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मरने के 70 साल बाद भी लोगों को दे रही जीवन; जानें क्या है मामला

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करीब 70 साल पहले की वजह से एक युवा महिला की मौत हो गई थी. उसके इलाज के दौरान डॉक्टरों ने एक कोशिका चुपके से निकाल ली. इसके बाद उस कोशिका का अध्ययन करके विभिन्न बीमारियों की दवा तैयार की गई. जिससे दुनिया में लाखों लोगों की जान बच सकी.

मरने के 70 साल बाद मिला सम्मान

WHO के चीफ Dr Tedros Adhanom Ghebreyesus ने जेनेवा में मरणोपरांत Henrietta Lacks को सम्मानित किया. दरअसल Henrietta Lacks की मौत 70 साल पहले अक्टूबर 1951 में हो गई थी. लेकिन उसके शरीर से बिना अनुमति के निकाली गई एक कोशिका आज भी लाखों लोगों की जीवन बचाने का अहम कारण बनी हुई है. Henrietta की ओर से यह पुरस्कार उनके 87 साल के बेटे Lawrence Lacks ने लिया.

उन्हें सम्मानित करते हुए Dr Tedros ने कहा, ‘ मैं Henrietta Lacks को सम्मानित करते हुए बेहद गर्व महसूस कर रहा हूं. WHO इस बात को स्वीकार करता है कि इससे पहले के वर्षों में Henrietta के साथ वैज्ञानिक रूप से अन्याय किया गया. उनके अश्वेत रंग और महिला होने की वजह से उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं दिया गया. जबकि मानवता को बचाने और मेडिकल साइंस को बढ़ावा देने में उनका बेहद अहम योगदान रहा.’

सर्वाइकल कैंसर से हो गई थी मौत

DNA की रिपोर्ट के मुताबिक Henrietta Lacks अपने पति और 5 बच्चों के साथ खुश थी. एक दिन उसे वजाइना में भारी ब्लीडिंग की शिकायत हुई. वह पति के साथ जॉन होपकिंस यूनिवर्सिटी पहुंची और वहां एडमिट हो गई. जांच में पता चला कि उसे सर्वाइकल कैंसर था. डॉक्टरों ने उसका इलाज करने की कोशिश की लेकिन उसने 4 अक्टूबर 1951 को दम तोड़ दिया. जब उसकी मौत हुई, उस समय उसकी उम्र केवल 31 साल थी.

बिना पूछे डॉक्टरों ने निकाल ली थी कोशिका

जब Henrietta का इलाज चल रहा था, उस दौरान डॉक्टरों ने उसके ट्यूमर के कुछ सैंपल लिए थे. इस दौरान ट्यूमर से ‘HeLa’ कोशिका को निकाला गया. ऐसा करने के लिए मरीज या उनके पति से कोई अनुमति नहीं ली गई थी. इसके बाद उस कोशिका का लैब में विकास किया गया. फिर बिना परिवार की परमीशन के उस कोशिका का लैब में बड़े पैमाने पर उत्पादन करके बेचा गया. दुनियाभर में कोशिकाओं पर हो रही स्टडी के लिए 50 करोड़ मीट्रिक टन ‘HeLa’ कोशिका की बिक्री की गई.

कोशिका से लाखों लोगों की बची जान

यह ‘HeLa’ कोशिका लोगों की जान बचाने में रामबाण सिद्ध हुई. इस कोशिका का अध्ययन करके दुनियाभर के वैज्ञानिक HPV वैक्सीन, पोलियो वैक्सीन, HIV/AIDS की दवा, haemophilia, leukaemia और पार्किंसंस रोगों की दवा बनाने में कामयाब रहे. इसके साथ ही कैंसर, जीन मैपिंग, IVF जैसी इलाज की पद्धतियों का भी विकास तेज हुआ. जिनका इस्तेमाल करके दुनिया में अब तक लाखों लोगों की जान बचाई जा सकी है.

