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छतीसगढ़

महंगी हो गई है बीपी, शुगर और अस्थमा जैसी बीमारियां की दवाइयां, आइये जानते है कहा मिलेगी सस्ती दवाइयां

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Blood pressure and sugar and asthma patients need to be more vigilant Jagran Special - Coronavirus: BP-शुगर और अस्थमा मरीजों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत

1 अप्रैल से बुखार, खांसी-जुकाम, शुगर, बीपी, अस्थमा,इन्फेक्शन, हाई ब्लड प्रेशर और एनीमिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाइयां महंगी हो गई। पैरासिटामॉल, फेनोबार्बिटोन, फिनाइटोइन सोडियम, एजिथ्रोमाइसिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन हाइड्रोक्लोराइड और मेट्रोनिडाजोल जैसी दवाओं की कीमतें भी बढ़ गईं। इस तरह से 800 दवाइयों के दाम 11% तक बढ़ गए।

नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने शेड्यूल दवाओं में 10.9 प्रतिशत दाम बढ़ने की घोषणा की है। जिन दवाओं के दाम बढ़ने की घोषणा की गई है इन्हें जरूरी दवाओं की कैटेगरी में गिना जाता है। एंटीबायोटिक्स, एंटी-इंफ्लेमेट्री ड्रग्स, कान-नाक और गले की दवाएं, एंटीसेप्टिक्स, पेन किलर, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल मेडिसिन और एंटी फंगल दवाएं शामिल हैं।

बढ़ती दवाइयों का रेट पता करने जब हम मेडिकल स्टोर पर गए तब हमारी मुलाकात दवाई लेने आए राम कृपाल से हुई। वो बताते हैं कि उन्हें शुगर और बीपी की समस्या है और उनकी पत्नी को न्यूरो की प्रॉब्लम है जिसके चक्कर में दवाई पर ज्यादा खर्च आता है। वो दस-दस दिन की दवाई लेते जो उन्हें 700 की पड़ती हैं और उनकी पत्नी की 900 की पड़ती हैं। इस हिसाब से देखें तो दोनों की दवाई का महीने का खर्च 4800 तक चला जाता है।

वे कहते हैं कि दवाई के रेट तो हमेशा कुछ न कुछ बढ़ते रहते हैं ऐसे में 11 प्रतिशत और बढ़े तो उनको घर खर्च चलाना मुश्किल होगा।

हर महीने जैसे ही सैलरी आती है उसका एक हिस्सा ज्यादातर परिवारों में दवाइयों के लिए रख दिया जाता है। ऐसे में दवाइयों की बढ़ती कीमत के बारे में पढ़कर आप अपने बजट को लेकर चिंतित होंगे। अगर आप भी इस महीने दवाई लेने जाएं तो राम कृपाल की तरह बढ़ते दाम की टेंशन न लें। हम यहां सॉल्यूशन दे रहे हैं उसे जरूर पढ़ें, यह आपके काम की है।

800 दवाओं में ये भी शामिल हैं-

एजिथ्रोमाइसिन – ₹120
सिप्रोफ्लोक्सासिन – ₹41
मैट्रोनिडाजोल – ₹22
पैरासिटामोल- (डोलो 650) – ₹31
फेनोबार्बिटोन – ₹19.02
फिनाइटोइन सोडियम – ₹16.90

अब चलिए जानते हैं कि

सस्ती दवा कहां से मिलेगी?

कुछ मेडिकल स्टोर वाले 15% से 20% तक छूट देते हैं तो ऐसी दुकान को चुनें जो आपको ज्यादा छूट दें।
ऑनलाइन 1mg, NetMeds, PharmEasy, LifCare, MyraMed जैसी कई वेबसाइट हैं जो दवाइयां डिस्काउंट रेट पर देती हैं। आप वहां से खरीद सकते हैं। आप इन वेबसाइट पर सस्ते विकल्प देख सकते हैं।
मोटे फायदे के लिए आजकल डॉक्टर अपना ही मेडिकल स्टोर खोल देते हैं और बिना किसी छूट के दवाई बेचते हैं तो ऐसे में वहां से दवाई लेने से बचें।
सरकारी अस्पताल से सस्ती दवाई ले सकते हैं।

 

मेडिकल स्टोर पर भी दो तरह की दवाइयां होती है एक ब्रांडेड दवाई होती है और एक सामान्य (जेनेरिक) दवाई होती है तो आप सामान्य दवाई ले सकते हैं।
सरकार ने सस्ती दवा के लिए हर जिले में जन औषधि केंद्र खोले हैं जिससे आप सस्ती दवाई ले सकते हैं।

