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गर्मी का कहर बढ़ते ही लोगो के सेहत में पड़ने लगा असर, बड़ने लगे डिहाइड्रेशन के मरीज….

गर्मी का पारा बढ़ा तो उल्टी, दस्त के साथ डिहाइड्रेशन के मरीज बढ़ने लगे। बच्चे ज्यादा चपेट में आ रहे हैं। डॉक्टर अपनी भाषा में इसे इंफेक्टिव डायरिया कहते हैं। पिछले 10 दिनों में सिम्स, जिला अस्पताल सहित सभी सरकारी और निजी अस्पताल में 8500 बच्चे उल्टी, दस्त की चपेट में आने के बाद इलाज के लिए पहुंचे। 25% यानी 2100 से ज्यादा बच्चों की हालत नाजुक हो गई थी, जिनका भर्ती कर डॉक्टरों ने इलाज किया। अधिकांश ठीक होकर डिस्चार्ज हो गए। लेकिन अभी भी 450 से ज्यादा बच्चे अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं।
जिनका इलाज चल रहा है। बड़ों की बात करें पिछले 10 दिनों से रोज औसत 350 लोग उल्टी-दस्त और डिहाइड्रेशन से परेशान होकर अलग-अलग अस्पतालों की ओपीडी में इलाज के लिए पहुंचे। मरीजों में 65% बुजुर्ग हैं, जिनकी उम्र 60 वर्ष से अधिक है। अच्छी बात यह है कि 97% मरीज दवाइयों से ही ठीक हो गए।
सिर्फ 3 प्रतिशत मरीजों की हालत गंभीर हुई जिनका भर्ती कर इलाज किया गया। राहत की बात है अभी तक गर्मी के कारण उल्टी-दस्त से किसी की कैजुअल्टी नहीं हुई। डॉक्टरों का कहना है कि गर्मी के कारण लोग उल्टी-दस्त से बीमार हो रहे हैं, लेकिन दवाइयों से ठीक भी हो रहे हैं। बच्चों को ठीक होने में पांच दिन लग रहे हैं तो बड़े तीन दिन में ठीक हो रहे हैं। गर्मी से बचाव करें ताकि आप बीमार न पड़ें।
10-15 दिनों तक ऐसी परेशानी रहेगी
उल्टी-दस्त के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारा शरीर अभी तापमान को नहीं सहन कर पा रहा है। दूसरा इस मौसम में बैक्टीरिया और वायरस तेजी से लोगों को बीमार करते हैं। अभी 10 से 15 दिन लोगों को परेशानी होगी। इसके बाद इस मौसम में हम ढलने लगेंगे।
घर पर ही जिंक और ओआरएस लें
पहले बच्चों को उल्टी-बुखार होता है। फिर 12 से 24 घंटे बाद पतले दस्त होने लगते हैं। चूंकि उल्टी, दस्त और बुखार तीनों परेशानी होती है इसलिए शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इसे इंफेक्टिव डायरिया और डिहाइड्रेशन कहते हैं। जिनकी हालत गंभीर नहीं हैं वो ओआरएस का घाेल और जिंक दवा घर पर बिना किसी की सलाह के ले सकते हैं। अगर हालत ज्यादा बिगड़ी है तो डॉक्टर से संपर्क करें। अभी मरीजों को ठीक होने में पांच दिन लग रहे हैं।
-डॉ.अशोक अग्रवाल, शिशु रोग विशेषज्ञ
गर्मी में बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं
गर्मी में पानी भी प्रदूषित हो जाता है। खाना भी जल्दी खराब हो जाता है। इस स्थिति में हमारे शरीर में जब बैक्टीरिया प्रवेश करता है तो पहले उल्टी होती है, इसके बाद पेट दर्द और फिर पतले दस्त होने लगते हैं। कच्चा खाना हमारे लिए हानिकारक है। लोग सोचते हैं कि जूस गर्मी में काफी लाभदायक होता है लेकिन जूस कच्चा होता है इसलिए वह नुकसानदायक होता है। घबराने की बात नहीं है बच्चा अगर सुस्त हो रहा है और 6 घंटे ते पेशाब नहीं हुई तो उसे डॉक्टर को जरूर दिखाएं। बचाव के लिए ओआरएम का घोल पीते रहें।
डॉ.सुशील कुमार, शिशु रोग विशेषज्ञ
ग्लूकोज और ओआरएस की खपत बढ़ी
गर्मी से बचाव के लिए लोगों ने ग्लूकोज और ओआरएस का उपयोग शुरू कर दिया है। ग्लूकोज और ओआरएस सहित सभी एनर्जी ड्रिंक की खपत तीन गुना बढ़ गई है। जिला औषधि विक्रेता संघ के पीआरओ हीरानंद जयसिंह का कहना है कि सामान्य दिनों में रोज 100 से 50 डिब्बे अलग-अलग ब्रांड के ग्लूकोज और ओआरएस बिकते थे लेकिन अब 400 से 450 डिब्बे रोज बिक रहे हैं।

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Heart Attack Treatment : हार्ट अटैक से बचना है तो करें,ये 5 काम..नहीं आयेगा कभी अटैक

Heart Attack Treatment: बदलती लाइफस्टाइल और खान-पान के चलते आज के समय में अपने आपको फिट रख पाना मुश्किल होता जा रहा है. तो आइए जानते हैं कि आपको ऐसे कौन-से काम करने चाहिए, जिससे हार्ट अटैक के जोखिम को कम किया जा सके.