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अमेरिकी डॉक्टरों को मिली बड़ी सफलता,मानव शरीर में सुअर की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट

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 वैज्ञानिकों को मानव शरीर में सुअर की किडनी ट्रांसप्लांस करने में बड़ी सफलता मिली है। तमाम परीक्षणों के बाद अब डॉक्टरों ने बताया कि कि मानव शरीर में सुअर की किडनी सुचारू रूप से काम कर रही है और ट्रांसप्लांट पूरी तरह से सफल रहा है। यह बड़ी सफलता अमेरिकी डॉक्टरर्स को मिली है, जिससे अब मानव शरीर में ट्रांसप्लांट करने के लिए मानव अंगों की कमी को दूर किया जा सकता है। ऐसा पहली बार संभव हुआ है जब मानव शरीर शरीर में किसी दूसरे प्राणी की किडनी का सफल प्रत्यारोपण किया गया है। हालांकि इससे पहले भी ऐसे कई प्रयोग किए गए हैं लेकिन शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र बाहरी अंगों को स्वीकार नहीं करता है और ट्रांसप्लांट सफल नहीं हो पाता है। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब सुअर की किडनी को मानव शरीर में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया है और शरीर ने भी सफलतापूर्णक ग्रहण कर लिया है।

इस पूरी परीक्षण प्रक्रिया में न्यू यॉर्क सिटी में एनवाईयू लैंगन हेल्थ में एक सुअर पर परीक्षण किया गया और उसके जीन को सबसे पहले बदला गया, ताकि मानव शरीर सुअर के अंग को खारिज नहीं करें। इसके बाद सुअर की किडनी को एक ब्रैन डेड मरीज में ट्रांसप्लांट कर दिया गया। डॉक्टरों ने बताया कि ब्रैन डेड मरीज की किडनी ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया था और परिवार के सदस्यों ने भी लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने से पहले परीक्षण की अनुमति दे दी थी।
डॉक्टरों ने बताया कि 3 दिन तक सुअर की किडनी को मानव शरीर की रक्त वाहिकाओं से जोड़कर रखा गया था और जब सफल परिणाम दिखे तो किडनी को ट्रांसप्लांट कर दिया गया। अमेरिका में यूनाइटेड नेटवर्क फॉर ऑर्गन शेयरिंग के मुताबिक फिलहाल दुनियाभर में 107000 लोग ऑर्गन ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं और इसमें भी करीब 90 हजार ऐसे लोग हैं, जो सिर्फ किडनी ट्रांसप्लांट कराना चाहते हैं। एक किडनी ट्रांसप्लांट कराने के लिए औसतन करीब 3 से 5 साल का इंतजार करना पड़ता है।

 

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देश - दुनिया

मुंबई की 60 मंजिला इमारत में लगी आग, दहशत में शख्स ने 19वीं मंजिल से लगाई छलांग, मौत

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देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की एक 60 मंजिला इमारत में शुक्रवार को आग लग गई। कर्री रोड पर स्थित अविघ्न पार्क इमारत में लगी आग को बुझाने के लिए दमकल कर्मी मौके पर पहुंचे हैं। इस बीच एक शख्स की 19वीं मंजिल से कूदने से मौत होने की भी खबर है। कहा जा रहा है कि आग लगने से दहशत में आए शख्स ने 19वीं मंजिल से छलांग दी, जिसमें उसकी मौत हो गई। 30 वर्षीय युवक को तत्काल केईएम अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके अलावा एक अन्य घायल शख्स को अस्पताल में इलाज के लिए एडमिट कराया गया है।

आग के डर से रेलिंग पकड़कर लटका था सुरक्षागार्ड, गिरने पर मौत

फायर ब्रिगेड के एक अधिकारी ने बताया कि मृतक अरुण तिवारी बिल्डिंग में ही सुरक्षा गार्ड के तौर पर तैनात थे। इमारत की 19वीं मंजिल में आग लगी तो वह भागकर वहीं पहुंच गया। कुछ देर में उसे अंदाजा हुआ कि वह फंस गया है और फिर खुद को आग से बचाने के लिए वह बालकनी पर लटक गया था। लेकिन कुछ देर में रेलिंग पर उसकी पकड़ ढीली हो गई और वह नीचे गिर गया। जमीन पर गिरते ही तिवारी को केईएम अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