सस्ती दवाई लेने का ऑप्शन जानने के बाद आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि जब हम ब्रांडेड की जगह जेनेरिक दवाई लेंगे तो क्या वह सही तरह से असर करेगी?
आपके दिमाग में आने वाले ऐसे की कुछ सवालों का जवाब देने के लिए हमने डॉ. बाल कृष्ण श्रीवास्तव से बात की।

सवाल: क्या होती हैं शेड्यूल दवाई? जिसका जिक्र बार-बार खबरों में किया जाता है।
डॉ. बालकृष्ण श्रीवास्तव: उन दवाइयों को शेड्यूल दवाई कहा जाता है जिसे आप डॉक्टर की सलाह और प्रेसक्रिप्शन के बिना खरीद नहीं सकते हैं। किस मात्रा में दवाई लेनी है यह डॉक्टर ही बताते हैं। इसकी कीमत केंद्र सरकार की अनुमति के बगैर नहीं बढ़ाई जा सकती है। यानी 1 अप्रैल से दवाई के दाम 11% तक बढ़े हैं। इसकी परमिशन केंद्र सरकार से मिली है।

सवाल: कम रेट वाली दवा का कितना असर होता है?
डॉ. बालकृष्ण श्रीवास्तव: एक डॉक्टर के लिए मरीज की कांउसिलिंग सबसे जरूरी होती है। उसके बाद आप उसे सामान्य (Generic) दवा भी दे दो वह भी काम करेगी। आपको पता होना चाहिए कि ज्यादातर बड़ी कंपनी एक ही दवा को जेनेरिक भी बनाती हैं और उसे महंगी भी बनाती है। असरदार दोनों बराबर होती हैं, बस उसके साथ लाइफस्टाइल में बदलाव भी जरूरी है।

यह भी समझ लें कि जेनेरिक दवाइयों से वह बीमारी नहीं जुड़ी है जो क्रिटिकल है। इसे ऐसे समझें– किसी की कीमो थैरेपी चल रही है। तो आप उसकी दवाई के साथ अपने मन से कोई बदलाव नहीं कर सकते हैं।

सवाल: जन औषधि केंद्र का कैसे पता करें?
डॉ. बालकृष्ण श्रीवास्तव: देश में अभी तक लगभग 600 जन औषधि केंद्र खोले जा चुके हैं, ऐसे में आप गूगल सर्च करके पता कर सकते हैं आपके घर के पास कौन सा जन औषधि केंद्र है। यह जन औषधि अभियान सरकार ने पब्लिक को अवेयर करने के लिए शुरू किया है। इसका मकसद लोगों को समझाना है कि जेनेरिक मेडिसिन कम प्राइस में मिलती है, लेकिन इसमें क्वालिटी से कोई समझौता नहीं किया जाता।

सवाल: इसके अलावा भी कहीं से सस्ती दवा मिल सकती है?
डॉ. बालकृष्ण श्रीवास्तव: हां बिल्कुल आज कल काफी एनजीओ भी इस तरह का काम कर रहे हैं। ये NGO फ्री में दवाई दिलाने में मदद करती है। आप अपने शहर में ऐसे NGO की तलाश कर सकते हैं। इसके साथ ही Indiamart, 1 mg ऐसी कई वेबसाइट भी हैं जो सस्ते में दवाई बेचती हैं।

सारी जानकारी मिलने के बाद भी आपके मन में एक सवाल अभी भी आ रहा होगा वह यह कि आखिर ये नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) क्या है?

क्या है नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA)?
राष्ट्रीय औषधि उत्पाद मूल्य प्राधिकरण (National Pharmaceutical Pricing Authority-NPPA) को 29 अगस्त, 1997 में स्थापित की गई थी। यह फार्मास्युटिकल दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करती है। यह औषधि उत्पाद विभाग (DoP), Ministry of Chemical Products and Fertilizers के अधीन स्वतंत्र कार्यालय के रूप में काम करता है।