Heart Attack Treatment For Healthy life: फिट रहने के लिए हार्ट को भी फिट रखना बेहद जरूरी है. सभी जानते हैं कि देश में ज्यादातर लोगों की जान हार्ट अटैक से जाती है. ऐसे में अपने आपको हेल्दी रखने के लिए विशेष ध्यान रखना पड़ता है. आइए जानते हैं कि हार्ट को हेल्दी रखने के लिए आपको ऐसे कौन-से 6 काम करने चाहिए, जिससे हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती है.
1. धूम्रपान न करें
धूम्रपान बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से आपका हार्ट अटैक का जोखिम कम हो जाता है. यदि आपको धूम्रपान की बहुत ज्यादा आदत हो चुकी है तो धीरे-धीरे इस आदत को छोड़ दें.
2. रोज करें मेडिटेशन
मेडिटेशन को अपनी अपनी लाइफ में शामिल कर लें. क्योंकि हार्ट को हेल्दी रखने के लिए मेडिटेशन करना बेहद जरूरी है. योग की मदद से स्ट्रेस लेवल कम होता है. रोजाना मेडिटेशन करने से माइंड भी शांत रहता है, जिससे हार्ट अटैक का जोखिम भी कम होता है.
3. नींद पूरी लें
अगर आप नींद पूरी लेंगे तो आपको हार्ट अटैक का रिस्क कम हो जाता है. दरअसल, हार्ट को हेल्दी रखने के लिए रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद पूरी करना चाहिए. नींद पूरी नहीं होने से भी तनाव बढ़ता है, जिससे हार्ट अटैक रिस्क भी बढ़ जाता है. ऐसे में कोशिश करें कि आप नींद पूरी लें.
4.वजन रखें कंट्रोल
वजन कंट्रोल करना भी बेहद जरूरी है. क्योंकि वजन बढ़ने से आपको कई तरह की बीमारियां घेरने लगती हैं. ऐसे में कोशिश करें कि एक्स्ट्रा शुगर का सेवन न करें.
5. बीएमआई और हार्ट रेट नोट करें
इसके साथ ही बीएमआई और हार्ट रेट को नोट करते रहें. अगर आपका बीएमआई 25 से ज्यादा है और कमर 35 इंच से ज्यादा है तो आपको हार्ट हेल्थ का खतरा हो सकता है. ऐसे में आपको एक्सरसाइज करनी की आदती डालनी होगी.
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क्या आपका बच्चा भी सुनता नहीं सिर्फ देखता रहता है,तो हो सकती हैं मिर्गी का लक्षण….
पर्पल डे ऑफ एपिलेप्सी हर साल 26 मार्च को मनाया जाता है। इसका लक्ष्य लोगों को एपिलेप्सी यानी मिर्गी के बारे में जागरूक करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में 5 करोड़ लोगों को मिर्गी के दौरे आते हैं। इनमें बच्चे भी शामिल हैं। वहीं इस बीमारी के 80% मामले लो और मिडिल इनकम देशों में पाए जाते हैं।
भारत की बात करें तो यहां एपिलेप्सी टॉप 3 न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स में से एक है। छोटे बच्चों में चाइल्डहुड एब्सेंस एपिलेप्सी होना आम है। ये बचपन में होने वाला एपिलेप्सी सिंड्रोम है। इस कंडीशन में बच्चों को कब और कैसे दौरे आते हैं, ये समझने के लिए हमने अपोलो हॉस्पिटल अहमदाबाद के कसल्टेंट पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. आनंद अय्यर से बात की।
सवाल: चाइल्डहुड एब्सेंस एपिलेप्सी क्या है?
जवाब: चाइल्डहुड एब्सेंस एपिलेप्सी एक ऐसी कंडीशन है जिसमें स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों को बार-बार मिर्गी के सीजर (दौरे) आते हैं। ये बचपन में होने वाला एक कॉमन डिसऑर्डर है।
सवाल: बच्चों को ये सीजर किस उम्र में आते हैं?
जवाब: एब्सेंस सीजर आमतौर पर 4 से 7 साल के बच्चों को आते हैं। इसकी ज्यादातर शिकार बच्चियां होती हैं। टीनएज में सीजर आने पर बच्चों को जुविनाइल सीजर के लिए जांचा जा सकता है।
सवाल: पेरेंट्स बच्चों में सीजर कैसे पहचान सकते हैं?
