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आज सैनिटरी पैड्स और पीरियड्स पर बातें होने लगी हैं, अब सवाल ये उठता है कि इसे डिस्पोज करने का सही तरीका क्या है?

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सेमिनार, वर्कशॉप और शॉर्ट फिल्म्स की देन है कि आज सैनिटरी पैड्स और पीरियड्स पर बातें होने लगी हैं। फिर भी भारत में आज महिलाओं, टीन-एजर्स का एक बड़ा तबका ऐसा है, जो इस पर बात करने से कतराता है। इसे खरीदने से लेकर डिस्पोज करने तक में उनकी हिचक अक्सर दिख जाती है।

इस पर बात करने वाली लड़कियों को फूहड़ और बेशर्म कहा जाता है। ऐसे में सोचिए, जब मेंसट्रूअल प्रॉब्लम्स पर बात करने में इतनी हिचकिचाहट होती है, तो इसमें इस्तेमाल किए गए गंदे, बदबूदार नैपकिन्स को डिस्पोज करने की बात लोगों को कितनी गैर-जरूरी लगती होगी! इस गंभीर विषय पर बात करने के लिए आज हमारे साथ जुड़ी हैं डॉ. श्रद्धा सुमन, जो बताएंगी सैनिटरी पैड्स को डिस्पोज करते हुए हमें किन बातों का ख्याल रखना चाहिए।

मेंसट्रूअल कप्स का बाजार हर दिन बढ़ता जा रहा है, जो कि सिलिकन से बना होने के साथ-साथ रिसाइक्लेबल भी होता है। इसके साथ ही टैम्पोन के विकल्प भी बाजार में मौजूद हैं, फिर भी कई महिलाएं इसके इस्तेमाल को लेकर श्योर नहीं होती हैं। उन्हें सैनिटरी पैड्स की बजाय कप्स का इस्तेमाल में असहजता महसूस होती है। एक ओर जहां प्लास्टिक वेस्ट को कम करने की बात उठ रही है, वहीं दूसरी ओर पैड्स को गलत तरीके से डिस्पोज करने की वजह से ये कचरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

अब सवाल ये उठता है कि इसे डिस्पोज करने का सही तरीका क्या है? क्योंकि हम में से ज्यादातर महिलाओं ने इसे इस्तेमाल करना तो सीख लिया है, लेकिन इसे डिस्पोज करने का सही प्रक्रिया हमारी जानकारी से कोसों दूर है।

क्या होता है इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड्स का?

नैपकिन्स की ऊपरी लेयर पॉलीप्रोपोलीन से बनी होती है। जबकि ब्लड सोखने के लिए इसमें वुड पल्प को सुपर एबसोर्बेंट पॉलीमर्स के साथ मिलाया जाता है, जिससे पैड लीक प्रूफ बना रहे। जिन कूड़े के ढेर में हम पैड्स डिस्पोज करते हैं, उन्हें एक एक जगह इक्कठा करके बायोडिग्रेडेबल और नॉन बायोडिग्रेडेबल वेस्ट के तौर पर अलग किया जाता है। आप जानकर हैरान रह सकती हैं कि ये करने का काम किसी मशीन का नहीं, बल्कि आपके-हमारे जैसा इंसान का होता है। इस काम को करते हुए कई बार वे संक्रमण और गम्भीर बिमारियों के शिकार हो सकते हैं।

डॉ श्रद्धा सुमन कहती हैं कि भारत एक बड़ी आबादी वाला देश है, जहां कूड़ा डिस्पोज करने के सही तरीके से ज्यादातर लोग अनजान हैं, कूड़ा शहर से बाहर कहीं दूर लैंडफिल्स में डंप कर दिया जाता है । अब भी 20 से 30% लैंडफिल्स में इसी तरह का कचरा होता है, जो हमारे मेंसट्रूअल पीरियड्स में इस्तेमाल होता है।

पैड डिस्पोजिंग का ये तरीका पहुंचाता है प्रकृति को नुकसान

पैड को जलाने से बचें। इसमें मौजूद प्लास्टिक हवा में ज्यादा से ज्यादा कार्बन फूट-प्रिंट जेनेरेट करता है।

लोग इसे न्यूज पेपर में लपेट कर फेंकते हैं। पेपर में मौजूद लीड की वजह से सॉइल पॉल्युशन बढ़ता है।

क्या है डिस्पोजिंग का सही तरीका?