चलते-चलते बताते हैं कि दवाई का रेट आखिर क्यों बढ़ा?
रॉ मटेरियल महंगा होने की वजह से नॉन शेड्यूल दवाई जिसका रेट तय करना सरकार के हाथ में नहीं होता वो पहले से ही महंगी हैं। जो शेड्यूल दवाइयां होती हैं इसका रेट सरकार होल सेल प्राइस इंडेक्स के आधार पर तय करती है। शेड्यूल दवाइयों के रेट पर सरकार का कंट्रोल होता है। पिछली साल का होल सेल प्राइस इंडेक्स 10.7 था। इस वजह से इस बार 800 दवाइयों पर 10% से 12% तक की बढ़ोत्तरी की गई। सरकार जो रेट तय करती है वह एक साल तक ही फिक्स रहता है।

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छतीसगढ़

गर्मी का प्रकोप बढ़ा : अप्रैल में टूट सकता है रिकॉर्ड

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इस बार तपाएगी भीषण गर्मी, IMD की चेतावनी, इन राज्यों में दिखेगा सूर्य का रौद्र अवतार

 

अप्रैल महीने का आखिरी पश्चिमी विक्षोभ कश्मीर में दस्तक दे चुका है। इसकी वजह से अगले 2 दिन तक पहाड़ों से मैदान तक तापमान में 2 से 3 डिग्री तक की गिरावट आएगी, लेकिन 22 अप्रैल से राहत का यह दौर खत्म हो जाएगा। फिर तापमान बढ़ना शुरू होगा। वहीं, अप्रैल महीने के आखिरी 4-5 दिन में लू चलने लगेगी।

अप्रैल में टूट सकता है रिकॉर्ड
मौसम विज्ञानियों का मानना है कि इस बार अप्रैल महीने में गर्मी के सभी रिकॉर्ड टूट सकते हैं। निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट के प्रमुख वैज्ञानिक जीपी शर्मा का कहना है कि 1 से 19 अप्रैल तक दिल्ली के बस स्टेशन सफदरजंग का अधिकतम तापमान सामान्य (36.6 डिग्री सेल्सियस) से अधिक बना रहा। अप्रैल के बचे हुए दिनों में तापमान लगातार बढ़ता जाएगा।

अगर बीते दो सालों की बात करें तो 2020 और 2021 में अप्रैल का औसत तापमान 35.5 डिग्री और 37.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ था। वहीं इस बार औसत तापमान 40 डिग्री तक रह सकता है, जो 120 साल में कभी भी दर्ज नहीं हुआ है।

औसत तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है
शर्मा ने बताया कि औसत तापमान एक डिग्री बढ़ना भी बहुत बड़ी बात है। इस बार जो स्थितियां बन रही हैं, उन्हें देखकर लगता है कि औसत तापमान 3 डिग्री तक ज्यादा रह सकता है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री तक ज्यादा रहेगा। इन राज्यों में अप्रैल महीने में गर्मी के सभी रिकॉर्ड टूट सकते हैं।

मार्च 2022 में टूटा था 122 साल का रिकॉर्ड
बता दें कि इस साल गर्मी ने पिछले कई सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। मार्च और अप्रैल में ही भयानक गर्मी से लोगों का जीना मुहाल हो गया। 11 अप्रैल को दिल्ली में 72 साल का गर्मी का रिकॉर्ड टूट गया। विशेषज्ञों का कहा कि 72 साल बाद अप्रैल के फर्स्ट हाफ में तापमान 42 डिग्री से ज्यादा रिकॉर्ड किया गया। इसी तरह मार्च 2022 में गर्मी ने पिछले 122 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया था।

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छतीसगढ़

क्या आपका बच्चा चिन्ता करता है तो इसे नादानी न समझे

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Finding the off switch when kids worry - Parenting Ideas

 

  • चिंता, यह शब्द जितना छोटा है उससे कहीं ज्यादा ही खतरनाक। चिंता की वजह से कई बार लोगों की जान भी चली जाती है। माता-पिता, पति-पत्नी, बूढ़े-बुजुर्ग, इन लोगों को चिंता तो होती ही है, लेकिन क्या आपने बच्चों को चिंता करते सुना है?