जवाब: एक सीजर 5 से 15 सेकंड तक चल सकता है। ये दिन में 30 से 40 बार तक भी हो सकता है। सीजर एकदम से शुरू होकर एकदम से खत्म भी हो जाता है। इसके बाद बच्चा ऐसा व्यवहार करता है जैसे कुछ हुआ ही न हो। बच्चा कुछ देर के लिए कंफ्यूज भी हो सकता है। ये सीजर बच्चों के दिमाग को डैमेज नहीं करते।
सवाल: चाइल्डहुड एब्सेंस एपिलेप्सी का क्या इलाज है?
जवाब: एंटी-सीजर दवाओं से एपिलेप्सी को कंट्रोल किया जा सकता है। हर 10 में से 7 बच्चों के दौरे इसी तरह कंट्रोल में आते हैं। सीजर से पूरी तरह मुक्ति पाने के लिए 2 से 2.6 सालों तक इलाज करना जरूरी है।
सवाल: क्या चाइल्डहुड एब्सेंस एपिलेप्सी से बच्चों में दूसरी समस्याएं हो सकती हैं?
जवाब: इस डिसऑर्डर से जूझ रहे ज्यादातर बच्चों का विकास नॉर्मल तरीके से होता है। हालांकि कुछ में ये बीमारी पढ़ने-लिखने में बाधा डाल सकती है। साथ ही उन्हें फोकस करने में परेशानी हो सकती है। उनकी पर्स्नालिटी भी हाइपरएक्टिव हो सकती है।
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खाने पीने की चीजो के सेवन से हो रही हमारे शरीर मे प्लास्टिक की एंट्री हो सकती है बड़ी परेशानी
प्लास्टिक को बंद करने और इसके इस्तेमाल को रोकने के लिए दुनिया भर में अलग-अलग अभियान चलाए जा रहे हैं। कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि समुद्री जीवों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक पहुंच रहा है, जिससे उनकी मौत हो रही है।
अब नीदरलैंड्स के वैज्ञानिकों ने एक चौंकाने वाली रिसर्च की है। उन्होंने इंसान के खून में भी प्लास्टिक के टुकड़े ढूंढ निकाले हैं। ऐसा दुनिया में पहली बार हुआ है। ये टुकड़े दिखने में बहुत छोटे यानी माइक्रोप्लास्टिक हैं। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 22 लोगों के नमूने लिए थे, जिनमें से 17 के खून में प्लास्टिक के पार्टिकल पाए गए। इस बात को बेहद चिंताजनक बताया जा रहा है।
पहले जान लें, क्या होता है माइक्रोप्लास्टिक?
माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर या इससे कम आकार के छोटे प्लास्टिक के टुकड़े होते हैं। यह इतने छोटे होते हैं कि बिना मैग्निफाइंग ग्लास के इन्हें आंखों से देख पाना मुश्किल है। वैज्ञानिक अभी भी इन छोटे पार्टिकल्स के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। ये पानी, खाने के सामान और जमीन की सतह जैसी जगहों में मौजूद रहते हैं। इनके जरिए ये शरीर में पहुंचते हैं।
खून में मिले 5 तरह के माइक्रोप्लास्टिक
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों को इंसानों के खून में 5 तरह के प्लास्टिक मिले हैं। इनमें मुख्य रूप से पॉलीमेथाइल मेथैक्रिलेट (PMMA), पॉलीप्रोपाइलीन (PP), पॉलीस्टाइनिन (PS), पॉलीइथाइलीन (PE), और पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (PET) शामिल हैं।
शरीर में जा रहा बॉटल, फूड पैकेज का प्लास्टिक
इसके अलावा 23% लोगों में पॉलीइथाइलीन (PE) मिला, जो प्लास्टिक बैग में पाया जाता है। केवल एक व्यक्ति में पॉलीमेथाइल मेथैक्रिलेट (PMMA) मिला और किसी भी खून के नमूने में पॉलीप्रोपाइलीन (PP) नहीं था।
शरीर में ऐसे होती है प्लास्टिक की एंट्री
प्लास्टिक हवा के साथ-साथ खाने-पीने की चीजों से भी इंसान के शरीर में एंट्री कर सकता है। लोगों को यह पता ही नहीं होता कि प्लास्टिक के छोटे-छोटे पार्टिकल खाने, पानी पीने और सांस लेने के दौरान उनके शरीर के अंदर जा रहे हैं।
हो सकती हैं कई तरह की बीमारियां
कहते हैं एक्सपर्ट्स?
नीदरलैंड्स के व्रीजे यूनिवर्सिटी एम्स्टर्डम के प्रोफेसर डिक वेथाक ने कहा कि चिंतित होना उचित है क्योंकि माइक्रोप्लास्टिक के ये पार्टिकल इंसान के पूरे शरीर में भी जा सकते हैं। ये एक जानलेवा बीमारी का कारण भी बन सकते हैं। अभी इस विषय पर और रिसर्च की जरूरत है।
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