायी रूप से अनफिट करार देते हुए नियुक्ति पर रोक लगा दी. इसके बाद दिल्ली महिला आयोग ने बैंक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
3 महीने से ज्यादा अवधि की प्रेग्नेंट महिला को तत्काल नई नियुक्ति नहीं दी जा सकती
SBI ने अपने सर्कुलर में कहा था कि 3 महीने से ज्यादा अवधि की प्रेग्नेंट महिला को तत्काल नई नियुक्ति नहीं दी जा सकती है. वे डिलीवरी के चार महीने बाद नौकरी ज्वाइन कर सकती हैं. तब तक उन्हें अस्थायी रूप से अनफिट माना जाएगा. इस विवादित नियम पर CPI के सांसद बिनोय विश्वम ने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र भी लिखा है. उन्होंने कहा, ये कैसा महिला सशक्तीकरण है जहां प्रेग्नेंट होने पर उसे अनफिट करार दे दिया जाता है.
यह महिलाओं के साथ वर्कप्लेस पर भेदभाव है.आयोग ने बताया भेदभाव वाला कानून दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाती मालीवाल ने एसबीआई के नए नियम को महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाला कानून बताया है. उन्होंने कहा, 3 महीने से ज्यादा की प्रेग्नेंसी पर महिला को अनफिट करार देना उसके मातृत्व अधिकारों का हनन है. हम उन्हें नोटिस जारी कर इस महिला विरोधी कानून को वापस लेने की मांग करते हैं. साल 2009 में भी बैंक ने इसी तरह का कानून लादने की कोशिश की थी, जिसे बाद में वापस लेना पड़ा था.
महिला कर्मचारियों के प्रमोशन पर भी असर
आल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमन एसोसिएशन ने नए नियम की आलोचना करते हुए कहा कि इससे महिला कर्मचारियों के प्रमोशन पर भी असर पड़ सकता है. वैसे तो नया नियम 21 दिसंबर, 2021 से लागू हो चुका है, लेकिन प्रमोशन के मामले में यह 1 अप्रैल, 2022 से प्रभावी होगा. इसके बाद से महिला कर्मचारियों का प्रमोशन प्रभावित हो सकता है. अभी तक 6 महीने की गर्भवती महिला को भी बैंक ज्वाइन करने का नियम था
नई गाइडलाइ वापस लेने की अपील की
आल इंडिया एसबीआई एम्प्लाइज एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी केएस कृष्णा ने एसबीआई मैनेजमेंट को लिखे पत्र में नई गाइडलाइ वापस लेने की अपील की है. उन्होंने कहा कि नया नियम पूरी तरह महिला विरोधी है और यह महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है. प्रेग्नेंसी को किसी भी तरह से अनफिट नहीं करार दिया जा सकता. किसी महिला को अपने बच्चे की डिलीवरी या नौकरी में से एक चुनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, क्योंकि दोनों ही उसके अधिकार हैं.
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