    कई बार बच्चे आपसे कहते भी है कि मैं कुछ सोच रहा था, फलां बात को लेकर दुखी हूं या फिर मुझे चिंता हो रही है अपने किसी दोस्त की। यह सब बातें सुनकर आप हंसते हैं और उसे अनदेखा भी कर देते हैं।

    एक पेरेंट के तौर पर आपको यह बात गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि बुजुर्गों में होने वाली चिंता अब बच्चों में भी दिखने लगी है। पहली बार अमेरिकी विशेषज्ञों की टास्क फोर्स ने 8-18 साल के बच्चों के बिगड़ते मेंटल हेल्थ को देखते हुए उनकी स्थिति जांचने की बात सामने रखी है। जिससे बच्चे अपनी उम्र की तरह व्यवहार करें और उनका बचपन न खत्म हो।

    चिंता में बीत रहा है बचपन
    बाल मनोवैज्ञानिक और मेयो क्लिनिक में पीडियाट्रिक एंग्जाइटी डिसऑर्डर्स क्लिनिक के डायरेक्टर स्टीफन पीएच व्हाइटसाइड के अनुसार, बच्चों में चिंता बचपन की सबसे आम मानसिक गड़बड़ी बनकर सामने आई है। इसके लिए हमें जल्द से जल्द जांच करनी होगी। ज्यादातर बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की जरूरत है, जो उन्हें इस समय मिल नहीं रही। कोरोना ने इस समस्या को बढ़ा दिया है।

    बच्चों में लक्षण नहीं होने पर भी जांच की जाएगी
    जी हां, अमेरिकी टास्ट फोर्स ने सिफारिश की है कि बच्चों में लक्षण दिखें या नहीं दिखें, हर बच्चे के मेंटल हेल्थ की जांच करनी चाहिए। टास्क फोर्स की मेंबर मार्था कुबिक के अनुसार, बच्चों का जीवन अस्त-व्यस्त हो, उससे पहले हमें पेरेंट के तौर पर उसमें दखल देना होगा।

    चिंता की वजह से बच्चे नशा कर सकते हैं
    चाइल्ड माइंड इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चे अगर बचपन से चिंता करने लगते हैं तो आगे चलकर वो डिप्रेशन में जा सकता हैं। इतना ही नहीं इससे उसे नशे की लत भी लग सकती है।

    अब बात करते हैं भारतीय बच्चों के बारे में-
    स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रन 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 7 में से एक बच्चा डिप्रेशन का शिकार है। वहीं इंडियन जर्नल ऑफ साइकेट्री की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में कोरोना महामारी से पहले भी करीब 5 करोड़ बच्चों में कोई न कोई मानसिक बीमारी रही है। इनमें से करीब 90% बच्चों या उनके माता-पिता ने इलाज के बारे मे सोचा तक नहीं।

    अगर बच्चा चिंता कर रहा है तो माता-पिता को क्या करना चाहिए?
    फोर्टिस हॉस्पिटल के मेंटल हेल्थ और बिहेवियरल सांइस के डायरेक्टर डॉ. समीर पारीख कहते हैं– अगर बच्चों में चिंता के लक्षण दिख रहे हैं तो उसे हल्के में लेना छोड़ना होगा। पेरेंट को बच्चों की बात को गंभीरता से सुनना होगा। अगर बच्चा कुछ कहना चाह रहा है तो उसे नजरअंदाज न करें।

    इसी तरह अगर बच्चे के व्यवहार में कोई बदलाव दिख रहा है तब भी उसे गंभीरता से लें, उससे बात करें। अगर बच्चा ज्यादा चिंता में है तो माता-पिता को पीडियाट्रिक (बाल रोग विशेषज्ञ) या किसी दूसरे प्राइमरी देखभाल वाले डॉक्टर से बात करनी चाहिए। क्योंकि लगातार चिंता करने से बच्चा किसी डिसऑर्डर का शिकार हो सकता है।

    बच्चों में चिंता का क्या कारण है?
    डॉक्टर प्रितेश गौतम के अनुसार कई ऐसी बातें हैं, जो आपको दिखने में छोटी लगती हैं, लेकिन बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क में गहरा असर छोड़ जाती हैं। इनमें से कुछ ऐसी बाते भी हैं-

    माता-पिता का बच्चों को समय न दे पाना
    क्लास में कम मार्क्स लाने का डर सताना
    पेरेंट्स का झगड़ा और अलग होने का डर
    घर का नेगेटिव माहौल रहना

    बच्चों को बार-बार डांटना या मारना

    एक और स्टडी में हुआ ये खुलासा
    दुनियाभर में की गई एक स्टडी के अनुसार, डिप्रेशन के शुरुआती लक्षण 17 साल की उम्र में दिखाई देते हैं, लेकिन इन दिनों डिप्रेशन की पहचान शुरुआती उम्र में ही समझ आने लगी है। ज्यादा से ज्यादा जांच करने की वजह से ये चीजें समझ आ रही है।