अगर हम अपने घरों में ही पैड्स को गीले कचरे के डब्बे में डाल दें, तो वो री-सायकल हो सकता है।

पैड डिस्पोज करते समय सफेद कागज या टिश्यू का इस्तेमाल करें। यूज किए हुए पैड को इसमें अच्छी तरह लपेटकर लाल पेन या मार्कर से क्रॉस का निशान बना दें, जिससे पता चल सके कि इसमें यूज्ड पैड है।

Lifestyle

त्रिफला चूर्ण खाने के तीन बड़े नुक्सान ये रहे जानिए

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Triphala Churna side Effects: आयुर्वेदिक और हर्बल में उपचार के लिए त्रिफला का इस्तेमाल सदियों से किया जा रहा है. त्रिफला के अगर फायदे हैं, तो कुछ नुकसान भी, जो कई तरह के हो सकते हैं.

Triphala Churna side Effects-त्रिफला का नाम तो हर किसी ने सुना होगा. कई तरह की बीमारी के दौरान भी इसे लेते हुए देखा होगा. सदियों से त्रिफला को आयुर्वेदिक और हर्बल उपचार के तौर में इस्तेमाल में लाया जा रहा है. आंवला, बिभिताकि और हरीताकी ये तीन फलों से मिलकर त्रिफला को तैयार किया जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, त्रिफला खाने से कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में किया जा सकता है. त्रिफला खाने से हेल्थ को कई फायदे मिल सकते हैं. त्रिफला बाजार में चूर्ण, कैप्सूल और जूस के अर्क के रूप में आसानी से मिल जाता है. त्रिफला चूर्ण के वैसे तो कई फायदे हैं, लेकिन इसे खाने से पहले अगर सावधानी नहीं बरती गई तो इसके नुकसान भी झेलने पड़ सकते हैं.

त्रिफला चूर्ण के नुकसान

हो सकता है ब्लड शुगर लो
स्टाइलक्रेज़ के मुताबिक, त्रिफला में डायबिटीज से लड़ने के गुण होते हैं. जो मरीज पहले से ही डायबिटीज कि दवाएं ले रहे हैं, उन्हें त्रिफला खाने से हाइपोग्लाइसीमिया हो सकता है, जो ब्लड शुगर को काफी लो कर सकता है. अगर डायबिटीज के मरीज हैं तो त्रिफला चूर्ण खाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें.

दवाओं का असर हो सकता है कम
त्रिफला कई तरह की दवाओं का असर कम कर सकता है, जिससे लिवर को नुकसान पहुंच सकता है. दवाओं के साथ त्रिफला का सेवन करने से पहरेज करना चाहिए. इसके अलावा मूड खराब, एनर्जी में कमी और नींद की समस्या भी हो सकती है.

प्रेगनेंसी में हो सकती है समस्या
प्रेगनेंसी के दौरान त्रिफला चूर्ण के सेवन से कई तरह की समस्याएं देखने को मिल सकती हैं. इससे मिसकैरेज तक हो सकता है. त्रिफला चूर्ण के सेवन से पहले महिलाओं को डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए. त्रिफला चूर्ण को खाने से पहले इसकी सही मात्रा के बारे में जानकारी होना जरूरी है.

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आंसू निकलना भी होता है फायदेमंद जानिए, कैसे

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Eye Health: अभी तक आपने सुना होगा कि हंसना सेहत के लिए फायदेमंद होता है लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं कि रोने के भी बहुत से फायदे हैं.

Eye Care Tips: अगर हंसना-मुस्कराना सेहत (Health) के लिए अच्छा माना जाता है तो रोना भी कहीं से खराब नहीं. जितने ज्यादा फायदे हंसने के है, रोने के भी उतने ही फायदे (Benefits of Tears) माने जाते हैं. फिर चाहे आप किसी मूवी या सीरियल को देख इमोशनल हो रहे हैं या फिर प्याज काटते वक्त आपके आंसू निकल रहे हों.

रिसर्च कहती है कि आपकी हेल्दी आंखों के लिए आंसू काफी जरूरी है. यह आपकी आंखों को गीला और चिकना रखते हैं. इंफेक्शन और गंदगी से भी बचाते हैं. ये आपकी आंखों को साफ रखते हैं और हेल्दी भी बनाते हैं. तो यहां जानिए आखिर क्यों निकलते हैं आंसू और इसके क्या-क्या होते हैं फायदे..

आंसू क्यों निकलते हैं?
इंसान के रोने के पीछे पूरी तरह से साइंस (Science) काम करता है. जब हम या आप इमोशनल (Emotional) होते हैं, प्याज का कोई तीखी चीज काटते हैं, आंखों में कुछ चला जाता है तब आंसू निकलते हैं. आंसू आंख की अश्रु नलिकाओं से निकलने वाला तरल पदार्थ है, जो पानी और नमक के मिश्रण से बना होता है. इसमें तेल, बलगम और एंजाइम नामक केमिकल भी पाया जाता है, जो कीटाणु को मार हमारी आंखों को हेल्दी रखता है.