शहर की मेयर किशोरी पेडनेकर ने बताया कि अब भी दो लोग इमारत में फंसे हुए हैं, जबकि अन्य लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है। रिपोर्टर्स से बात करते हुए म्युनिसिपल कमिश्नर इकबाल सिंह चहल ने बताया कि आग पर काबू पा लिया गया है और फिलहाल कूलिंग ऑपरेशन चल रहा है। आग लगने की यह घटना कैसे हुई, इसकी जांच के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा।

दोपहर 12 बजे के करीब लगी थी आग, वजह का पता नहीं

बचावकर्मियों की ओर से लोगों को सुरक्षित निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं। मुंबई पुलिस और फायर ब्रिगेड की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक यह आग दोपहर के 12 बजे के करीब लगी थी। इसे बुझाने के लिए एक दर्जन से ज्यादा फायर टेंडर्स, 5 जम्बो टैंकर मौके पर पहुंचे थे। बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है।

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देश - दुनिया

अब छुट्टी के दौरान हमले में सैनिकों की मौत को ऑन ड्यूटी माना जाएगा, मोदी सरकार का बड़ा फैसला

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एक स्पष्टीकरण जारी किया है। अवकाश  के दौरान सैनिकों पर हमले को लेकर रक्षा मंत्रालय ने एक स्पष्टीकरण जारी किया  यदि छुट्टी पर गए किसी सैनिक पर चरमपंथी या असामाजिक तत्वों द्वारा हमला होता है और उसमें उसकी मृत्यु हो जाती है, तो ऐसे मामलों को ड्यूटी के दौरान हुई मृत्यु माना जाएगा।

उसके परिजन उसी प्रकार के मुआवजे के हकदार होंगे जो ड्यूटी करने के दौरान मृत्यु होने पर दिए जाते हैं।हाल में जारी आदेश में कहा गया है कि इसमें अभी तक कई मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। यदि कोई सैनिक छुट्टी पर अपने घर आया हुआ है या कहीं और भी गया हुआ है। इस दौरान चरमपंथी या असामाजिक तत्वों द्वारा उसे हमले में मार दिया जाता है तो उसे ड्यूटी पर तैनात माना जाएगा। उसके परिजन उसी प्रकार के मुआवजे के हकदार होंगे जो ड्यूटी करने के दौरान मृत्यु होने पर दिए जाते हैं।आदेश में कहा गया है कि छुट्टी से तात्पर्य उन सभी प्रकार की छुट्टियों से है जो सरकार की तरफ से सैन्यकर्मियों को प्रदान की जाती हैं। दरअसल, पिछले कुछ समय के दौरान सैन्यकर्मियों पर हमले बढ़े हैं। खासकर जब वह अवकाश पर थे। हालांकि, ऐसी घटनाएं कश्मीर में ज्यादा हुई हैं। लेकिन सरकार की तरफ से इस मामले में स्पष्टीकरण जारी कर सैन्यकर्मियों को राहत प्रदान की गई है।

मंत्रालय ने यह तर्क दिया

तर्क दिया गया है कि यदि सैन्यकर्मी पर अवकाश के दौरान चरमपंथियों या असामाजिक तत्वों का हमला होता है तो इसकी वजह यही हो सकती है कि उसके सैन्यकर्मी होने के कारण उस पर हमला किया गया। जिसमें उसकी जान चली गई। इसलिए वह इस लाभ का हकदार है।
निजी दुश्मनी में मृत्यु पर लाभ नहीं

हालांकि, छुट्टी के दौरान सैनिक की निजी दुश्मनी की वजह से उस पर कोई हमला होता है और उसमें उसकी मृत्यु हो जाती है तो इसे ड्यूटी के दौरान हुई मौत नहीं माना जाएगा। ऐसे मामले में ड्यूटी के दौरान हुई मृत्यु के तहत मुआवजा नहीं मिलेगा।

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