    बच्चे के लिए कंस्ट्रक्टिव काम करें
    फोर्टिस एस्कॉर्ट्स इंस्टीटय़ूट एंड रिसर्च सेंटर, दिल्ली में सीनियर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. भावना बर्मी चिंता के बारे में कहती हैं कि अगर अपना समय थोड़ा क्रिएटिव काम में लगा लिया जाए तो काफी हद तक चिंता दूर हो सकती है।

    इसलिए पॉजिटिव बातों को ज्यादा जगह दें और नेगेटिव को दूर कर दें। बच्चों को…

    सुबह जल्दी उठाएं
    मेडिटेशन करवाएं।
    घर का खाना खिलाएं।
    खाने में जूस जरूर दें।
    पढ़ाई का ज्यादा प्रेशर न दें।
    डांस या म्यूजिक जैसी एक्टिविटी करवाएं।

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छतीसगढ़

देश में फिर डरा रहा है कोरोना : अचानक केस बढ़ने के कारण हो सकते है स्कूल बंद

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Delhi Schools Reopen: दिल्ली में जल्द खुलेंगे स्कूल, एक्सपर्ट कमिटी ने की है स्कूलों को खोलने की सिफारिश

 

देश में बढ़ते कोरोना मामलों को देखते हुए केंद्र ने दिल्ली समेत 5 राज्यों को आगाह किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने मंगलवार को बढ़ते पॉजिटिविटी रेट पर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और मिजोरम को लेटर लिखा। इस लेटर में संक्रमण फैलने से रोकने के लिए सुरक्षा उपाय और निगरानी करने को कहा गया है।

वहीं, राजधानी में कोरोना को लेकर दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (DDMA) ने आज बैठक बुलाई है। उप-राज्यपाल की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में CM केजरीवाल और AIIMS डायरेक्टर भी मौजूद रहेंगे। बैठक में स्कूलों को बंद करने पर भी फैसला हो सकता है। दिल्ली में पिछले 24 घंटे में कोरोना के 632 नए मामले सामने आए हैं। वहीं, पॉजिटिविटी रेट 4.42% दर्ज किया गया।

आगे बढ़ने से पहले नीचे दिए पोल में हिस्सा लेकर अपनी राय दे सकते हैं...

भारत में रोजाना आने वाले नए केसेस में राजधानी दिल्ली समेत इन 4 राज्यों का योगदान काफी अधिक है। यहां पॉजिटिविटी रेट में लगातार इजाफा देखा गया है। केंद्र ने वैक्सीनेशन और प्रिकॉशन डोज को लेकर भी तेजी लाने को कहा है।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने राज्यों को फाइव फोल्ड स्ट्रैटजी पर काम करने को कहा है। इसमें टेस्ट, ट्रैक, ट्रीट, वैक्सीनेशन और कोविड एप्रोप्रिएट बिहेवियर फॉलो करने की सलाह दी गई है।

इंटरनेशनल पैसेंजर्स के सैंपल की जीनोम सीक्वेंसिंग करें
संक्रमण बढ़ने के शुरुआती संकेतों का पता लगाने के लिए सभी हेल्थ फैसिलिटीज को इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारी की नियमित निगरानी, ​​इंटरनेशनल पैसेंजर्स के सैंपल की जीनोम सीक्वेंसिंग की भी सलाह दी गई है। मेडिकल फैसिलिटीज के साथ-साथ सीवेज के सैंपल भी जांचने की सलाह दी गई है।

दिल्ली में वीकली केस में 170% का इजाफा
स्वास्थ्य सचिव के मुताबिक, दिल्ली में 12 अप्रैल को खत्म हुए हफ्ते में नए मामलों की संख्या 998 थी, जो 19 अप्रैल को बढ़कर 2,671 हो गई है। यहां कोविड पॉजिटिविटी रेट में भी 1.42% की बढ़ोतरी देखी गई है। यह आंकड़ा पिछले हफ्ते 3.49% था।

हरियाणा में 12 अप्रैल को खत्म हुए हफ्ते में 521 नए मामले मिले थे, जो कि 19 अप्रैल तक से बढ़कर 1,299 हो गए। पिछले हफ्ते पॉजिटिविटी रेट 1.22% से बढ़कर 2.86% हो गया है। वहीं, उत्तर प्रदेश में 12 अप्रैल को खत्म हुए हफ्ते में नए मामलों की संख्या 217 थी, जो 19 अप्रैल तक बढ़कर 637 हो गई। यहां पॉजिटिविटी रेट पिछले हफ्ते 0.03% था, जो बढ़कर 0.09% हो गया है।

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