तीन तरह के होते हैं आंसू
आप नहीं जानते होंगे कि इंसान की आंखों से तीन तरह के आंसू निकलते हैं. चलिए बताते हैं
Basal Tears- इस तरह के आंसू आंखें झपकने पर निकलते हैं. ये आंखों में नमी बनाए रखने का काम करते हैं. ये नॉन-इमोशनल आंसू होते हैं.
Reflex Tears– ये भी नॉन-इमोशनल आंसू ही होते हैं. ये आंखों के हवा, धुएं, घूल के पड़ने से आते हैं.
Emotional Tears- दुख, निराशा, गम होने पर जो आंसू निकलते हैं वे इमोशनल आंसू होते हैं.
आंसुओं के फायदे ही फायदे
नीदरलैंड्स की स्टडी के मुताबिक रोने से आप रिलैक्स फील करते हैं और आपका मूड अच्छा होता है.
आंसू में लाइसोजोम (Iysozyme) नाम का फ्लूइड पाया जाता है, जिसमें एंटीबैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं. यह हमारी आंखों को संक्रमण से बचाता है और आंखों को साफ करता है.

रोने से इमोशन कंट्रोल होती हैं और मानसिक तनाव से राहत मिलती है
रोने से बॉडी में ऑक्सीटोसिन और एंडोर्फिन हॉर्मोन बनते हैं जो शारीरिक और भावनात्मक दर्द से आराम दिलाते हैं.
आंसू निकलनेसे आंखें सूखती नहीं और उसकी नमी बरकरार रहती  है, जिससे आखों की रोशनी बढ़ती है.
जब कोई शख्स आंखें झपकाता है, तो बेसल टियर निकलती हैं तो म्यूकस में ब्रेन को सूखने से बचाते हैं.
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क्या आप भी AC का टेंपरेचर 24 -25 से कम रखते है तो हो जाइये सावधान

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Best Temperature For Ac: गर्मी में एसी चलाने से राहत मिल जाती है, लेकिन ज्यादा कम तापमान पर एसी चलाना सेहत को नुकसान देता है, जानिए कितने तापमान पर चलाना चाहिए AC और ज्यादा AC में रहने के नुकसान.

AC Temperatures Harmful: बारिश के मौसम में ह्यूमिडिटी सबसे ज्यादा परेशान करती है. ऐसे में पसीना और चिपचिपाहट से सिर्फ एसी में बैठने पर ही राहत मिलती है. कुछ लोगों को इतनी गर्मी लगती है कि वो एसी के ठीक सामने बैठना या सोना ही पसंद करते हैं और एसी का टेंपरेचर भी 18-20 ही रखते हैं. अगर आप भी ऐसा करते हैं तो सावधान हो जाएं. एसी को बहुत कम टेंपरेचर पर चलाना आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है. इससे आपके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. आइये जानते हैं एसी को किस टेंपरेचर पर चलाना चाहिए और ज्यादा कम पर एसी चलाने से क्या नुकसान होते हैं.

24-25 डिग्री पर ही एसी चलाएं
एक्सपर्ट्स का कहना है कि आपको एसी 24-25 डिग्री पर चलाना चाहिए. इससे कम एसी चलाकर रखना आपके स्वास्थ्य पर विरपरीत असर डालता है. सर्दी हो या गर्मी बाहर से तापमान से कमरे या घर के तापमान में एक्सट्रीम बदलाव नहीं होना चाहिए. हमारे शरीर के तापमान की तुलना में बहुत कम तापमान पर सेट किए गए एसी कमरे से नमी को गायब कर देते हैं. जिससे त्वचा को नुकसान होता है. ऐसे में त्वचा से पसीना कम निकलता है और ऑयल ज्यादा निकलने लगता है. इससे मुँहासे, समय से पहले झुर्रियाँ और त्वचा में जलन पैदा हो सकती है. एक्सट्रीम हाई टेंपरेचर में त्वचा के पोर्स बंद हो सकते हैं, जिससे स्किन के फंक्शन पर असर पड़ता है.

कम टेंपरेचर पर एसी चलाने के नुकसान

ज्यादा तापमान पर एसी चलाने से शरीर का थर्मल रेगुलेशन प्रभावित होता है.
ठंडी और ड्राई हवा में वायरस और जर्म्स जल्दी पैदा होते हैं और फैलते हैं.
ज्यादा कम एसी चलाने से अस्थमा और माइग्रेन की समस्या बढ़ सकती है.
जो लोग ज्यादा AC में रहते हैं वो समय से पहले बूढ़े लगने लगते हैं. ऐसे लोगों की त्वचा पर जल्दी झुर्रियां आने लगती हैं.
बालों का झड़ना, नाक बंद होना और गला सूखने जैसी परेशानियां होती हैं.

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